नरसिंह मेहता

जूनागढ़ के नागर कवि, जिन्होंने अछूतों के मोहल्ले में जाकर भजन गाए

संक्षेप में

जूनागढ़ के अछूत ढेढ़ों ने एक नागर ब्राह्मण भक्त को अपने मोहल्ले में भजन के लिए बुलाया, और वह पूरी रात उनके साथ गाता-नाचता रहा। बदले में उसकी जाति ने उसे बाहर कर दिया। यही नरसिंह मेहता थे, जिन्हें Jhaveri गुजराती साहित्य का "चॉसर" कहते हैं।

सगुण भक्त-कविकृष्ण-भक्ति

एक नज़र में

नरसिंह मेहता — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसगुण भक्त-कविJhaveri, Milestones in Gujarati Literature (1914), pp. 40–41; महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 27, ओवी 25–28
परंपराकृष्ण-भक्तिJhaveri, Milestones in Gujarati Literature (1914), pp. 36–37; महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 27, ओवी 52–60
कालपंद्रहवीं सदी; Jhaveri के अनुसार 1415–1481 ई. (आधुनिक विद्वानों का मत)Jhaveri, Milestones in Gujarati Literature (1914), p. 35

जीवन

जूनागढ़ का अनाथ

परंपरागत कथा

Jhaveri के अनुसार नरसिंह मेहता काठियावाड़ में जूनागढ़ के नागर ब्राह्मण थे, और बचपन में अनाथ होकर चचेरे भाई और उनकी पत्नी के सहारे पले। Jhaveri लिखते हैं कि नरसिंह के साथ गुजराती कवियों का इतिहास पहली बार पक्की ज़मीन पर आता है। उनकी जाति शिव-उपासक थी, जबकि नरसिंह बचपन से कृष्ण-भक्ति में थे।

वे गाँव के बाहर डेरा डाले साधुओं के साथ गाते-नाचते, कभी व्रज की गोपी का वेश बनाकर भी। इससे परिवार और जाति वाले नाराज़ हुए, और होने वाले ससुर ने सगाई तोड़ दी। बाद में दूसरी जगह विवाह हुआ, पर नरसिंह कुछ कमाते न थे और चचेरे भाई पर निर्भर रहे।

घर-गृहस्थी और दुख

परंपरागत कथा

Jhaveri के अनुसार नरसिंह अलग घर बसाकर पत्नी के साथ रहे, जिनसे दो-तीन बच्चे हुए। वे सदा ग़रीबी में रहे; दिन भर भजन-कीर्तन करते और रोज़ी का कोई काम न करते। पत्नी ताने देती, कभी मायके चली जाती, पर उनका एक ही उत्तर होता: "मैं तो ऐसा ही हूँ।" परंपरा कहती है कि कृष्ण ने ही उनके बेटे-बेटी का विवाह कराया।

कुछ समय बाद पत्नी चल बसीं, फिर बेटा भी। बेटी ससुराल जा चुकी थी। Jhaveri के अनुसार नरसिंह को लगा कि वे सारे सांसारिक बंधनों से एक झटके में छूट गए, और उस समय लिखा उनका पद पिंजरे से छूटे पंछी जैसा है; गुजराती में वह पंक्ति आज भी कहावत बन गई है।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

भाभी का ताना, और रास-लीला के दर्शन

परंपरागत कथा

Jhaveri के अनुसार चचेरे भाई की पत्नी ने ताना मारा कि तुमसे तो धोबी का कपड़े पछाड़ने का पत्थर भी ज़्यादा काम का है। नरसिंह को बात चुभ गई। वे समुद्र-तट पर गोपनाथ नाम की एकांत जगह चले गए और यह प्रण लेकर महादेव की आराधना की कि मनोकामना पूरी होने पर ही घर लौटेंगे।

भक्ति और तप से प्रसन्न होकर महादेव उन्हें द्वारका ले गए और कृष्ण की वह रास-लीला दिखाई, जो मनुष्य की आँखें कम ही देख पाती हैं। इसी से उनका जीवन कृष्ण-भक्ति के लिए तय हो गया; वे लौटे और भाभी को उस ताने के लिए धन्यवाद दिया, जिसके कारण उन्हें भगवान के दर्शन हुए।

स्रोतों में अंतर

महीपति की कथा में सात बरस की उम्र में माता-पिता के चल बसने के बाद बालक नरसी खेलकूद में मगन रहता है, और भाभी उसे निकम्मा और पेटू कहकर डाँटती है। पछताया नरसी जंगल के एक सुनसान शिव-मंदिर में शिव से लिपटकर सात दिन बिना अन्न-जल पड़ा रहता है। प्रसन्न शिव वर माँगने को कहते हैं, तो नरसी कहता है: जो आपको सबसे प्रिय है, वही दे दीजिए; शिव बताते हैं कि उन्हें श्रीकृष्ण सबसे प्रिय हैं।

ढेढ़ों के मोहल्ले में भजन

परंपरागत कथा

Jhaveri इसे उनके जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना कहते हैं। नरसिंह मानते थे कि कृष्ण की दृष्टि में सब भक्त बराबर हैं, चाहे नीची जाति के ढेढ़ हों या ऊँची जाति के ब्राह्मण। जूनागढ़ के ढेढ़ों ने उन्हें अपने मोहल्ले में भजन के लिए बुलाया, और वे तुरंत चले गए; पूरी रात उस अछूत समाज के साथ गाते-नाचते रहे। इसकी सज़ा मिली: जाति ने उन्हें बिरादरी के भोजों से बाहर कर दिया।

कथा कहती है कि एक रात कृष्ण ने सपने में कहा कि कम से कम एक भोज में जाओ। नरसिंह गए और कृष्ण के भजन गाने लगे। नागरों ने देखा कि भोजन की पंक्ति में हर दो नागरों के बीच एक ढेढ़ बैठा है; पर जब उन्होंने नरसिंह को अपने साथ बैठने को कहा, तो वह दृश्य ग़ायब हो गया। लज्जित होकर उन्होंने नरसिंह की आस्था की सच्चाई मानी और उन्हें फिर बिरादरी में ले लिया।

राव मांडलिक की सभा

परंपरागत कथा

Jhaveri के अनुसार जूनागढ़ के शासक रा मांडलिक शिव-उपासक थे, पर उनकी माँ कृष्ण-भक्त थीं और कभी-कभी नरसिंह की मदद करती थीं। राजा को यह पसंद न था। उसने नरसिंह को एक शैव संन्यासी से धार्मिक मुक़ाबले के लिए बुलाया, पाखंडी कहा, और माँगा कि अपने भगवान के सच्चे होने का कोई प्रमाण दो।

कथा कहती है कि कृष्ण ख़ुद राजसभा में साकार प्रकट हुए और अपने भक्त को माला पहनाई। Jhaveri बताते हैं कि नरसिंह के जीवन से बीस चमत्कार जोड़े जाते हैं, जैसे कृष्ण का उनकी लिखी सात सौ रुपये की हुंडी चुकाना, और बेटी के पहले गर्भ के समय ससुराल वालों को दिए जाने वाले उपहार (मामेरा) पूरे करना। दो सौ बरस बाद प्रेमानंद ने इनमें से चार प्रमुख कथाएँ ऐसी मधुर भाषा में लिखीं कि आज पूरा गुजरात उन्हें गाता है।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

जहाँ भेदभाव है, वहाँ भगवान नहीं

ढेढ़ों वाली घटना पर Jhaveri नरसिंह के एक पद का भाव देते हैं: जहाँ पक्षपात है, वहाँ भगवान नहीं; जो सबको समान देखता है, उसके लिए सब समान हैं। नरसिंह यहाँ गीता का स्मरण करते हैं कि ज्ञानी के लिए विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चांडाल सब समान हैं।

महीपति के अनुसार नरसी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते थे; जो कपड़ा या अन्न मिलता, उसी में संतुष्ट रहकर परिवार चलाते। उनकी दृष्टि में राजा और रंक, कल्पवृक्ष और बबूल, पंडित और ग्वाला, साधु और निंदक, सब एक जैसे थे।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंपद और आख्यान — Jhaveri के अनुसार उनकी मुख्य रचनाएँ हैं: हारमाला (जिसके उनके होने पर कुछ लोग संदेह करते हैं), चातुरी षोडशी, चातुरी छत्रीसी, शामलदास नो विवाह, दानलीला, गोविंद गमन, सुरत संग्राम, और भक्ति व शृंगार के लगभग एक हज़ार पद। परंपरा कहती है कि उन्होंने सवा लाख पद रचे; Jhaveri इसे परंपरा की कथा के रूप में देते हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

क्षेत्रीय परंपराJhaveri के अनुसार जूनागढ़ में आज भी "नरसिंह मेहता का चोरा" नाम का एक चबूतरा है, जहाँ उनके इष्टदेव की मूर्ति है, और उनकी जयंती पर नागर समाज उन्हें याद करता है। जिस जाति ने उन्हें सताया, वह आज गर्व से कहती है कि गुजराती साहित्य का "चॉसर" उन्हीं में जन्मा।

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स्रोत

नरसिंह मेहता — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न