रामानुजाचार्य
विशिष्टाद्वैत के आचार्य, जिन्होंने गुप्त मंत्र सबके लिए खोल दिया
संक्षेप में
गुरु ने कसम दिलाकर गुप्त मंत्र दिया। अगले ही दिन शिष्य ने मंदिर के ऊँचे मंडप से वह मंत्र सबको सुना दिया। गुरु ने पूछा, इसकी सज़ा जानते हो? शिष्य बोला: मैं नरक जाऊँगा, पर इतने लोग तर जाएँगे। यही रामानुजाचार्य थे, विशिष्टाद्वैत के आचार्य।
आचार्य एवं दार्शनिकविशिष्टाद्वैत (श्रीवैष्णव)
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | आचार्य एवं दार्शनिक | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §45, pp. 50–51; Govindacharya, Life of Ramanujacharya (1906), अध्याय IX |
| परंपरा | विशिष्टाद्वैत (श्रीवैष्णव) | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §§46–47, pp. 51–53; Govindacharya, Life of Ramanujacharya (1906), अध्याय IX, p. 56, टिप्पणी |
| काल | जन्म शके 938–939 (1016–1017 ई.); परंपरा के अनुसार देह-त्याग 1137 ई. (ऐतिहासिक प्रमाण) | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §46, p. 51; Govindacharya, Life of Ramanujacharya (1906), अंत की तिथि-सूची |
| प्रेरणा-स्रोत (परंपरागत कथा) | नम्मालवार | Govindacharya, Life of Ramanujacharya (1906), अध्याय IX, p. 56; Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §46, p. 51 |
जीवन
कांची के विद्यार्थी
ऐतिहासिक प्रमाणBhandarkar के अनुसार रामानुज का जन्म शके 938, यानी 1016 या 1017 ई. में हुआ। Govindacharya जन्म-स्थान श्रीपेरुंबुदूर बताते हैं। युवावस्था में वे कांचीपुरम् में यादवप्रकाश के शिष्य थे, जो अद्वैत के आचार्य थे।
रामानुज का मन वैष्णव भक्ति की ओर था, इसलिए गुरु की शिक्षा से उन्हें संतोष नहीं हुआ, और अंत में वे उनसे अलग हो गए। Bhandarkar के अनुसार उन्होंने आलवारों के प्रबंधों का अध्ययन किया और उनकी भावना को आत्मसात किया।
श्रीरंगम, और चोल राजा से संकट
ऐतिहासिक प्रमाणयामुनाचार्य के उत्तराधिकारी बनकर रामानुज श्रीरंगम में रहे और वहीं अपना जीवन-कार्य किया। Bhandarkar के अनुसार बुढ़ापे में उस समय के चोल राजा ने उन पर वैष्णव धर्म छोड़कर शैव बनने का दबाव डाला, और 1096 ई. में उन्होंने मैसूर के होयसल राज्य में शरण ली।
वहाँ 1098 ई. में उन्होंने बिट्टिदेव को वैष्णव बनाया, जो आगे विष्णुवर्धन कहलाए। Bhandarkar जोड़ते हैं कि शायद "बिट्टि" नाम ही कन्नड़ में "विष्णु" का बिगड़ा रूप था। Govindacharya की तिथि-सूची के अनुसार रामानुज 1118 में श्रीरंगम लौटे।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
यामुनाचार्य की तीन मुड़ी उँगलियाँ
परंपरागत कथाGovindacharya के अनुसार रामानुज यामुनाचार्य से मिलने श्रीरंगम पहुँचे, तो पता चला कि वे देह छोड़ चुके हैं। पार्थिव शरीर के पास खड़े रामानुज ने देखा कि दाहिने हाथ की तीन उँगलियाँ मुड़ी हुई हैं। पूछने पर शिष्यों ने बताया कि यामुनाचार्य तीन इच्छाएँ अक्सर दोहराते थे: व्यास और पराशर की स्मृति का सम्मान, संत नम्मालवार को श्रद्धांजलि, और ब्रह्मसूत्र पर विशिष्टाद्वैत की दृष्टि से भाष्य।
रामानुज ने वहीं वचन दिया कि भगवान की कृपा रही, तो मैं ये तीनों काम पूरे करूँगा। कथा कहती है कि उसी क्षण तीनों मुड़ी उँगलियाँ खुल गईं, और सभा ने उन्हें यामुनाचार्य का उत्तराधिकारी मान लिया।
स्रोतों में अंतर
Bhandarkar इसे इतिहास की भाषा में कहते हैं: यामुनाचार्य के अंतिम निर्देशों में एक यह था कि उनका उत्तराधिकारी बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे, क्योंकि अद्वैत के सामने भक्ति के सिद्धांत को टिकाए रखने के लिए यह ज़रूरी लगा।
अठारह यात्राएँ, और सबके लिए मंत्र
परंपरागत कथाGovindacharya के अनुसार रामानुज मंत्र का रहस्य जानने तिरुक्कोट्टियूर के गोष्ठीपूर्ण के पास गए। गुरु ने हर बार कहा: "अभी नहीं, फिर आना।" रामानुज बिना शिकायत लौट जाते। ऐसा अठारह बार हुआ। अठारहवीं बार लौटकर वे रो पड़े, तब गुरु ने उन्हें बुलाया और अष्टाक्षर मंत्र का रहस्य बताया, इस शर्त पर कि यह किसी अयोग्य को नहीं बताया जाएगा।
रामानुज ने सोचा: अगर भगवान पापियों के लिए नहीं, तो किसके लिए हैं? अगले दिन उन्होंने तिरुक्कोट्टियूर के मंदिर के ऊँचे मंडप में सबको बुलाकर वह मंत्र सुना दिया। गुरु ने क्रोध में पूछा कि इसकी सज़ा जानते हो? रामानुज बोले: "मेरी सज़ा नरक है। पर एक पापी का नरक जाना छोटी क़ीमत है, जब इससे इतने लोग तर जाएँ।"
यह सुनकर गोष्ठीपूर्ण का हृदय पिघल गया। उन्होंने रामानुज को गले लगाया और कहा: तुम मेरे हो; आज से यह मत "एंबेरुमानार का मत" कहलाएगा।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
विशिष्टाद्वैत: जैसे शरीर और आत्मा
Bhandarkar के अनुसार रामानुज ने ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों के आधार पर यह सिद्धांत रखा कि तीन तत्व नित्य हैं: जीव (चित्), जड़ जगत (अचित्), और परमात्मा (ईश्वर)। जीव और जगत परमात्मा का शरीर हैं, और परमात्मा भीतर से उनका नियंत्रण करने वाला अंतर्यामी। जैसे शरीर और उसमें रहने वाली आत्मा मिलकर एक मनुष्य हैं, वैसे ही ये तीनों मिलकर एक ब्रह्म हैं।
Bhandarkar लिखते हैं कि दक्षिण के वैष्णव आचार्यों की सबसे बड़ी चाह थी शंकराचार्य के मायावाद का उन्हीं उपनिषदों के आधार पर खंडन, क्योंकि उनकी दृष्टि में मायावाद भक्ति की जड़ पर कुल्हाड़ी चलाता था। रामानुज ने यह चाह पूरी की, और उसके बाद हर वैष्णव संप्रदाय को अपने साथ वेदांत का सिद्धांत जोड़ना पड़ा।
Govindacharya के अनुसार महापूर्ण ने रामानुज को "द्वय मंत्र" का सार ऐसे समझाया: भगवान एक है; वह परम दयालु है, इसलिए वही हमारा मार्ग है; वह सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है, इसलिए वही हमारा लक्ष्य; और जीव का परम लक्ष्य है उसके चरणों की नित्य सेवा।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंब्रह्मसूत्र और गीता पर भाष्य (श्रीभाष्य, गीताभाष्य) — Bhandarkar के अनुसार रामानुज की रचनाएँ हैं: वेदांतसार, वेदार्थसंग्रह, वेदांतदीप, और ब्रह्मसूत्र व भगवद्गीता पर भाष्य। ब्रह्मसूत्र का भाष्य वही काम था, जिसकी इच्छा यामुनाचार्य ने अपने उत्तराधिकारी के लिए रखी थी।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
आधुनिक विद्वानों का मतBhandarkar लिखते हैं कि दक्षिण के वैष्णवों में दो तरह के शिक्षक हुए: आलवार, जिन्होंने भक्ति के गीत गाए, और आचार्य, जिन्होंने शास्त्रार्थ से सिद्धांत स्थापित किए। आचार्यों में नाथमुनि और यामुनाचार्य के बाद रामानुज आए, और उन्होंने भक्ति को वेदांत की ठोस नींव दी।
संबंधित संत
- नम्मालवार — प्रेरणा-स्रोत
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तीर्थ
- तिरुवरंगम् — रामानुज का मुख्य केंद्र
- कांचीपुरम् — जहाँ युवा रामानुज ने पढ़ाई की
स्रोत
- The Life of Ramanujacharya — Alkondaville Govindacharya (1906) · अध्याय IX, XV; अंत की तिथि-सूची
- Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems — R. G. Bhandarkar (1913) · §§45–47, pp. 50–53
