संत तुकाराम

देहू के संत, जिन्होंने अकाल में सब खोकर विट्ठल को पाया

संक्षेप में

अकाल में जिसकी पत्नी "अन्न, अन्न" पुकारते हुए चल बसी और बड़ा बेटा भी चला गया, वही तुकाराम पहाड़ पर जाकर विट्ठल को पुकारने लगे। देहू के इस संत के अभंग आज भी वारकरियों की ज़ुबान पर हैं। उनकी कहानी दुख से भक्ति तक पहुँचने की कहानी है।

संत-कविवारकरी परंपरा

एक नज़र में

संत तुकाराम — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कविमहीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), भूमिका, pp. iv–v; अध्याय 32, ओवी 44–55, pp. 150–151
परंपरावारकरी परंपरामहीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), अध्याय 26–40; Ranade, Rise of the Maratha Power (1900), p. 162
कालसत्रहवीं सदी; आम तौर पर माना जाता है कि जन्म 1608 ई. में और देह-त्याग 1649 ई. में हुआ (आधुनिक विद्वानों का मत)महीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), भूमिका, p. iii
प्रेरणा-स्रोत (परंपरागत कथा)संत नामदेवमहीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), अध्याय 26, ओवी 116–121, p. 38; अध्याय 32, ओवी 34–43, pp. 149–150
प्रेरणा-स्रोत (आधुनिक विद्वानों का मत)संत एकनाथमहीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), परिशिष्ट, p. 263
शिष्य (संत की अपनी वाणी में)संत बहिणाबाईबहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), अभंग 1, 21–27, pp. 1, 17–21; महीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), अध्याय 40, ओवी 238, p. 322
समकालीन / प्रसंग में साथ (आधुनिक विद्वानों का मत)समर्थ रामदासRanade, Rise of the Maratha Power (1900), pp. 81–82

जीवन

देहू का एक व्यापारी परिवार

परंपरागत कथा

महीपति के अनुसार तुकाराम पुणे के पास इंद्रायणी नदी के किनारे देहू गाँव में जन्मे। पिता बोल्होबा और माँ कनकाई थीं, और यह परिवार पीढ़ियों से पंढरपुर के विट्ठल का भक्त था। महीपति की कथा में तुकाराम को नामदेव का अवतार कहा गया है।

बड़े भाई सावजी संन्यासी हो गए, इसलिए घर की दुकान तुकाराम ने सँभाली और वे कुशल व्यापारी माने जाने लगे। पहली पत्नी (रखुमाई) को दमे का रोग था, इसलिए माता-पिता ने पुणे के एक धनी साहूकार आपाजी गुलव्या की बेटी से उनका दूसरा विवाह किया।

Abbott अपनी भूमिका में लिखते हैं कि तुका पढ़े-लिखे नहीं थे और कभी पाठशाला नहीं गए; पिता से जो थोड़ा सीखा, वही था। वे संस्कृत नहीं जानते थे, और जाति से शूद्र गिने जाते थे।

अकाल, और सब कुछ छिन जाना

परंपरागत कथा

पहले माता-पिता चल बसे और घर का सारा बोझ तुकाराम पर आ गया। फिर व्यापार डूबा, और एक भयानक अकाल पड़ा। साहूकारों ने उधार देने से मना कर दिया, और बच्चे भूखे रहने लगे।

महीपति के अनुसार बड़ी पत्नी रखुमाई "अन्न, अन्न" पुकारते हुए भूख से मर गईं, और फिर बड़ा बेटा संतोबा भी चल बसा। लोगों ने ताना दिया कि हर समय भगवान का नाम लेने से ही यह हाल हुआ। तुकाराम ने उत्तर दिया: इस अकाल में अनगिनत लोग भूख से मरे; क्या वे सब भगवान का नाम ले रहे थे?

भामनाथ के पहाड़ पर

परंपरागत कथा

इस दुख के बाद तुकाराम ने संसार से मन हटा लिया और अकेले भामनाथ के पहाड़ पर चले गए। वहाँ आँखें बंद करके वे पांडुरंग से पूछते रहे: मैं तुम्हारा ध्यान कैसे करूँ, तुम्हारी स्तुति कैसे गाऊँ, लोगों के बीच कैसे रहूँ?

भाई कान्हा उन्हें खोजते हुए पहाड़ पर पहुँचे, और दोनों देहू लौटे। महीपति के अनुसार इसके बाद तुकाराम भिक्षा पर जीने लगे, और घर-गृहस्थी का काम कान्हा ने सँभाला।

सपने में आज्ञा, सपने में गुरु

परंपरागत कथा

महीपति लिखते हैं कि एक रात पांडुरंग नामदेव का हाथ पकड़े तुकाराम के सपने में आए और कहा: नामदेव ने सौ करोड़ अभंग रचने का प्रण लिया था, जो पूरा नहीं हुआ; बचे हुए अभंग अब तुम रचो। उसी दिन से तुकाराम कीर्तन में अभंग रचने लगे। बालबोध लिपि का अभ्यास न था, फिर भी कोरे काग़ज़ की पोथी बनाकर जैसा मन आया वैसा लिखते गए।

महीपति के अनुसार तुकाराम ने किसी जीवित गुरु से दीक्षा नहीं ली। माघ शुक्ल दशमी, गुरुवार को उन्होंने सपने में देखा कि इंद्रायणी से नहाकर मंदिर जाते हुए एक ब्राह्मण मिले, जिन्होंने उनके सिर पर हाथ रखकर "राम कृष्ण" मंत्र दिया और अपनी परंपरा बताई: राघव चैतन्य, उनके शिष्य केशव चैतन्य, और "मेरा नाम बाबाजी चैतन्य"।

देह-त्याग

मत अलग-अलग

महीपति लिखते हैं कि अंत में आकाश से एक प्रकाशमय विमान आया, और तुकाराम सबके देखते-देखते उसमें बैठकर सदेह वैकुंठ चले गए। Abbott कहते हैं कि परंपरा ने ऐसे जीवन के लिए ऐसा ही अंत उचित माना; इतिहास के पास इसका कोई और विवरण नहीं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

साहूकारी के कागज़ नदी में

परंपरागत कथा

पहाड़ से लौटकर तुकाराम ने कान्हा से घर के सारे रुक्के मँगवाए, जो लोगों ने उनके पिता को उधार के बदले लिखकर दिए थे। उन्होंने कहा कि दूसरों के हाथ गया धन मन को हमेशा बेचैन रखता है: देंगे या नहीं देंगे? इसलिए मैं इन्हें इंद्रायणी में बहा दूँगा।

कान्हा ने पूछा कि हमारे बच्चों का क्या होगा? तब तुकाराम ने कागज़ों के दो हिस्से किए। अपना आधा हिस्सा उन्होंने नदी में डाल दिया और आधा कान्हा को दे दिया: "मुझे अब बस ठंड से बचने को एक कंबल चाहिए; मैं भिक्षा से जी लूँगा।"

पोथियाँ जो डूबी नहीं

परंपरागत कथा

तुकाराम का यश बढ़ा, तो वाघोली के विद्वान रामेश्वर भट्ट ने शिकायत की कि एक शूद्र कीर्तन में वेदों का अर्थ सुना रहा है। तुकाराम ख़ुद उनके पास गए। रामेश्वर ने कहा कि आगे से अभंग मत रचो, और जो रचे हैं, उन्हें अपने हाथों से पानी में डुबो दो। तुकाराम ने इसे भगवान की आज्ञा माना और पोथियाँ कपड़े में पत्थर के साथ बाँधकर इंद्रायणी में डुबो दीं।

फिर वे मंदिर के आगे पत्थर की शिला पर लेट गए और अन्न-जल छोड़ दिया। महीपति के अनुसार तेरह दिन बाद भगवान ने कई लोगों को सपने में कहा कि पोथियाँ निकाल लो, और सुबह लोगों ने देखा कि पोथियाँ लौकी की तरह पानी पर तैर रही हैं, बिल्कुल सूखी।

स्रोतों में अंतर

महीपति आगे बताते हैं कि रामेश्वर भट्ट के शरीर में जलन का रोग हो गया। आळंदी में ज्ञानेश्वर ने उन्हें सपने में कहा कि तुका नामदेव के अवतार हैं, उनकी शरण जाओ। रामेश्वर को पछतावा हुआ, और उन्होंने तुकाराम की प्रशंसा में क्षमा का पत्र देहू भेजा। तुकाराम की प्रचलित मराठी आरती के अंतिम पद में भी "रामेश्वर" की छाप है।

राजा शिवाजी को उपदेश

परंपरागत कथा

महीपति के अनुसार शिवाजी ने तुकाराम को छत्र, घोड़ा और अधिकारी भेजकर बुलाया, पर तुकाराम ने चार अभंग लिखकर मना कर दिया। तब राजा ख़ुद लोहगाँव आए और सोने की मुहरों का थाल उनके आगे रखा। तुकाराम ने कहा: मुझे धन नहीं चाहिए, बस इतना करो कि गले में तुलसी की माला पहनो, एकादशी रखो, और ख़ुद को विठोबा का दास कहो।

कीर्तन सुनकर शिवाजी का मन ऐसा फिरा कि उन्होंने राज छोड़कर वन में बैठने की ठान ली। माँ जीजाबाई रोती हुई तुकाराम के पास आईं। उस रात कीर्तन में तुकाराम ने राजा को समझाया कि हर एक को अपना धर्म निभाना है; क्षत्रिय का धर्म प्रजा की रक्षा है, और भगवान जंगल में नहीं, अपने घर में ही मिलते हैं।

Abbott इस कथा के आगे "अगर यह कथा सच है" लिखते हैं: वे इसे तुकाराम के इस सिद्धांत का उदाहरण मानते हैं कि सब लोग उनकी तरह संसार नहीं छोड़ सकते।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

भगवान घर में ही मिलते हैं

शिवाजी के आगे दिए कीर्तन में तुकाराम की सीख सीधी है: सबमें भगवान देखो, किसी को चोट मत पहुँचाओ, व्यापार में झूठ मत बोलो, भूखे को खिलाओ, और हर समय भगवान का नाम लो। ऐसे जियो, तो भगवान के लिए जंगल जाने की ज़रूरत नहीं; हरि घर में ही मिल जाएँगे।

Ranade लिखते हैं कि तुकाराम, नामदेव और एकनाथ ने संन्यास नहीं लिया, परिवार के बीच ही रहे, और इन संतों ने गृहस्थ-जीवन की पवित्रता को फिर से ऊँचा स्थान दिया।

हर जीव के लिए करुणा

Ranade एक प्रसंग देते हैं: तुकाराम को खेत की रखवाली पर भेजा गया, और चिड़ियाँ उन्हें देखकर उड़ गईं। तुकाराम को लगा कि ज़रूर मुझमें कुछ खोट है, नहीं तो ये मुझसे डरतीं क्यों।

Abbott बताते हैं कि महीपति तुकाराम को बीमारों की सेवा करते, थके हुओं का बोझ उठाते, प्यासे को पानी और भूखे को रोटी देते दिखाते हैं; पशुओं तक का वे ध्यान रखते थे। Abbott के शब्दों में, कोई गुरु न होते हुए भी उन्होंने बुराई का बदला बुराई से न देना सीखा।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंअभंग (गाथा) — तुकाराम ने बैठकर कोई ग्रंथ नहीं लिखा। कीर्तन में जो अभंग उनके मुँह से निकलते, उन्हें साथी संताजी तेली जगनाडे, गंगाधर मवाळ और रामेश्वर भट्ट लिख लेते। Abbott के अनुसार चाकण में संताजी के वंशजों के पास एक पुरानी हस्तलिखित प्रति है, जिसमें 1323 अभंग हैं। बाद के संग्रहों में चार हज़ार से ज़्यादा अभंग तुकाराम के नाम से मिलते हैं, और Abbott का संदेह है कि इनमें से बहुत-से दूसरों के हैं, जिन्होंने अंत में "तुका म्हणे" जोड़ दिया।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतRanade के अनुसार शिवाजी के समय के संतों में सबसे प्रसिद्ध दो थे: देहू के तुकाराम बुवा और चाफळ के रामदास स्वामी। उनके प्रभाव ने उस दौर में लोगों की भावना को भक्ति और लोक-कार्य के ऊँचे स्तर पर बनाए रखा।

आधुनिक विद्वानों का मतRanade लिखते हैं कि एकनाथ और तुकाराम ने अपनी बात लोगों की अपनी भाषा मराठी में कही, और इसके लिए दोनों को ब्राह्मणों का विरोध झेलना पड़ा; दोनों की पोथियाँ पानी में डलवाई गईं।

संबंधित संत

VedikMARG पर आगे पढ़ें

परंपरा

लेख

भक्ति-पाठ

तीर्थ

स्रोत

संत तुकाराम — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न