संत जनाबाई

नामदेव के घर की दासी, जिसकी चक्की विट्ठल ख़ुद चलाते थे

संक्षेप में

सात बरस की एक बच्ची ने माता-पिता से कहा: मैं घर नहीं जाऊँगी, यहीं विट्ठल के द्वार पर रहूँगी। नामदेव उसे अपने घर ले आए। यही जनाबाई बनीं, जो चक्की पीसते और झाड़ू लगाते हुए अभंग गाती थीं। परंपरा कहती है कि उनकी चक्की विट्ठल ख़ुद चलाते थे।

संत-कविमहिला संत / संत-कवयित्रीवारकरी परंपरा

एक नज़र में

संत जनाबाई — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कवि, महिला संत / संत-कवयित्रीमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 150–171; महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 9–22; Ranade, Rise of the Maratha Power (1900), p. 147
परंपरावारकरी परंपरामहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 9–22, 89–92
कालनामदेव का समय (तेरहवीं-चौदहवीं सदी); वे नामदेव के घर में पलीं (परंपरागत कथा)महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 14–21; अध्याय 4, ओवी 234
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)संत नामदेवमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 14–21, 91

जीवन

विट्ठल के द्वार पर रुकी बच्ची

परंपरागत कथा

महीपति के अनुसार कार्तिक की यात्रा में, जब पंढरपुर यात्रियों से भरा था, एक छोटी बच्ची मंदिर के महाद्वार पर आकर बैठ गई और माता-पिता से बोली: मैं हमेशा यहीं रहूँगी, आपके साथ घर नहीं लौटूँगी। सब हैरान थे कि सात बरस की बच्ची में ऐसा वैराग्य कहाँ से आया। उसकी ज़िद देखकर माता-पिता उसे वहीं छोड़कर लौट गए।

नामदेव ने उसे अकेला देखा तो पूछा: तुम कौन हो, किस गाँव की हो? बच्ची ने कहा: मेरा नाम जनी है; चक्रधारी भगवान ही मेरे माता-पिता हैं, उनके सिवा मेरा कोई नहीं। नामदेव उसका हाथ पकड़कर घर ले आए, और माँ गोणाई से कहा कि इसकी रक्षा हमें करनी है।

नामा की दासी

परंपरागत कथा

जनी बड़ी हुई, तो लोग पूछते कि सच-सच बताओ, तुम कौन हो। वह कहती: मैं नामा की दासी हूँ; उनके सिवा मेरे कोई माता-पिता नहीं। घर का काम करते हुए वह हर समय हरि का नाम लेती, और रात को कीर्तन सुनकर उसी का ध्यान करती।

महीपति की कथा में जनी चक्की पीसते हुए संतों के पद गाती है: निवृत्ति, सोपान और ज्ञानेश्वर मेरे अपने हैं; नामदेव मेरे पिता, राजाई मेरी माँ, गोरा कुम्हार मेरे काका, और कबीर व सावता मेरे भाई।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

चक्की पर विट्ठल

परंपरागत कथा

महीपति लिखते हैं कि रात का एक पहर बाक़ी था, जब विट्ठल जनी के बिछौने पर आए और उसे जगाया: उठो जनी, देर हो रही है; मैंने चक्की झाड़ दी है और तुम्हारी राह देख रहा हूँ। फिर उन्होंने उसकी चोटी गूँथी, उसे चक्की के पास बिठाया, और कहा: चक्की मैं घुमाऊँगा, तुम बस हत्थे पर हाथ रखकर प्रेम से गाती रहो।

जनी का गाना सुनकर गोणाई लाठी लेकर आईं कि किस मज़दूरिन को बुलाकर अनाज दे रही हो। उन्होंने जनी को मारा, पर चोट भगवान के सिर पर लगी, और भगवान बोले: मेरा नाम विठाई है, मैं जनी की पिसाई में हाथ बँटाने आता हूँ। नामदेव ने माँ से कहा: तुमने जगत के जीवन को मारा है। गोणाई बहुत पछताईं।

जनी का कंबल और भगवान का हार

परंपरागत कथा

जल्दी में लौटते हुए भगवान अपना क़ीमती वस्त्र भूलकर जनी का काला कंबल ओढ़ गए, और अपना रत्नों का हार वहीं छोड़ गए। सुबह पुजारियों ने विट्ठल को कंबल में देखा, और जनी पर हार चुराने का आरोप लगा। उसके कपड़ों में मोतियों की माला मिली, तो उसे चंद्रभागा के किनारे सूली पर चढ़ाने ले जाया गया।

जनी ने भगवान को पुकारा: मैं अनाथ हूँ, असहाय हूँ; मेरी सहायता को कौन दौड़ेगा? महीपति के अनुसार ज़मीन में गड़ी लोहे की सूली उसी क्षण पानी बन गई, और पुजारियों ने कहा: धन्य है जनी की भक्ति।

जब भगवान ने जनी के पद लिखे

परंपरागत कथा

एक दिन जनी अपनी झोपड़ी में बैठी भगवान पर पद रच रही थी, और मंदिर में बैठे विट्ठल क़लम-दवात लेकर उन्हें अपने हाथ से लिखने लगे। तभी ज्ञानेश्वर आ गए। भगवान ने काग़ज़ छिपाया, पर ज्ञानदेव के पूछने पर बोले: मैं जनी के पद लिख रहा हूँ।

ज्ञानदेव हँसे: आपकी स्तुति तो सरस्वती, वेद और पुराण गाते हैं; जनी के पद लिखेंगे तो कवि हँसेंगे। भगवान ने उत्तर दिया: जनी के पद प्रेम से भरे हैं; आज वे मुझे बहुत प्यारे लगे, इसलिए सुनते ही लिखने बैठ गया।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

घर का काम ही पूजा

जनाबाई की कथाओं में भक्ति मंदिर या तीर्थ में नहीं, चक्की, झाड़ू और घर के काम में है। काम करते हुए नाम लेना और गाना, यही उनकी साधना थी, और महीपति के अनुसार इसी प्रेम के कारण भगवान उनका हाथ बँटाने आते थे।

Ranade लिखते हैं कि महाराष्ट्र की महिला संतों की कथाओं में भगवान घर के रोज़ के काम में उनकी मदद करते हैं, ताकि वे घरवालों से छिपे बिना उनकी सेवा कर सकें। Ranade चेताते हैं कि ऐसी कथाओं में ईश्वरीय सहायता को सस्ता बना देने का ख़तरा है, पर उनके पीछे की नैतिक सीख इससे कहीं बड़ी है।

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परअभंग — महीपति की कथा में भगवान ने संतों के पद लिखने वाले नियुक्त किए, और कहा कि नामदेव की जनी के पद वे ख़ुद लिखेंगे। जनाबाई के अभंग वारकरी परंपरा में गाए जाते हैं, पर उनका मूल मराठी संग्रह हमने अभी पढ़ा नहीं है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतRanade महाराष्ट्र के संतों में स्त्रियों का होना इस आंदोलन की ख़ास बात मानते हैं, और मुक्ताबाई के साथ "जनी" का नाम लेते हैं। उनके अनुसार यह आंदोलन ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष, पढ़े-अनपढ़, सब तक पहुँचा।

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स्रोत

संत जनाबाई — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न