मध्वाचार्य

द्वैत वेदांत के आचार्य, जिन्होंने उडुपि में श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापित की

संक्षेप में

समुद्र किनारे ध्यान में बैठे एक संन्यासी ने रेत में फँसा जहाज़ देखा और कपड़ा हिलाकर उसे बचा लिया। बदले में उन्होंने धन नहीं, गोपीचंदन के कुछ ढेले माँगे, और एक ढेले के भीतर श्रीकृष्ण की मूर्ति निकली। यही मध्वाचार्य थे, द्वैत वेदांत के आचार्य, जिन्होंने उडुपि में वह मूर्ति स्थापित की।

आचार्य एवं दार्शनिकद्वैत वेदांत

एक नज़र में

मध्वाचार्य — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीआचार्य एवं दार्शनिकBhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §50, pp. 57–58; Padmanabhachar, Life & Teachings of Sri Madhvacharya, p. 47
परंपराद्वैत वेदांतBhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §§50–51, pp. 58–59
कालतेरहवीं सदी; Bhandarkar के अनुसार लगभग शके 1119–1198 (लगभग 1197–1276 ई.), जबकि मठों की परंपरागत सूची शके 1040–1119 देती है (मत अलग-अलग)Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §50, pp. 58–59

जीवन

पाजकक्षेत्र का वासुदेव

परंपरागत कथा

Bhandarkar के अनुसार नारायण पंडित के "मध्वविजय" में मध्व के पिता का नाम मध्यगेह भट्ट है, और जन्म के बाद बालक का नाम वासुदेव रखा गया। Bhandarkar जन्म-स्थान उडुपि तालुक के कल्याणपुर को बताते हैं, जिसे मध्वविजय का रजतपीठ माना जाता है।

Padmanabhachar के अनुसार मध्यगेह भट्ट बारह बरस तप और प्रार्थना के बाद उडुपि से पाजकक्षेत्र आ बसे थे, जो विमानगिरि पहाड़ी की तलहटी में दुर्गा-मंदिर के पास एक गाँव है। वहीं विलंबी संवत्सर की विजयादशमी को मध्व का जन्म हुआ। परंपरा उन्हें वायु का अवतार मानती है।

संन्यास और दिग्विजय

परंपरागत कथा

शिक्षा के बाद अच्युतप्रेक्षाचार्य ने उन्हें संन्यास दिया और वे उनके गुरु बने; संन्यास का नाम आनंदतीर्थ हुआ। उन्हें पूर्णप्रज्ञ भी कहा जाता है। Bhandarkar के अनुसार दीक्षा के बाद वे हिमालय में बदरिकाश्रम गए, और देश-देश घूमकर मायावाद के समर्थकों से शास्त्रार्थ किया और वैष्णव मत स्थापित किया।

Padmanabhachar बताते हैं कि गुरु अच्युतप्रेक्ष शुरू में अद्वैत पर ही अडिग रहे और लंबी बहस के बाद ही मध्व के भाष्य को माना। उडुपि के अनंतेश्वर मंदिर के प्रांगण में वह स्थान आज भी दिखाया जाता है, जहाँ बैठकर मध्व शिष्यों को पढ़ाते थे।

Bhandarkar के अनुसार उनके शिष्य थे पद्मनाभतीर्थ, नरहरितीर्थ, माधवतीर्थ और अक्षोभ्यतीर्थ। नरहरितीर्थ को उन्होंने ओडिशा के जगन्नाथ भेजा, और शिलालेख इस परंपरा की पुष्टि करते हैं कि नरहरितीर्थ वहाँ ऊँचे पद पर रहे।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

गोपीचंदन के ढेले में श्रीकृष्ण

परंपरागत कथा

Padmanabhachar के अनुसार एक भोर मध्व समुद्र-स्नान को निकले और रास्ते में श्रीकृष्ण की स्तुति में गाने योग्य श्लोक रचते गए; यही आगे "द्वादश स्तोत्र" बना। किनारे पर ध्यान में बैठे थे कि उन्होंने द्वारका से आया एक व्यापारी जहाज़ देखा, जो रेत के टीले में फँसकर डूबने को था। उन्होंने अपना कपड़ा हिलाया, और जहाज़ तैरकर सुरक्षित किनारे आ गया।

कृतज्ञ व्यापारी ने धन देना चाहा, पर मध्व बोले: तुम्हारे जहाज़ में गोपीचंदन के जो ढेले हैं, उनमें से कुछ दे दो। एक ढेला बहुत भारी था। उसे मध्व सरोवर में धोया गया, तो भीतर से श्रीकृष्ण की मूर्ति निकली। तीस बलवान आदमी मिलकर भी उसे न उठा सके; तब मध्व ने ख़ुद उसे दोनों हाथों में उठाया और ले जाकर एक सादे मंदिर में स्थापित किया।

ऐतरेय पढ़ाते हुए अंतर्धान

परंपरागत कथा

Padmanabhachar के अनुसार परंपरा कहती है कि एक दिन मध्व शिष्यों की बड़ी सभा में अपना प्रिय ऐतरेय उपनिषद् समझा रहे थे, तभी देवताओं ने फूल बरसाए, और मध्व सशरीर आँखों से ओझल होकर सदा के लिए बदरी चले गए।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

पाँच भेद

Bhandarkar के अनुसार शंकर के शुद्ध अद्वैत और रामानुज के विशिष्टाद्वैत, दोनों के सामने आनंदतीर्थ पाँच नित्य भेद रखते हैं: ईश्वर और जीव का, ईश्वर और जड़ जगत का, जीव और जड़ का, एक जीव और दूसरे जीव का, और एक जड़ वस्तु और दूसरी का।

Bhandarkar बताते हैं कि मध्व को रामानुज का यह विचार भी आपत्तिजनक लगा कि जीव और जगत ईश्वर का शरीर हैं, क्योंकि इससे ईश्वर की स्वतंत्र महिमा घटती है। इसलिए वे ईश्वर को जगत का उपादान कारण नहीं मानते। उनके ईश्वर अनंत गुणों वाले, सर्वज्ञ, और जीव व जगत से पूरी तरह भिन्न हैं; उनके सारे अवतार उनके पूर्ण रूप हैं।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंब्रह्मसूत्र-भाष्य और अन्य ग्रंथ — मध्व ने ब्रह्मसूत्र पर अपना भाष्य लिखा; Bhandarkar के अनुसार उन्होंने बादरायण के सूत्रों और उपनिषदों की व्याख्या अपने सिद्धांत के अनुरूप की। Bhandarkar उनकी तिथि तय करने के लिए उनके "महाभारत-तात्पर्य-निर्णय" में दी कलि संवत् 4300 की तिथि का उपयोग करते हैं। Padmanabhachar के अनुसार उडुपि में मूर्ति मिलने वाले दिन ही उन्होंने "द्वादश स्तोत्र" के अध्याय 6 से 12 पूरे किए।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतBhandarkar लिखते हैं कि ग्यारहवीं सदी से आगे के वैष्णव आचार्यों का बड़ा लक्ष्य था माया के सिद्धांत, यानी जगत के मिथ्या होने, का खंडन, और भक्ति को ठोस आधार देना। रामानुज के बाद मध्व ने यह काम और आगे बढ़ाया, ईश्वर और जीव के भेद को सबसे स्पष्ट रूप में रखकर।

ऐतिहासिक प्रमाणBhandarkar शिलालेखों से दिखाते हैं कि मध्व के शिष्य नरहरितीर्थ की तिथियाँ शके 1186 से 1215 तक मिलती हैं। इसलिए गुरु का देहांत शके 1119 में नहीं हो सकता; वह उनकी जन्म-तिथि होनी चाहिए। Bhandarkar के अनुसार मध्व तेरहवीं सदी के पहले तीन चौथाई हिस्से में रहे।

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तीर्थ

स्रोत

मध्वाचार्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न