समर्थ रामदास

राम के उपासक, दासबोध के रचयिता, जिनका नाम शिवाजी के साथ लिया जाता है

संक्षेप में

विवाह की वेदी पर ब्राह्मणों ने ज्यों ही कहा "सावधान!", बारह बरस का दूल्हा उठकर भाग गया, और बरसों तक घर नहीं लौटा। यही नारायण आगे चलकर समर्थ रामदास कहलाए, राम के उपासक, दासबोध और मनाचे श्लोक के रचयिता, जिनका नाम शिवाजी के साथ आदर से लिया जाता है।

संत-कविराम-भक्तिरामदासी संप्रदाय

एक नज़र में

समर्थ रामदास — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कविDeming, Ramdas and the Ramdasis (1928), pp. 136–137
परंपराराम-भक्ति, रामदासी संप्रदायDeming, Ramdas and the Ramdasis (1928), pp. 98–99; Ranade, Rise of the Maratha Power (1900), p. 162; Deming, Ramdas and the Ramdasis (1928), अध्याय 9–10
कालजन्म चैत्र शुक्ल नवमी, शके 1530 (1608 ई.); देह-त्याग माघ कृष्ण नवमी, शके 1603 (1681 ई.) (ऐतिहासिक प्रमाण)Deming, Ramdas and the Ramdasis (1928), pp. 21, 27
समकालीन / प्रसंग में साथ (आधुनिक विद्वानों का मत)संत तुकारामRanade, Rise of the Maratha Power (1900), pp. 81–82

जीवन

जांब का नारायण

परंपरागत कथा

Deming के अनुसार रामदास का जन्म-नाम नारायण था, और वे गोदावरी के किनारे जांब गाँव के थे। पिता सूर्याजीपंत सूर्य के उपासक थे और माँ का नाम राणूबाई था। बड़े भाई गंगाधर, जो आगे "श्रेष्ठ" कहलाए, 1605 में जन्मे, और नारायण चैत्र शुक्ल नवमी यानी रामनवमी, शके 1530 (1608 ई.) को। सात बरस की उम्र में पिता चल बसे।

"सावधान!" और विवाह-मंडप से भागना

परंपरागत कथा

नारायण का मन धर्म में इतना रमा था कि विवाह से उन्हें अरुचि थी; माँ के बहुत कहने पर वे माने। आसनगाँव में विवाह हो रहा था, वर-वधू के बीच अंतरपट पकड़ा गया था और ब्राह्मण मंत्र गा रहे थे। ज्यों ही "सावधान!" शब्द आया, नारायण उठकर भाग गए, और बरसों तक माँ या भाई ने उन्हें नहीं देखा।

Deming बताते हैं कि कुछ स्रोतों में घर छोड़ने का कारण यह है कि भाई को मंत्र मिला और नारायण को छोटा कहकर मना कर दिया गया। पर विवाह वाली कथा सबसे पुराने स्रोतों में भी है, इसलिए वे उसे झूठा मानने का कारण नहीं देखते।

पंचवटी में बारह बरस

परंपरागत कथा

बारह बरस का यह लड़का नासिक के पास पंचवटी पहुँचा। परंपरा कहती है कि वहाँ पास के टाकळी गाँव में, गोदावरी के किनारे, उन्होंने बारह बरस शास्त्र पढ़े, तप और ध्यान किया। Deming कहते हैं कि इस दौर के बारे में कोई लिखित प्रमाण नहीं।

चाफळ, शिवथर और सज्जनगढ़

ऐतिहासिक प्रमाण

Deming के अनुसार रामदास के जीवन की कुछ तिथियाँ मूल पत्रों से पक्की होती हैं: 1654 से वे दस बरस लिखने के लिए शिवथर में रहे; 1659 के एक पत्र के अनुसार उन्होंने सातारा के पास चाफळ में आश्रम और राम-मंदिर बनाया था; और 1676 के एक पत्र में शिवाजी सज्जनगढ़ क़िले के अधिकारी को लिखते हैं कि रामदास वहाँ आएँगे।

माघ कृष्ण नवमी, शके 1603 (1681 ई.) को सज्जनगढ़ पर उन्होंने देह छोड़ी। Deming लिखते हैं कि अंतिम सीख यह थी कि दासबोध पढ़ते रहना, वह मुझसे बात करने जैसा है; फिर "हर हर" और तीन बार "राम" कहकर उन्होंने प्राण छोड़े।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

शिवाजी से भेंट: 1649 या बाद में?

मत अलग-अलग

परंपरा कहती है कि रामदास ने 1649 में सिंगणवाडी के बाग़ में शिवाजी को शिष्य बनाया। Deming बताते हैं कि यह तिथि रामदास के देह-त्याग के कुछ दिन बाद लिखी गई एक डायरी, हनुमंत स्वामी की बखर, और शिष्य भीमस्वामी की एक कविता में है; ग्रांट डफ़ जैसे इतिहासकारों और कई मराठी विद्वानों ने यही माना।

दूसरा पक्ष 1672 कहता है। उनका मुख्य प्रमाण 4 अप्रैल 1672 का एक पत्र है, जिसमें लिखा है कि राजा शिवाजी समर्थ से मिलने आ रहे हैं, "यह उनकी पहली भेंट है"; और 1659 का एक पत्र, जिसमें शिवाजी रामदास के शिष्यों से पूछते हैं कि उनके गुरु कौन हैं और कहाँ रहते हैं।

Deming का निष्कर्ष है कि पहली भेंट शायद 1659 के बाद हुई, पर ठीक तिथि अनिश्चित है, और प्रमाण इतने नहीं कि किसी एक ओर फ़ैसला हो। इतना दोनों पक्ष मानते हैं कि शिवाजी के जीवन के आख़िरी बरसों में दोनों में गहरी मित्रता थी, और शिवाजी ने रामदास के मठों और मंदिरों के लिए भूमि-दान दिया।

पंढरपुर में राम

परंपरागत कथा

Deming रामदास की एक प्रचलित कथा देते हैं: कृष्णा नदी के किनारे कुछ वारकरी पंढरपुर जा रहे थे और रामदास को साथ चलने को कहा। रामदास बोले: मैं तो केवल श्रीराम को जानता हूँ। तब विठोबा ख़ुद ब्राह्मण के वेश में आए और समझाया कि राम और कृष्ण में कोई भेद नहीं, दोनों एक ही भगवान हैं।

रामदास साथ चल पड़े। पंढरपुर पहुँचकर उन्होंने इच्छा जताई कि विठोबा को राम के रूप में देखें, और कथा कहती है कि मूर्ति का रूप बदल गया। लोग घबराकर रामदास के पैरों पड़े कि हमारा विठोबा लौटा दो, और उन्होंने कृपा करके वैसा ही किया।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

राम-नाम और नवधा भक्ति

Deming के अनुसार रामदास नवधा भक्ति पर बहुत ज़ोर देते हैं: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। "सख्य" उनके लिए ख़ास है, क्योंकि वे राम को केवल सर्वशक्तिमान भगवान नहीं, भक्त का मित्र भी मानते हैं।

मनाचे श्लोक में वे मन से कहते हैं: ईर्ष्या में आकर यह नाम मत छोड़, आदर से इसका निरंतर ध्यान कर; नाम बहुत हैं, पर राम-नाम जैसा कोई नहीं। जब शंकर ने विष के उपचार में यही नाम लिया, तो मनुष्य की क्या बात।

संसार में रहकर कर्तव्य

शिवाजी के 1678 के एक पत्र में, जिसकी तीन प्रतियाँ मिलती हैं, शिवाजी लिखते हैं कि जब उन्होंने अपना पूरा राज्य रामदास को अर्पित करना चाहा, तो उन्हें कहा गया कि तुम्हारी सबसे अच्छी सेवा यही है कि राजा का कर्तव्य निभाओ।

Ranade लिखते हैं कि रामदास ने शिवाजी के पुत्र संभाजी को सीख दी थी: सब मराठों को एक करो, और महाराष्ट्र-धर्म का प्रसार करो। Ranade के अनुसार इस "महाराष्ट्र-धर्म" से उनका आशय संतों की उस सहिष्णु, भक्ति-प्रधान परंपरा से था, जिसने जाति के भेद कम किए।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंदासबोध — ओवी छंद में बीस दशकों का ग्रंथ, जो वेदांत और भक्ति के साथ-साथ जीवन के व्यावहारिक कर्तव्य भी समझाता है। Deming के अनुसार इसकी कई पुरानी हस्तलिखित प्रतियाँ मिली हैं, जिनमें एक 1684 की है, यानी रामदास के देह-त्याग के तीन साल बाद की। पहला छपा संस्करण 1905 में धुळे से निकला।

प्रामाणिक संग्रह मेंमनाचे श्लोक — मन को उपदेश देने वाले 205 श्लोक, भुजंगप्रयात छंद में। Deming बताते हैं कि ये इतने गेय हैं कि रामदासी शिष्य भिक्षा माँगते या यात्रा करते हुए इन्हें गाते हैं: एक शिष्य श्लोक कहता है और बाक़ी उसे मिलकर दोहराते हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतRanade के अनुसार शिवाजी के समय के संतों में सबसे प्रसिद्ध दो थे, देहू के तुकाराम और चाफळ के रामदास। Ranade मानते हैं कि इन दोनों के प्रभाव ने उस दौर में लोगों की भावना को भक्ति और लोक-कार्य के ऊँचे स्तर पर बनाए रखा।

ऐतिहासिक प्रमाणरामदास ने जगह-जगह राम और मारुति के मंदिर और मठ बनाए, और उनमें योग्य शिष्यों को महंत नियुक्त किया। Deming के अनुसार इसी से रामदासी संप्रदाय फैला, और उनके शिष्य कल्याण स्वामी के ही तैंतालीस महंत शिष्य गिने जाते हैं।

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स्रोत

समर्थ रामदास — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न