FAQ
संत चोखामेला — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चोखामेला पंढरपुर के विट्ठल के भक्त थे, जो महार जाति के थे, जिसे उस समय अछूत माना जाता था। महीपति उन्हें नामदेव और ज्ञानदेव की संत-मंडली में गिनते हैं, और वारकरी परंपरा उन्हें बड़े आदर से याद करती है।
उस समय महार जाति के लोगों को मंदिर के भीतर जाने का अधिकार नहीं था। महीपति के अनुसार चोखा रोज़ महाद्वार पर प्रणाम करके लौट जाते थे, और दूर से ही मन में विट्ठल की पूजा करते थे।
पुजारियों के आरोप पर उन्होंने कहा कि गंगा में सब नहाते हैं, धरती पर सब चलते हैं, फिर भी गंगा और धरती अपवित्र नहीं होतीं। भगवान के लिए सब जातियाँ बराबर हैं। Ranade के अनुसार उन्होंने कहा कि श्रद्धावान की जाति कभी मत पूछो।
महीपति के अनुसार एक पुजारी ने चोखा को थप्पड़ मारा। मंदिर पहुँचकर उसने देखा कि विट्ठल का गाल सूजा है। उसे समझ आया कि भक्त की चोट भगवान ने ली है, और वह क्षमा माँगकर चोखा को मंदिर में ले आया।
Macauliffe के अनुसार पंढरपुर में विठोबा मंदिर के पास, नामदेव की समाधि के ठीक सामने। उनकी मृत्यु की प्रचलित कथा हमें पढ़े गए स्रोतों में नहीं मिली, इसलिए यहाँ नहीं दी गई।
