समय
5–6 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
कठिन (सघन भाषा)
शुभ दिन
यमुना जयंती (चैत्र शुक्ल षष्ठी); जन्माष्टमी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)पाप-क्षय (Purification)शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)
श्री यमुनाष्टकम् श्री वल्लभाचार्य विरचित स्तोत्र है और उनके षोडशग्रंथ का प्रथम ग्रंथ है। इसमें यमुना जी की स्तुति है — कृष्ण-लीला की साक्षी तथा भक्ति प्रदान करने वाली नदी के रूप में। पुष्टिमार्ग की परंपरा में इसका नित्य पाठ किया जाता है।
FAQ
श्री यमुनाष्टकम् — सामान्य प्रश्न
यह पृष्ठ श्री वल्लभाचार्य कृत यमुनाष्टकम् का है। संस्कृत-दस्तावेज़ संस्करण की पुष्पिका स्पष्ट कहती है — "इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितं श्रीयमुनाष्टकं सम्पूर्णम्"। यह उनके षोडशग्रंथ (सोलह ग्रंथों) में प्रथम है।
हाँ, और यह भ्रम बहुत फैला हुआ है। वल्लभाचार्य वाले के अतिरिक्त शंकराचार्य के नाम से भी एक अलग यमुनाष्टक मिलता है। ये एक ही पाठ के भेद नहीं, दो अलग रचनाएँ हैं। अनेक हिंदी वेबसाइटें दोनों को आपस में मिला देती हैं — सामग्री तैयार करते समय हमें एक ऐसा "यमुनाष्टकम हिंदी अर्थ" पृष्ठ मिला जिसके श्लोक वल्लभाचार्य के पाठ से बिल्कुल मेल ही नहीं खाते थे। यह पृष्ठ केवल वल्लभाचार्य वाले पाठ का है।
यमुना सूर्य की पुत्री हैं और यमराज सूर्य के पुत्र — अर्थात दोनों सगे भाई-बहन हैं। छठा श्लोक इसी पर आधारित है: जो यमुना का जल पीता है वह यम का भांजा हो जाता है, और भाई अपनी बहन के पुत्रों को — चाहे वे दुष्ट ही क्यों न हों — दंड नहीं देता। इसीलिए परंपरा में कहा जाता है कि यमुना-जल के सेवन से यम-यातना नहीं होती। भाई दूज का पर्व भी इसी भाई-बहन के संबंध से जुड़ा है।
नौ। अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है और नौवाँ फलश्रुति है, जिसमें वल्लभाचार्य स्वयं पाठ का फल बताते हैं ("वदति वल्लभः श्रीहरेः")। तीनों स्रोत — संस्कृत-दस्तावेज़, ब्रजरसिक तथा वृंदावन डॉट कॉम — यही संरचना देते हैं।
षोडशग्रंथ श्री वल्लभाचार्य के सोलह लघु ग्रंथों का समूह है, जो पुष्टिमार्ग की साधना का आधार माने जाते हैं। यमुनाष्टकम् इनमें प्रथम है — इसीलिए पुष्टिमार्गीय वैष्णवों की साधना का आरंभ प्रायः इसी से होता है।
देवी — और यही इसकी विशेषता है। पूरे स्तोत्र में यमुना का वर्णन एक जीवंत व्यक्तित्व की तरह होता है: उनकी तरंगें भुजाएँ हैं, तट की बालू उन भुजाओं के कंकणों पर जड़े मोती, और उनका बहाव झूले पर झूलने जैसा। पुष्टिमार्ग में वे श्रीकृष्ण की प्रिया तथा साक्षात कृपा-स्वरूपा मानी जाती हैं।
अन्य कृष्ण-अष्टकों की तुलना में हाँ। इसका छंद लंबा है और भाषा सघन — विशेषकर श्लोक 5, 7 व 8। इस पृष्ठ पर इनका अर्थ मूल संस्कृत के निकट रखकर दिया गया है, अनुमान से विस्तार नहीं किया गया, क्योंकि वल्लभाचार्य के इस पाठ पर कोई विश्वसनीय हिंदी भाष्य नहीं मिल सका। पुष्टिमार्ग की टीकाएँ इन श्लोकों को कहीं अधिक गहराई से खोलती हैं।
यमुना जयंती (चैत्र शुक्ल षष्ठी) पर इसका विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त यमुना-स्नान या दर्शन के समय, जन्माष्टमी पर, तथा नित्य प्रातः पाठ में भी यह पढ़ा जाता है।
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पर्व
