FAQ
संत जनाबाई — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जनाबाई महाराष्ट्र की वारकरी संत-कवयित्री थीं, जो बचपन से संत नामदेव के घर में दासी बनकर रहीं। वे काम करते हुए विट्ठल के अभंग गाती थीं, और ख़ुद को "नामा की दासी" कहती थीं।
महीपति के अनुसार सात बरस की उम्र में कार्तिक की यात्रा में वे पंढरपुर के महाद्वार पर रुक गईं और माता-पिता के साथ घर नहीं लौटीं। नामदेव उन्हें अकेला देखकर अपने घर ले आए।
महीपति की कथा है कि भोर से पहले विट्ठल जनी को जगाकर उसकी चक्की घुमाते थे, और जनी हत्थे पर हाथ रखकर गाती थी। गोणाई ने जनी पर लाठी चलाई, तो चोट भगवान को लगी।
परंपरा की कथा यही कहती है: महीपति के अनुसार विट्ठल ने जनी के पद अपने हाथ से लिखे, और ज्ञानेश्वर के पूछने पर कहा कि ये पद प्रेम से भरे हैं। इसे भक्ति की कथा के रूप में पढ़ें।
पढ़े गए स्रोतों में किसी औपचारिक दीक्षा का उल्लेख नहीं। वे संत नामदेव को ही अपना सब कुछ मानती थीं; महीपति के अनुसार वे कहती थीं: मैं नामा की दासी हूँ, उनके सिवा मेरे कोई माता-पिता नहीं।
