आदि शंकराचार्य

कालडी के बालक संन्यासी, जिन्होंने अद्वैत वेदांत को व्यवस्थित रूप दिया

संक्षेप में

नदी में नहाते बेटे का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया। बेटा चिल्लाया: माँ, मैं जा रहा हूँ, संन्यासी होकर मरने की अनुमति दे दो। माँ ने हाँ कही, और वह संन्यासी बनकर पानी से बाहर आया। यही कालडी के शंकर थे, जिन्होंने अद्वैत वेदांत को व्यवस्थित रूप दिया।

आचार्य एवं दार्शनिकअद्वैत वेदांत

एक नज़र में

आदि शंकराचार्य — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीआचार्य एवं दार्शनिकKrishnasami Aiyar, Sri Sankaracharya: His Life and Times, pp. 22–24; Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §45, p. 51
परंपराअद्वैत वेदांतBhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §45, p. 51; Krishnasami Aiyar, Sri Sankaracharya: His Life and Times, pp. 22–23
कालनिश्चित नहीं; Aiyar कामचलाऊ रूप से 788 ई. में जन्म और 828 ई. में देह-त्याग मानते हैं, जबकि एक दूसरा मत उन्हें बहुत पहले रखता है (मत अलग-अलग)Krishnasami Aiyar, Sri Sankaracharya: His Life and Times, pp. 16–18, 71

जीवन

कालडी का बालक

परंपरागत कथा

Aiyar के अनुसार परंपरा शंकर का जन्म-स्थान केरल का कालडी गाँव बताती है, और वे मलाबार के नंबूदिरी ब्राह्मण थे। पिता शिवगुरु और माँ लंबे समय तक निःसंतान रहे और शिव से पुत्र माँगा। माधव के शंकर-विजय में कथा है कि शिव ने माँ से पूछा: कई मूर्ख बेटे चाहिए या एक ज्ञानी पर अल्पायु बेटा? माँ ने दूसरा चुना।

सात बरस की उम्र में, यज्ञोपवीत से पहले, पिता चल बसे; माँ ने संस्कार कराया और उन्हें वेद पढ़ने भेजा। Aiyar उस दावे को नहीं मानते कि आठ बरस में सारे शास्त्र पूरे कर लिए; उनके अनुसार शंकर युवा होकर ही गुरु के घर से लौटे होंगे।

गुरु गोविंद भगवत्पाद

परंपरागत कथा

संन्यास के बाद शंकर गुरु की खोज में निकले और नर्मदा के किनारे गोविंद नाम के संन्यासी के आश्रम पहुँचे, जिनके गुरु गौडपाद थे। Aiyar लिखते हैं कि गोविंद के बारे में इससे ज़्यादा कुछ नहीं पता कि उन्होंने शंकर को उनके दर्शन के बीज दिए; पर शंकर अपनी हर रचना में स्वयं को "श्री गोविंद भगवत्पाद का शिष्य" लिखते हैं।

माधव के अनुसार जब गुरु ने पूछा "तुम कौन हो?", तो शंकर ने उत्तर दिया: "मैं न अग्नि हूँ, न वायु, न पृथ्वी, न जल; मैं वह परमात्मा हूँ, जो सब रूपों के नीचे चमकता है।" Aiyar इस पर चुटकी लेते हैं कि यहाँ शंकर अद्वैत सीखने से पहले ही अद्वैत बोल रहे हैं; चिद्विलास की कथा में उत्तर सीधा-सादा है: मैं केरल के शिवगुरु का बेटा हूँ।

शिक्षा के बाद गुरु ने उन्हें पहले काशी जाने को कहा। Aiyar के अनुसार वहीं शंकर ने शिष्य बनाने, ग्रंथ लिखने और अपने दर्शन का प्रचार करने का काम शुरू किया।

केदारनाथ में अंत

मत अलग-अलग

Aiyar के अनुसार अंतिम दिनों में शंकर रोग से कमज़ोर हो चुके थे। उन्होंने बदरी में मठ और नारायण का मंदिर बनाया, और फिर केदारनाथ चले गए। वहीं माधव और कई दूसरों के अनुसार बत्तीस बरस की उम्र में, या एक दूसरी परंपरा के अनुसार अड़तीस बरस की उम्र में, उन्होंने देह छोड़ी। Aiyar दूसरा मत मानकर तिथि 828 ई. देते हैं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

मगरमच्छ और संन्यास

परंपरागत कथा

पढ़ाई पूरी होने पर विवाह की बातें चलीं, पर शंकर संन्यास लेना चाहते थे। माँ रो पड़ीं कि बुढ़ापे में अकेली रह जाऊँगी, मेरा अंतिम संस्कार कौन करेगा? शंकर ने वचन दिया कि संन्यासी होकर भी वे माँ की हर ज़रूरत पर आएँगे, फिर भी माँ नहीं मानीं।

एक दिन माँ-बेटा उफनती नदी में नहा रहे थे कि मगरमच्छ ने शंकर का पैर पकड़ लिया। वे चिल्लाए: "माँ, मैं जा रहा हूँ! मुझे संन्यासी होकर मरने की अनुमति दे दो।" माँ ने उसी क्षण कह दिया कि तुम संन्यासी हो, और शंकर संन्यासी बनकर पानी से बाहर आए। Aiyar का अनुमान है कि शायद सचमुच प्राणों का संकट था, और शंकर ने वह "आपत्-संन्यास" लिया, जो मृत्यु निकट होने पर लिया जाता है।

जाने से पहले शंकर ने माँ को रिश्तेदारों की देखरेख में सौंपा और अपनी सारी संपत्ति भी उन्हीं को दे दी। Aiyar बताते हैं कि आगे माँ के अंतिम संस्कार के लिए शंकर ने अपने रूढ़िवादी रिश्तेदारों की नाराज़गी तक झेली।

मंडन मिश्र, और निर्णायक भारती

परंपरागत कथा

शंकर कर्म-मीमांसा के बड़े पंडित मंडन मिश्र के पास शास्त्रार्थ के लिए गए। शर्त यह थी कि हारने वाला जीतने वाले का आश्रम अपनाएगा: शंकर हारे तो गृहस्थ बनेंगे, मंडन हारे तो संन्यासी। निर्णायक बनीं मंडन की विदुषी पत्नी भारती।

माधव के अनुसार भारती ने दोनों के गले में एक-एक माला डाली और कहा कि जिसकी माला पहले मुरझाएगी, वह हारा माना जाएगा। कई दिन बाद मंडन की माला मुरझाने लगी, और उन्होंने हार मानकर संन्यास लेने और शंकर का अनुसरण करने की बात कही। तब भारती बोलीं: अभी तो तुमने मंडन का केवल आधा हिस्सा जीता है; दूसरा आधा मैं हूँ। फिर भारती से भी सत्रह दिन तक शास्त्रार्थ चला।

स्रोतों में अंतर

Aiyar साफ़ कहते हैं कि इस भेंट के माधव वाले वर्णन पर भरोसा नहीं किया जा सकता: उसमें दोनों के बीच पहले तीखी नोक-झोंक है, जिसे वहाँ बैठे ब्राह्मणों ने शांत कराया। उनके अनुसार असली बात यह है कि मंडन जैसे मीमांसक कर्मकांड छोड़ने वाले संन्यासियों को हेय मानते थे।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

एक ही आत्मा

Bhandarkar शंकर के सिद्धांत को ऐसे रखते हैं: अस्तित्व में केवल एक आत्मा है; जीव की व्यक्तिगत पहचान, उसके गुण, और जड़ जगत की विविधता, ये सब एक भ्रम के सिद्धांत (माया) से उपजे हैं, इसलिए परमार्थ में सत्य नहीं। Bhandarkar के अनुसार शंकर गौडपाद के शिष्य के शिष्य थे, और उन्होंने यह सिद्धांत ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों के आधार पर स्थापित किया।

Bhandarkar यह भी दर्ज करते हैं कि आगे के वैष्णव आचार्य इसी मायावाद को भक्ति के लिए ख़तरा मानते थे, और रामानुज व मध्व ने इसका खंडन उन्हीं उपनिषदों के आधार पर किया, जिन पर शंकर ने इसे खड़ा किया था।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंब्रह्मसूत्र, उपनिषद और गीता पर भाष्य — Bhandarkar के अनुसार शंकर ने अद्वैत का सिद्धांत ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों के आधार पर स्थापित किया। Aiyar बताते हैं कि गुरु से शिक्षा के बाद काशी में उन्होंने अपने भाष्य और दूसरे ग्रंथ लिखना शुरू किया। परंपरा ब्रह्मसूत्र के रचयिता बादरायण को वेदव्यास मानती है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

क्षेत्रीय परंपराAiyar के अनुसार शृंगेरी का मठ निस्संदेह शंकर का स्थापित किया हुआ है, और वहाँ उनके उत्तराधिकारियों की सूची रखी है। उन्होंने बदरी में भी मठ बनाया। Aiyar यह भी बताते हैं कि बदरी के नारायण-मंदिर के पुजारी परंपरा से मलाबार के नंबूदिरी होते हैं, जिसे वे शंकर के केरल से होने का एक संकेत मानते हैं।

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तीर्थ

ऋषि

  • महर्षि वेदव्यास — ब्रह्मसूत्र पर शंकर का भाष्य; परंपरा सूत्रकार बादरायण को वेदव्यास मानती है

स्रोत

आदि शंकराचार्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न