हित हरिवंश

राधावल्लभ संप्रदाय के संस्थापक, जिनकी भक्ति में राधा के चरण सबसे ऊपर हैं

संक्षेप में

घर-बार छोड़कर वृंदावन जाते एक भक्त को रास्ते में एक ब्राह्मण मिला, जिसने कहा: भगवान की आज्ञा है, मेरी दोनों बेटियों से विवाह करो और यह राधावल्लभ की मूर्ति ले जाओ। यही हित हरिवंश थे, जिनकी भक्ति में नाभादास के अनुसार राधा के चरण सबसे ऊपर थे।

सगुण भक्त-कविकृष्ण-भक्ति

एक नज़र में

हित हरिवंश — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसगुण भक्त-कविGrowse, Mathura: A District Memoir (1883), p. 203; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 90, p. 95
परंपराकृष्ण-भक्तिभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 90, p. 95; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 199–200
कालसोलहवीं सदी; Growse के अनुसार जन्म विक्रम संवत् 1559 (लगभग 1502 ई.) (परंपरागत कथा)Growse, Mathura: A District Memoir (1883), p. 199

जीवन

देवबन के व्यास का पुत्र

परंपरागत कथा

Growse के अनुसार हरिवंश के पिता व्यास सहारनपुर ज़िले के देवबन के गौड़ ब्राह्मण थे, जो बहुत दिनों तक निःसंतान रहे। वे बादशाह की सेवा में थे और एक बार आगरा से कूच के समय साथ थे, तभी मथुरा के पास बाद गाँव में, संवत् 1559 में, पत्नी तारा ने पुत्र को जन्म दिया। माता-पिता ने उसका नाम उसी देवता पर रखा, जिससे उन्होंने प्रार्थना की थी: हरिवंश, यानी "हरि की संतान"।

बड़े होकर उन्होंने रुक्मिणी से विवाह किया, जिनसे दो बेटे और एक बेटी हुए। Growse के अनुसार छोटे बेटे गोपीनाथ के वंशज आज भी देवबन में हैं। बेटी का विवाह करने के बाद हरिवंश ने संसार छोड़कर अकेले वृंदावन जाने का निश्चय किया।

वृंदावन में राधावल्लभ

परंपरागत कथा

Growse के अनुसार वृंदावन पहुँचकर हरिवंश ने यमुना किनारे, जुगल और कोलिया घाट के बीच, एक मंदिर बनाया और उसमें राधावल्लभ की वह मूर्ति स्थापित की, जो उन्हें रास्ते में मिली थी। पहले वे माध्व संप्रदाय से जुड़े थे, और निंबार्की भी उन्हें अपना मानते हैं।

आज का राधावल्लभ मंदिर, जो इस संप्रदाय का मुख्य मंदिर है, Growse के अनुसार उनके एक शिष्य, दिल्ली के ख़ज़ांची सुंदरदास कायस्थ, ने बनवाया; उसके सामने के एक खंभे पर संवत् 1683 लिखा है।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

चरथावल का ब्राह्मण

परंपरागत कथा

Growse के अनुसार वृंदावन जाते हुए हरिवंश होडल के पास चरथावल पहुँचे थे, तभी एक ब्राह्मण मिला। उसने कहा कि सपने में मिली भगवान की आज्ञा से वह अपनी दोनों बेटियों का विवाह उनसे करना चाहता है, और उन्हें कृष्ण की एक मूर्ति भी दी, जिसका नाम "राधावल्लभ" था।

प्रियादास की टीका यही बात कहती है: "विप्र बड़भाग हरि आज्ञा दई जानियै। तेरी उभै सुता ब्याहि देवौ लेवौ नाम मेरौ, इनकौ जो वंस सो प्रशंस जग मानियै", यानी भाग्यवान ब्राह्मण को हरि की आज्ञा हुई कि अपनी दोनों बेटियाँ इन्हें ब्याह दो और मेरा नाम लो; इनका जो वंश होगा, जग उसकी प्रशंसा करेगा।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

राधा के चरण सबसे ऊपर

नाभादास का छप्पय हरिवंश की भक्ति का सार देता है: "(श्री) हरिवंश गुसाँईं भजन की, रीति सकृत् कोउ जानिहै। (श्री) राधाचरण प्रधान, हृदै अति सुदृढ़ उपासी", यानी हरिवंश गोसाईं की भजन-रीति को एक बार में कौन समझ सकता है? उनके हृदय में राधा के चरण सबसे ऊपर थे, और वे अत्यंत दृढ़ उपासक थे।

छप्पय आगे कहता है कि वे कुंजों में युगल की केलि में "खवास", यानी सेवक, बने रहते; भगवान के महाप्रसाद को ही सर्वस्व मानते; विधि-निषेध के दास नहीं, अनन्य और उत्कट व्रतधारी थे। प्रियादास इसे और स्पष्ट करते हैं: "राधा ही प्रधान मानै, पाछे कृष्ण ध्याइयै", पहले राधा, फिर कृष्ण।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंचौरासी पद और राधा-सुधा-निधि — Growse के अनुसार हरिवंश ने दो काव्य रचे: हिंदी में "चौरासी पद" (84 पद), और संस्कृत में "राधा-सुधा-निधि" ("राधा के आनंद का ख़ज़ाना"), 170 श्लोकों का। उस पर बंसीधर की संवत् 1820 की एक हिंदी टीका भी मिलती है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

ऐतिहासिक प्रमाणGrowse के अनुसार वृंदावन में चैतन्य के गौड़ीय वैष्णवों के अलावा दो नए संप्रदाय बने: राधावल्लभी, जिनके संस्थापक हरिवंश थे, और स्वामी हरिदास के शिष्य। राधावल्लभ मंदिर के गोसाईं हरिवंश के बेटे ब्रजचंद के वंशज हैं।

स्रोत

हित हरिवंश — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न