संत नामदेव

पंढरपुर के विट्ठल के भक्त, जिनकी वाणी मराठी से पंजाब तक पहुँची

संक्षेप में

एक बालक ने विट्ठल के आगे दूध का कटोरा रखा और रोने लगा: पी लो, नहीं तो पिता नाराज़ होंगे। कथा कहती है कि भगवान ने वह दूध पिया। यही बालक संत नामदेव बना, पंढरपुर के विट्ठल का ऐसा भक्त, जिसके पद मराठी से चलकर गुरु ग्रंथ साहिब तक पहुँचे।

संत-कविवारकरी परंपरागुरु ग्रंथ साहिब में वाणी

एक नज़र में

संत नामदेव — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कविMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; pp. 21, 33
परंपरावारकरी परंपरा, गुरु ग्रंथ साहिब में वाणीMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 23–24, 34; महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 4; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; p. 40
कालतेरहवीं-चौदहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म शके 1192 (1270 ई.) और देह-त्याग 1350 ई. (परंपरागत कथा)Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 18, 34
इनसे प्रेरित (संत की अपनी वाणी में)संत धन्नाMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 109
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)संत ज्ञानेश्वरमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 10, ओवी 10–53
इनसे प्रेरित (परंपरागत कथा)संत तुकाराममहीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), अध्याय 26, ओवी 116–121, p. 38; अध्याय 32, ओवी 34–43, pp. 149–150
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)संत चोखामेलामहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 195–198; अध्याय 23, ओवी 26; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 34
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)संत जनाबाईमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 14–21, 91

जीवन

जन्म: दो कथाएँ

मत अलग-अलग

Macauliffe के अनुसार नामदेव के पिता दामाशेटी दर्ज़ी थे और सतारा ज़िले में कराड के पास नरसी बामणी गाँव में रहते थे। माँ का नाम गोणाबाई था। वे लिखते हैं कि नामदेव का जन्म कार्तिक शुक्ल एकादशी, रविवार, शके 1192 (1270 ई.) को हुआ।

महीपति की भक्तविजय में कथा अलग है। वहाँ दामाजी दर्ज़ी और उनकी पत्नी गोणाई पंढरपुर में रहते थे और बूढ़े हो चले थे, पर संतान न थी। विट्ठल ने सपने में कहा कि सुबह भीमा नदी में एक बालक बहता आएगा। दामाजी को नदी में एक सीप मिली, और उसमें एक सुंदर बालक, जिसका नाम उन्होंने "नामा" रखा।

Macauliffe ख़ुद लिखते हैं कि अलग-अलग प्रांतों में चलने वाली नामदेव की कथाएँ ज़्यादातर सही नहीं हैं, और उनकी जीवनी का सबसे भरोसेमंद स्रोत तुकाराम तात्या की छापी "गाथा" है, हालाँकि उसमें भी कई अतिशयोक्तियाँ हैं।

दर्ज़ी का बेटा, जिसका मन काम में नहीं लगा

परंपरागत कथा

Macauliffe के अनुसार बालक नामदेव पढ़ाई में आगे नहीं बढ़ा; मौक़ा मिलते ही वह सहपाठियों को इकट्ठा करके भगवान के गीत गवाने लगता। पिता ने अपना काम सिखाया, फिर व्यापार में लगाया, पर नामदेव ने उधार की पूँजी से ब्राह्मणों को भोज करा दिया। माँ ने बहुत डाँटा, पर मंदिर के पुजारियों ने कहा कि तुम्हें तो संत पुत्र मिला है।

आठ बरस की उम्र में उनका विवाह राजाबाई से तय हुआ, और Macauliffe के अनुसार उनके चार बेटे और एक बेटी हुए।

गुरु विसोबा खेचर

परंपरागत कथा

Macauliffe एक कथा देते हैं: नामदेव संत विसोबा खेचर को खोजते हुए एक शिव-मंदिर में पहुँचे, तो देखा कि एक कोढ़ी बूढ़ा शिवलिंग पर पाँव रखकर लेटा है। नामदेव ने उसे डाँटा और उसके पाँव दूसरी ओर कर दिए, पर वहाँ भी पाँव के नीचे शिवलिंग था। बूढ़े ने कहा, "मैं ही विसोबा हूँ; मुझे कोई ऐसी जगह नहीं मिलती, जहाँ भगवान न हो।"

नामदेव उनके शिष्य बने। बाद में उन्होंने एक मित्र से कहा कि विसोबा ने ही मुझे सिखाया कि भगवान हर जगह है, और खेचर की कृपा से मैंने भगवान को अपने हृदय में देखा। यही विसोबा महीपति की कथा में ज्ञानेश्वर से जुड़े "विसोबा खेचर" हैं।

पंढरपुर, और अंतिम विश्राम

मत अलग-अलग

Macauliffe के अनुसार मराठी इतिहास कहता है कि नामदेव ने 1350 ई. में अस्सी बरस की उम्र में देह छोड़ी, और पंढरपुर में विठोबा मंदिर की सबसे निचली सीढ़ी के नीचे उन्हें समाधि दी गई, क्योंकि उनकी इच्छा थी कि संतों के चरणों की धूल उनके सिर पर पड़े। उस सीढ़ी पर पीतल में ढला उनका सिर आज भी पूजा जाता है।

पंजाब के गुरदासपुर ज़िले में घुमान गाँव में भी नामदेव का एक स्थान है, और वहाँ के अनुयायी मानते हैं कि उनका अंतिम संस्कार वहीं हुआ। Macauliffe बताते हैं कि नामदेव पचपन बरस की उम्र में गुरदासपुर आए थे, पर पंढरपुर के अनुयायी घुमान वाली बात को दृढ़ता से नहीं मानते।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

विट्ठल ने भोग खाया

परंपरागत कथा

महीपति के अनुसार एक दिन पिता बाज़ार गए थे, तो माँ ने बालक नामा को भोग की थाली देकर मंदिर भेजा। नामा ने विट्ठल को स्नान कराया, पीला वस्त्र पहनाया, चंदन-फूल चढ़ाए, और थाली रखकर हाथ जोड़े: "अब खाइए।" उसके मन में कोई संदेह न था कि भगवान भोग खाते हैं।

मूर्ति ने कुछ नहीं खाया, तो नामा रोने लगा: "आप नहीं खाएँगे तो माँ मुझ पर नाराज़ होगी; मुझसे क्या भूल हुई?" उसके निर्मल मन को देखकर भगवान ने उसे गले लगाया और भोग खाया।

स्रोतों में अंतर

Macauliffe की कथा में भोग दूध का है, और वे गुरु ग्रंथ साहिब का नामदेव का पद (राग भैरो) देते हैं, जिसमें नामा अपनी भूरी गाय दुहकर दूध का कटोरा ले जाता है और कहता है: "दूध पी लो, नहीं तो पिता नाराज़ होंगे।" Macauliffe के अनुसार यह मंदिर नरसी बामणी के केशिराज का था, जबकि महीपति इसे पंढरपुर के विट्ठल का बताते हैं।

जब मंदिर घूम गया

परंपरागत कथा

एक तीर्थ में औंढ्या नागनाथ के मंदिर में नामदेव ज़ोर-ज़ोर से भजन गाने लगे और भीड़ जुट गई। पुजारियों को नीची जाति के लोगों के छू जाने का डर था, इसलिए उन्होंने नामदेव को मारा, उनकी करताल छीन ली, और मंदिर के पीछे भेज दिया। नामदेव ने कहा कि भगवान के मंदिर में कोई ऊँचा-नीचा नहीं होता।

नामदेव मंदिर के पीछे बैठकर गाने लगे। कथा कहती है कि भगवान ने उनका गीत सुनकर मंदिर ही घुमा दिया, ताकि उसका द्वार नामदेव की ओर हो जाए। गुरु ग्रंथ साहिब के दो पदों (राग मलार और भैरो) में नामदेव ख़ुद यह प्रसंग गाते हैं: पंडितों ने मुझे शूद्र कहकर मारा और निकाल दिया, पर भगवान ने मंदिर का मुख नामा की ओर कर दिया।

बादशाह और मरी हुई गाय

परंपरागत कथा

गुरु ग्रंथ साहिब के एक पद (राग भैरो) में नामदेव गाते हैं: बादशाह ने उन्हें पकड़वाकर कहा कि अपने विट्ठल का कमाल दिखाओ, इस मरी हुई गाय को ज़िंदा करो, नहीं तो सिर काट दूँगा। नामदेव ने कहा कि मरे को कोई मनुष्य ज़िंदा नहीं कर सकता, जो होता है भगवान करते हैं। उन पर मतवाला हाथी छोड़ा गया, पर भगवान ने उन्हें बचा लिया।

पद के अनुसार अंत में भगवान गरुड़ पर आए और गाय फिर दूध देने लगी। बादशाह ने क़ाज़ियों और मुल्लाओं के ज़रिए क्षमा माँगी, और नामदेव ने कहा कि यह चमत्कार इसलिए है कि बादशाह सच्चाई और नम्रता के मार्ग पर चले। Macauliffe इस बादशाह को मुहम्मद बिन तुग़लक़ मानते हैं।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

भगवान हर जगह

नामदेव की सीख का मूल उनके गुरु विसोबा की कथा में है: ऐसी कोई जगह नहीं, जहाँ भगवान न हो। Macauliffe बताते हैं कि नामदेव समझाते थे कि भगवान और उसकी मूर्ति अलग नहीं, जैसे दीपक और उसकी रोशनी, फूल और उसकी सुगंध, सूरज और उसकी किरणें।

नामदेव मन को भगवान में ऐसे टिकाने को कहते हैं, जैसे कुएँ से लौटती स्त्री सहेलियों से बात करते हुए भी सिर पर रखे घड़े का ध्यान रखती है, या जैसे चरती हुई गाय का मन अपने बछड़े में रहता है: संसार के काम करते हुए भी हृदय में भगवान।

प्रेम ही मज़दूरी

एक बार तूफ़ान में नामदेव की झोपड़ी की छत उड़ गई, और किसी ने रातों-रात उसे फिर छा दिया। पड़ोसिन ने पूछा, यह बढ़ई किसने भेजा, मैं उसे दुगुनी मज़दूरी दूँगी। गुरु ग्रंथ साहिब के पद (राग सोरठ) में नामदेव उत्तर देते हैं: बहन, मेरा बढ़ई तुझे नहीं मिल सकता; वह सब जगह है, और उसकी मज़दूरी बस प्रेम है।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंअभंग (मराठी) — नामदेव ने पंढरपुर लौटकर अपने अभंग रचे, जो लोगों की ज़ुबान पर तेज़ी से फैले। Macauliffe के अनुसार उनकी वाणी "नामदेव गाथा" में है, जो ज़्यादातर मराठी में है।

गुरु ग्रंथ साहिब मेंगुरु ग्रंथ साहिब में नामदेव के पद — Macauliffe के अनुसार "नामदेव गाथा" में एक सौ दस हिंदी पद हैं, और गुरु ग्रंथ साहिब के नामदेव के पद उन्हीं में से चुने गए। Macauliffe इन्हें नामदेव के जीवन के तीन दौरों से जोड़ते हैं: बचपन, जवानी और बुढ़ापा।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

ऐतिहासिक प्रमाणनामदेव उन कुछ संतों में हैं, जिनकी वाणी मराठी और हिंदी दोनों में मिलती है, और जो महाराष्ट्र से पंजाब तक याद किए जाते हैं। गुरदासपुर के घुमान में उनका स्थान है, जहाँ हर साल माघ में मेला लगता है।

संत की अपनी वाणी मेंधन्ना ने गुरु ग्रंथ साहिब के अपने एक पद में नामदेव को सबसे पहले याद किया है: नामदेव का मन गोविंद में लगा, और आधी दमड़ी का छीपी लाख का हो गया।

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परंपरा

लेख

भक्ति-पाठ

तीर्थ

स्रोत

संत नामदेव — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न