संत सेना

बांधवगढ़ के राजा के नाई, जिनकी जगह स्वयं भगवान सेवा करने गए

संक्षेप में

राजा की सेवा का समय था, पर रास्ते में साधु मिल गए, और सेन नाई उन्हीं की सेवा में लग गए। भक्तमाल कहती है कि उस दिन भगवान स्वयं सेन का रूप धरकर राजा के पास गए और तेल लगाया। यही संत सेन हैं, जिन्हें सैन भी कहते हैं; उनका एक पद गुरु ग्रंथ साहिब में है।

भक्त संतगुरु ग्रंथ साहिब में वाणी

एक नज़र में

संत सेना — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीभक्त संतभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 63 ("विदित बात जग जानियै…"), पृ. 77
परंपरागुरु ग्रंथ साहिब में वाणीMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; pp. 121–122
कालरामानंद के शिष्य माने जाते हैं, इसलिए चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी में रखे जाते हैं; पक्की तिथि ज्ञात नहीं (परंपरागत कथा)Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 120; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39
गुरु (परंपरागत कथा)स्वामी रामानंदभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 120
समकालीन / प्रसंग में साथ (संत की अपनी वाणी में)संत धन्नाMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 109

जीवन

राजा के नाई

परंपरागत कथा

प्रियादास के अनुसार सेन बांधवगढ़ में रहते थे। Macauliffe बताते हैं कि वे वहाँ के राजा राजाराम के दरबारी नाई थे, और बांधवगढ़ आगे चलकर रीवाँ कहलाया।

Macauliffe समझाते हैं कि उस समय राजा का नाई बहुत-से काम करता था: तेल-मालिश, नाख़ून और बाल काटना, किस्से सुनाना, कभी-कभी गाना भी। इन सब कामों के बीच भी सेन का मन साधुओं की संगत में लगता था, और वे उनकी हर छोटी-बड़ी सेवा करते थे।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

जब भगवान ने राजा को तेल लगाया

परंपरागत कथा

सेन का रोज़ का नियम था कि राजा को तेल लगाने जाएँ। एक दिन रास्ते में संत मिल गए। सेन उन्हें घर ले आए और उनकी सेवा में ऐसे लगे कि राजा का ध्यान ही न रहा।

नाभादास कहते हैं कि प्रभु ने अपने दास का काम करने के लिए नाई का रूप धरा, हाथ में छुरा और दर्पण लिया, और ठीक सेन बनकर राजा को तेल लगा आए।

बाद में सेन घबराते हुए पहुँचे और देर के लिए माफ़ी माँगने लगे। राजा अचरज में पड़ गया: तुम तो अभी-अभी सेवा करके गए हो। सेन ने लज्जित होकर बताया कि घर संत आए थे, मैं आ ही नहीं पाया। राजा समझ गया कि आज कौन आया था, और उनके चरणों में सिर रखकर शिष्य बन गया।

स्रोतों में अंतर

प्रियादास कहते हैं कि राजा के बेटे-पोते भी इसी रीति पर चलते रहे। Macauliffe बताते हैं कि भक्तमाल लिखे जाने तक यह रीति बन गई थी कि बांधवगढ़ के राजा सेन के वंशजों के शिष्य होते थे, और उनके समय तक वे कबीर-पंथी बताए जाते थे।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

नाम की आरती

गुरु ग्रंथ साहिब में सेन का एक पद (राग धनासरी) है, जो आरती के रूप में है: धूप, दीप और घी लेकर मैं तुम्हारी आरती करने चला हूँ, पर सबसे उत्तम दीपक तो तुम्हारा नाम है, और उसका ध्यान सबसे पवित्र बाती। संत ही उस परम आनंद का स्वाद जानते हैं। सेन कहते हैं, उसी परम आनंद को भजो।

साधु-सेवा ही भगवान की सेवा

सेन की पूरी कथा एक ही बात कहती है: संतों की सेवा को उन्होंने राजा की सेवा से बड़ा माना। Macauliffe लिखते हैं कि सेन मानते थे कि संतों की सेवा भगवान की ही सेवा है। नाभादास इसका फल यों कहते हैं: श्याम सेन के सामने ऐसे रहते हैं, जैसे गाय अपने बछड़े के लिए।

रचनाएँ और ग्रंथ

गुरु ग्रंथ साहिब मेंगुरु ग्रंथ साहिब में एक पद (राग धनासरी) — सेन (गुरु ग्रंथ साहिब में "सैण") का एक आरती-पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। Macauliffe ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद दिया है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

संत की अपनी वाणी मेंधन्ना ने गुरु ग्रंथ साहिब के अपने एक पद में सेन को नामदेव, कबीर और रैदास के साथ याद किया है: सेन, जो गाँव-गाँव का जाना-माना नाई था, जिसके हृदय में परमेश्वर बसे, वह संतों में गिना गया।

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स्रोत

संत सेना — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न