संत चोखामेला

पंढरपुर के महार संत, जिन्हें मंदिर के द्वार से आगे जाने का अधिकार न था

संक्षेप में

जिसे मंदिर के भीतर जाने का अधिकार न था, वह रोज़ महाद्वार पर माथा टेककर लौट जाता था। लोग ताना देते, तो कहता: सूरज कितनी दूर से कमल का ध्यान रखता है। वही चोखामेला, पंढरपुर के महार संत, आज वारकरी परंपरा में सबसे आदर से याद किए जाते हैं।

संत-कविवारकरी परंपरा

एक नज़र में

संत चोखामेला — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कविमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 210
परंपरावारकरी परंपरामहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 23, ओवी 6–10; Ranade, Rise of the Maratha Power (1900), p. 162
कालनामदेव और ज्ञानदेव का समय (तेरहवीं-चौदहवीं सदी); महीपति उन्हें उसी संत-मंडली में गिनते हैं (परंपरागत कथा)महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 195–198; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 34
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)संत नामदेवमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 195–198; अध्याय 23, ओवी 26; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 34

जीवन

महाद्वार पर भक्ति

परंपरागत कथा

महीपति के अनुसार चोखामेला महार जाति के थे, और पंढरपुर में ही अपने परिवार के साथ रहते थे। रोज़ वे भीमा के किनारे नहाते, नगर की परिक्रमा करते, और मंदिर के महाद्वार पर आकर साष्टांग प्रणाम करते। भीतर जाने का अधिकार उन्हें न था, इसलिए दूर से ही मन में विट्ठल की पूजा करते।

एक दिन कुछ लोगों ने ताना दिया: अगर विठोबा तुमसे प्रेम करते, तो तुम्हें भीतर बुला लेते। चोखा ने उन्हें प्रणाम करके कहा: माई-बाप, मुझे इतना बड़ा सम्मान क्यों चाहिए? सूरज लाखों कोस ऊपर से भी कमल का ध्यान रखता है, चंद्रमा दूर से चकोर पर प्रेम बरसाता है, और कछुई दूर से अपने बच्चों को देखती रहती है। वैसे ही भगवान मुझे अपने मंदिर से ही याद रखते हैं।

नदी के उस पार

परंपरागत कथा

जब पुजारियों ने चोखा को नगर छोड़कर नदी के उस पार रहने का आदेश दिया, तो उनकी आँखें भर आईं: "माई-बाप, मैं तो आपका सेवक हूँ, आपका झाड़ू लगाने वाला; इतने दिन सँभाला, अब निकाल रहे हो।" उन्होंने मंदिर के ठीक सामने, नदी के उस पार, दीपों का एक स्तंभ बनाया और वहीं रहने लगे।

महीपति लिखते हैं कि उनके समय में भी पंढरपुर आने वाले यात्री वह दीप-स्तंभ देखते थे।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

जब विट्ठल ख़ुद भीतर ले गए

परंपरागत कथा

महीपति की कथा है कि उसी रात विट्ठल ने चोखा का हाथ पकड़ा और उन्हें गर्भगृह में ले गए। भगवान ने कहा: मैं नामा के साथ भोजन कर रहा होऊँ, तब भी तुम्हारी याद मेरे मन में रहती है।

द्वार के पास सोया पुजारी जाग गया। ताले वैसे के वैसे लगे थे, फिर भी भीतर चोखा की आवाज़ थी। पूछने पर चोखा ने कहा: मैं आपका बच्चा हूँ; साँवले भगवान ही हाथ पकड़कर मुझे ज़बरदस्ती भीतर ले आए, मुझे क्षमा करें।

स्रोतों में अंतर

Ranade भी यही उत्तर देते हैं ("भगवान मुझे ज़बरदस्ती भीतर ले गए"), पर उनकी कथा आगे अलग है: ब्राह्मणों ने वहाँ के मुसलमान हाकिम से शिकायत की, जिसने चोखा को बैलों की जोड़ी से बाँधकर घसीटवाने का आदेश दिया, पर बैल अपनी जगह से हिले ही नहीं।

नीम के नीचे भोजन

परंपरागत कथा

नदी के उस पार एक दिन चोखा नीम की छाँव में भोजन कर रहे थे, और भगवान आकर उनके पास बैठ गए। पत्नी दही परोस रही थीं, तो थोड़ा दही उछलकर भगवान के पीतांबर पर गिर गया। चोखा ने कहा: तुमसे भूल हुई, भगवान का पीला वस्त्र गंदा हो गया। यह सुनकर पास खड़ा एक पुजारी भड़क उठा कि एक महार के साथ भगवान कैसे खा सकते हैं, और उसने चोखा को थप्पड़ मार दिया।

पुजारी मंदिर पहुँचा, तो देखा कि विट्ठल का पीतांबर दही से सना है और गाल सूजा हुआ है। वह समझ गया कि भक्त को दी गई चोट भगवान ने अपने ऊपर ली है। वह दौड़कर चोखा के पास गया, क्षमा माँगी, और हाथ पकड़कर उन्हें मंदिर में ले आया। महीपति के अनुसार उस दिन से चोखामेला रोज़ मंदिर में जाने लगे।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

भगवान को कोई अपवित्र नहीं कर सकता

जब पुजारियों ने कहा कि तुमने भगवान को अपवित्र कर दिया, तो चोखा ने उत्तर दिया: गंगा में ब्राह्मण भी नहाता है और अछूत भी, तो क्या गंगा को दोष दोगे? धरती पर सब जातियाँ चलती हैं, वह अपवित्र कैसे हुई? हवा किसी बुरे आदमी को छू ले, तो उसकी बुराई हवा में नहीं आ जाती। भगवान सब जगह भरे हैं, फिर भी किसी से बँधे नहीं; उनके लिए सब जातियाँ बराबर हैं।

Ranade चोखामेला का यह उपदेश देते हैं: भक्ति और श्रद्धा न हो, तो ऊँची जाति, कर्मकांड या विद्या से क्या मिलेगा? कोई नीची जाति का हो, पर मन से श्रद्धावान हो, भगवान से प्रेम करे, सब जीवों को अपने जैसा माने, अपने और पराए बच्चों में भेद न करे और सच बोले, तो उसकी जाति शुद्ध है। जिसके मन में भगवान पर श्रद्धा और मनुष्यों से प्रेम है, उसकी जाति कभी मत पूछो।

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परअभंग — महीपति की कथा में भगवान संतों के पद लिखने वालों को नियुक्त करते हैं, और चोखामेला के पद लिखने का काम अनंत भट्ट नाम के एक ब्राह्मण को मिलता है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतRanade लिखते हैं कि महाराष्ट्र के संतों में लगभग आधे ब्राह्मणेतर थे, कुछ तो बहुत नीची मानी जाने वाली जातियों से, यहाँ तक कि महार भी। वे इन संतों के जाति-भेद के विरोध का सबसे मार्मिक उदाहरण चोखामेला के मंदिर-प्रवेश की कथा को मानते हैं।

क्षेत्रीय परंपराMacauliffe के अनुसार पंढरपुर में विठोबा मंदिर की सीढ़ी के नीचे नामदेव की समाधि के ठीक सामने चोखा की समाधि है, जो महार जाति के थे।

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स्रोत

संत चोखामेला — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न