अप्पर (तिरुनावुक्करसर)

जैन मठ से लौटकर शिव के गायक बने, "वाणी के राजा" तिरुनावुक्करसर

संक्षेप में

माता-पिता बचपन में चल बसे, तो बड़ी बहन ने पाला। भाई जैन धर्म का आचार्य बन गया, पर बहन की प्रार्थना नहीं रुकी। आख़िर वह लौटा और शिव का ऐसा गायक बना कि लोग उसे "वाणी का राजा" कहने लगे। यही अप्पर थे, तिरुनावुक्करसर, देवारम् के तीन कवियों में एक।

नायनारनायनार (तमिल शैव)

एक नज़र में

अप्पर (तिरुनावुक्करसर) — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीनायनारHymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 36; Pope, The Tiruvacagam (1900), p. lxxvi
परंपरानायनार (तमिल शैव)Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 36–37
कालसातवीं सदी ई.; संबंदर के समकालीन और उनसे उम्र में बड़े (आधुनिक विद्वानों का मत)Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 36
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)तिरुज्ञान संबंदरHymns of the Tamil Saivite Saints, p. 36

जीवन

बहन की गोद में पला

परंपरागत कथा

Kingsbury के अनुसार अप्पर वेळ्ळाळ जाति के थे, जो आज भी तमिल देश की आबादी का एक मज़बूत हिस्सा है। बचपन में ही अनाथ हो गए, तो एक स्नेही बड़ी बहन ने उन्हें शिव के भक्त के रूप में पाला।

बहन के दुख का ठिकाना न रहा, जब अप्पर ने पुरखों का धर्म छोड़ा और जैनों के बीच धर्म-आचार्य बन गए। पर बहन की लगातार प्रार्थनाएँ आख़िर रंग लाईं: अप्पर ख़ुद शैव धर्म में लौटे, और फिर अपने देश के राजा को भी शैव बनाया।

"अप्पर", यानी पिता

परंपरागत कथा

उनका पूरा नाम तिरुनावुक्करसु था, यानी "वाणी का राजा"। उनके युवा मित्र संबंदर उन्हें "अप्पर", यानी "पिता" कहकर पुकारते थे, और यही नाम चल पड़ा। वे भी पूरे तमिल देश में घूमे, कभी अकेले, कभी संबंदर के साथ, मंदिर-मंदिर गाते हुए।

Kingsbury बताते हैं कि चित्रों में अप्पर के हाथ में घास छीलने का एक छोटा औज़ार दिखता है, जिससे वे मंदिरों के आँगन के पत्थरों पर उगी घास साफ़ किया करते थे। जैनों ने उन्हें सताया, और उनके चमत्कारी ढंग से बच निकलने की कई कथाएँ हैं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

शरीर पर शिव के नंदी की छाप

परंपरागत कथा

अप्पर के एक पद में भक्त प्रार्थना करता है कि शिव उसे अपने बैल की छाप से दाग़ दें, जैसे स्वामी अपनी संपत्ति पर मुहर लगाता है: "मुझ पर अपने पवित्र नंदी की छाप लगा दो।" Kingsbury के अनुसार परंपरा कहती है कि अप्पर के शरीर पर सचमुच शिव के बैल का चिह्न उभर आया था।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

पाप का बोध, और कृपा की आस

Kingsbury लिखते हैं कि अप्पर के पदों में गहरा धार्मिक स्वभाव दिखता है: पाप और अपनी कमी का गहरा बोध, और भगवान में ऊँचा आनंद। "आत्मा की कड़वी पुकार" वाले पद का भाव है: अच्छाई में जीने की शक्ति मुझमें नहीं, हर दिन पाप से मैला होता हूँ; पढ़ता हूँ पर समझता नहीं; तुम्हें हृदय में नहीं रख पाता। हे ज्योति, हे सबसे पहले, तुम्हारे कमल-जैसे चरण देखने को मैं दूर-दूर भटका।

एक पद में वे कहते हैं कि ब्रह्मा और विष्णु ऊँचाई और गहराई में खोजकर भी शिव के चरण न देख पाए; फिर भी, हे एकमात्र स्वामी, जो खोज से नहीं मिलते, वे कृपा से स्वयं प्रकट होते हैं, मुझे उन चरणों का दर्शन दो।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंदेवारम् के पद — अप्पर के पद देवारम् में हैं, जिसे लगभग 1000 ई. में नंबि आंडार नंबि ने संकलित किया। एक पुरानी कहावत में शिव देवारम् के तीनों कवियों को ऐसे परखते हैं: "संबंदर ने अपनी बड़ाई की, सुंदरर ने धन के लिए मेरी, और मेरे अप्पर ने मेरी, केवल मेरी।" Kingsbury इस कहावत में सच्ची आलोचनात्मक समझ देखते हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतKingsbury के अनुसार अप्पर ने ख़ुद लौटकर अपने राजा को भी शैव धर्म में वापस लाने में भूमिका निभाई। Pope लिखते हैं कि अप्पर के उत्कट पद विद्यार्थी के लिए ख़ास पढ़ने योग्य हैं।

संबंधित संत

VedikMARG पर आगे पढ़ें

लेख

स्रोत

अप्पर (तिरुनावुक्करसर) — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न