तिरुज्ञान संबंदर

शीयाली के बाल-संत, जिनके पद तमिल शैव भजन-संग्रह "देवारम्" में सबसे पहले आते हैं

संक्षेप में

तीन बरस का एक बालक मंदिर के तालाब के किनारे रो रहा था। परंपरा कहती है कि शिव की अर्धांगिनी उमा ने उसे दूध पिलाया, और उसी क्षण उसके मुँह से पहला पद फूटा। यही तिरुज्ञान संबंदर थे, जिनके पद तमिल शैवों के भजन-संग्रह देवारम् में सबसे पहले रखे गए।

नायनारनायनार (तमिल शैव)

एक नज़र में

तिरुज्ञान संबंदर — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीनायनारHymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 10–11; Pope, The Tiruvacagam (1900), p. lxxvi
परंपरानायनार (तमिल शैव)Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 11; Pope, The Tiruvacagam (1900), p. lxxvi
कालसातवीं सदी ई. का पहला आधा; पल्लव-चालुक्य युद्ध (642 ई.) के एक सेनापति के समकालीन (आधुनिक विद्वानों का मत)Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 10–11
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)अप्पर (तिरुनावुक्करसर)Hymns of the Tamil Saivite Saints, p. 36

जीवन

शीयाली का बालक

परंपरागत कथा

Kingsbury बताते हैं कि सातवीं सदी के पहले आधे में तमिल देश में शिव-उपासना बहुत कमज़ोर पड़ गई थी, और जैन व बौद्ध धर्म का ज़ोर था। तंजौर ज़िले के शीयाली नगर के एक शिव-भक्त ने वहाँ के शिव से प्रार्थना की कि मुझे ऐसा पुत्र दो, जो लोगों को फिर शिव की ओर लौटाए। परंपरा कहती है कि संबंदर का जन्म इसी प्रार्थना का उत्तर था।

परंपरा के अनुसार तीन बरस की उम्र में उमा ने उन्हें अपना दूध पिलाया, जिसमें दिव्य ज्ञान घुला था। इसीलिए उनका पूरा नाम पड़ा तिरुज्ञान संबंदर, यानी "दिव्य ज्ञान से जुड़ा हुआ"।

मंदिर-मंदिर गाता यात्री

परंपरागत कथा

संबंदर बड़े होकर कवि-यात्री बने। वे दक्षिण भारत के ज़्यादातर शिव-मंदिरों में गए, और हर जगह वहाँ के शिव की स्तुति में पद गाए। Kingsbury के अनुसार वे तमिल कविता के अनेक छंदों में बहुत कुशल थे।

Kingsbury यह भी साफ़ कहते हैं कि इतिहास संबंदर के बारे में बहुत कम जानता है: कथाएँ उन्हें चमत्कारी बताती हैं, पर उन्हें जानने का भरोसेमंद रास्ता उनके अपने पद ही हैं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

तालाब के किनारे पहला पद

परंपरागत कथा

परंपरा के अनुसार उमा के दूध पिलाने के बाद, शीयाली (पुराना नाम ब्रह्मपुरम्) के मंदिर-तालाब के किनारे, तीन बरस के संबंदर ने अपना पहला पद गाया। Kingsbury के अनुवाद में उसका भाव है: कानों में कुंडल, बैल पर सवार, सिर पर चंद्रमा की किरण, श्मशान की भस्म से उजले; वही तो हैं, जो मेरा मन चुरा ले गए।

Kingsbury बताते हैं कि यह पद अपने आप में दूध वाली कथा का कोई ज़िक्र नहीं करता, फिर भी यह शैव भजन-संग्रह के सबसे जाने-माने पदों में है।

मदुरै का राजा

परंपरागत कथा

Kingsbury के अनुसार मदुरै का पांड्य राजा अपनी बहुत-सी प्रजा के साथ जैन बन गया था, पर रानी और प्रधानमंत्री शैव रहे और उन्होंने संबंदर को बुलवाया। अकेले संबंदर ने राजसभा में जैनों की बड़ी भीड़ का सामना किया, शास्त्रार्थ में उन्हें हराया, और राजा को फिर शैव बनाया।

स्रोतों में अंतर

Kingsbury यह परंपरागत कथा भी दर्ज करते हैं कि शास्त्रार्थ के बाद आठ हज़ार जैनों को सूली पर चढ़ाया गया। यह शैव परंपरा की कथा है; इसका कोई स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण हमारे पढ़े स्रोतों में नहीं।

वैष्णव परंपरा की एक कथा में शीयाली में ही आलवार तिरुमंगई से संबंदर का शास्त्रार्थ होता है, जिसमें तिरुमंगई जीतते हैं और संबंदर सम्मान में उन्हें अपना त्रिशूल देते हैं। Hooper इसे तिरुमंगई की कथा के रूप में देते हैं।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

हर मंदिर में वही एक शिव

Kingsbury बताते हैं कि संबंदर के पदों में हर तीर्थ ऐसे गाया गया है, मानो वही शिव का एकमात्र घर हो: कावेरी के किनारे का नेय्त्तानम् हो या तिरुवण्णामलै की पहाड़ी। उनके पदों का भाव है कि जो इन धामों में शिव को प्रणाम करते हैं, उनके पाप और दुख दूर हो जाते हैं।

तिरुवण्णामलै वाले पद में वे शिव को ऐसा स्वामी कहते हैं, जो साथ ही स्वामिनी भी है: अर्धनारीश्वर, जिनमें उमा उनका ही एक अंग हैं।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंदेवारम् के पद — देवारम् तमिल शैवों के मान्य ग्रंथों में पहला संग्रह है। Kingsbury के अनुसार इसके पद छह सौ से आठ सौ ई. के बीच तीन कवियों ने रचे, और लगभग 1000 ई. में नंबि आंडार नंबि ने इन्हें एक संग्रह में पिरोया। संबंदर के पद इस संग्रह में सबसे पहले आते हैं। धर्मनिष्ठ शैवों के लिए देवारम् का आदर संस्कृत वेदों जितना है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतKingsbury के अनुसार संबंदर उन लोगों में थे, जिन्होंने दक्षिण भारत से बौद्ध धर्म को लगभग बाहर कर दिया, और चार महान "शैव आचार्यों" में उनका स्थान सबसे आगे है। Pope भी लिखते हैं कि तमिल देश में सबसे बड़े शैव संत का सम्मान संबंदर को ही मिलता है।

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स्रोत

तिरुज्ञान संबंदर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न