वल्लभाचार्य
पुष्टिमार्ग के आचार्य, जिन्होंने गोवर्धन पर श्रीनाथजी की सेवा शुरू की
संक्षेप में
काशी जाते तेलुगु ब्राह्मण दंपति को दंगे से भागना पड़ा, और रास्ते में आठ महीने का बच्चा जन्मा, जिसे डर में एक पेड़ के नीचे छोड़ना पड़ा। लौटे तो बच्चा सकुशल मिला। यही वल्लभाचार्य थे, पुष्टिमार्ग के आचार्य, जिन्होंने गोवर्धन पर श्रीनाथजी की सेवा शुरू की।
आचार्य एवं दार्शनिककृष्ण-भक्ति
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | आचार्य एवं दार्शनिक | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §62, p. 76; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), p. 283 |
| परंपरा | कृष्ण-भक्ति | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §62, pp. 76–77; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 283–284 |
| काल | जन्म वैशाख कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत् 1535 (1479 ई.); देह-त्याग 1531 ई., काशी (ऐतिहासिक प्रमाण) | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §62, p. 77; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 283–284 |
| शिष्य (परंपरागत कथा) | सूरदास | चौरासी वैष्णवन की वार्ता, सूरदासजी की वार्ता, पृ. 272–275 |
जीवन
रास्ते में जन्मा बालक
परंपरागत कथाBhandarkar के अनुसार वल्लभ के पिता लक्ष्मण भट्ट तेलुगु देश के कांकरव गाँव के कृष्ण यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। वे पत्नी इलमगारा के साथ काशी की तीर्थ-यात्रा पर थे कि रास्ते में वैशाख कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत् 1535 (1479 ई.) को पुत्र का जन्म हुआ।
Growse के अनुसार काशी में धार्मिक दंगा भड़कने से परिवार को जल्दी में भागना पड़ा, और काशी के पास चंपारण्य के जंगल में आठ महीने का बच्चा जन्मा। डर के मारे माता-पिता उसे एक पेड़ के नीचे छोड़कर चले गए। कुछ दिन बाद लौटे, तो बच्चा उसी जगह सकुशल मिला।
विजयनगर में शास्त्रार्थ
परंपरागत कथाGrowse के अनुसार ग्यारह बरस की उम्र में पिता चल बसे, और जल्दी ही वल्लभ धर्म-शिक्षक बन गए। उनकी पहली बड़ी जीत दक्षिण में हुई: विजयनगर में, जहाँ उनकी माँ का परिवार रहता था, उन्होंने राजसभा के पंडितों से शास्त्रार्थ में जीत पाई, और राजा कृष्णदेव ने उन्हें अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना।
संन्यास को वे विवेकपूर्ण धर्म के विरुद्ध मानते थे, इसलिए Growse के अनुसार उन्होंने काशी में विवाह किया। उनके दो पुत्र हुए: गोपीनाथ (1511) और विट्ठलनाथ (1516)। विट्ठलनाथ ने आगे उनका संप्रदाय दूर-दूर तक फैलाया।
गोवर्धन और काशी
ऐतिहासिक प्रमाणGrowse के अनुसार वल्लभ बार-बार ब्रज आते थे, और 1520 में उन्होंने गोवर्धन पर श्रीनाथजी का बड़ा मंदिर स्थापित किया। उनका स्थायी घर काशी में रहा, जहाँ उन्होंने अपने ग्रंथ लिखे और 1531 में देह छोड़ी।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
श्रीनाथजी की आज्ञा
परंपरागत कथाBhandarkar परंपरा की कथा देते हैं: उस समय गोवर्धन पर्वत पर गोपाल-कृष्ण "देवदमन" नाम से प्रकट हुए, जिन्हें श्रीनाथजी भी कहते हैं। उन्होंने वल्लभ को सपने में बुलाया और कहा कि कृष्ण-अवतार में गोकुल में जो मेरे साथी थे, वे इस युग में फिर जन्मे हैं; उन्हें मेरा सेवक बनाओ, ताकि मैं पहले की तरह उनके साथ लीला करूँ।
वल्लभ ने जाकर श्रीनाथजी के दर्शन किए। श्रीनाथजी ने आज्ञा दी कि मेरा मंदिर बनाओ और मेरी पूजा की विधि का प्रचार करो; इसके बिना कोई "पुष्टिमार्ग" में नहीं आ सकता। Bhandarkar इसका अर्थ यह निकालते हैं कि वल्लभ ने अपने मार्ग को कृष्ण के एक विशेष स्वरूप, श्रीनाथजी, से जोड़ा।
स्रोतों में अंतर
Growse के अनुसार वृंदावन में वल्लभ को कृष्ण के दर्शन हुए, जिन्होंने उन्हें बालक रूप में, "बालकृष्ण" या "बाल गोपाल" नाम से अपनी उपासना चलाने को कहा; Growse लिखते हैं कि उनके वंशजों में आज भी यही उपासना सबसे प्रचलित है।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
पुष्टि, यानी भगवान की कृपा
Bhandarkar के अनुसार वल्लभ का मार्ग "पुष्टिमार्ग", यानी भगवान की कृपा का मार्ग, कहलाता है। उनका वेदांत-सिद्धांत विष्णुस्वामी नाम के एक पुराने आचार्य जैसा है: आदि आत्मा अकेला था, इसलिए आनंदित न था; उसने अनेक होना चाहा और स्वयं ही जड़ जगत, जीव और अंतर्यामी बन गया। ये सब उससे आग की चिनगारियों की तरह निकले और उसी के अंश हैं।
Growse के अनुसार वल्लभ की पूरी व्यवस्था "ब्रह्म-संबंध", यानी भगवान से जुड़ने, के सिद्धांत पर टिकी है, जो वल्लभ के अनुसार उन्हें श्रावण शुक्ल एकादशी की आधी रात भगवान ने स्वयं बताया, और जिसे "सिद्धांत रहस्य" में शब्दशः लिखा गया।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंसुबोधिनी और अन्य ग्रंथ — Growse के अनुसार वल्लभ ने अपने ग्रंथ काशी में लिखे। Growse की सूची में उनके नाम से चार बड़ी टीकाएँ हैं: भागवत की टीका "सुबोधिनी", व्यास-सूत्र भाष्य, जैमिनि-सूत्र भाष्य और तत्त्वदीप-निबंध; और सत्रह छोटी रचनाएँ, जैसे सिद्धांत रहस्य, सिद्धांत मुक्तावली, पुष्टि-प्रवाह-मर्यादा, नवरत्न, कृष्णाश्रय, चतुःश्लोकी और यमुनाष्टकम्।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
ऐतिहासिक प्रमाणGrowse के अनुसार वल्लभ के पुत्र विट्ठलनाथ ने उनका मत दक्षिण और पश्चिम भारत में बड़े उत्साह से फैलाया; उनके 252 प्रमुख शिष्यों के चरित "दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता" में दर्ज हैं। बाद में विट्ठलनाथ गोकुल में बस गए। आज गोकुल की प्रसिद्धि वल्लभ से ही है।
संबंधित संत
- सूरदास — शिष्य
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लेख
- भक्ति आंदोलन: दक्षिण के आलवारों से सौराष्ट्र की गंगासती तक — बारह सौ बरसों की एक धारा, क्षेत्र-क्षेत्र और संत-संत, समय-रेखा के साथ
भक्ति-पाठ
- श्री यमुनाष्टकम् — वल्लभाचार्य की रचना; पुष्पिका "इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितं", Growse की सूची में भी
तीर्थ
- गोवर्धन — जहाँ वल्लभाचार्य ने श्रीनाथजी की सेवा शुरू की
- श्रीनाथजी मंदिर — श्रीनाथजी का मंदिर
- काशी — वल्लभाचार्य का देह-त्याग यहीं
स्रोत
- Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems — R. G. Bhandarkar (1913) · §62, pp. 76–78
- Mathurá: A District Memoir — F. S. Growse (1883) · pp. 283–285
