रसखान

दिल्ली के पठान, जो श्रीनाथजी की एक तस्वीर देखकर ब्रज के हो गए

संक्षेप में

दिल्ली का एक पठान, जिसका मन किसी और में लगा था, एक दिन श्रीनाथजी की एक तस्वीर देखता है, और उसी रात घोड़े पर बैठकर ब्रज चल देता है। यही रसखान हैं। जिस कृष्ण को शेष, गणेश और शिव भी पार नहीं पाते, उसे अहीर की छोरियाँ छाछ के लिए नचाती हैं, यह रसखान के सवैयों का रस है।

सगुण भक्त-कविकृष्ण-भक्ति

एक नज़र में

रसखान — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसगुण भक्त-कविदो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वैष्णव 218, पृ. 434; रसखान और घनानंद (1929), सुजान रसखान, सवैये 32–33, पृ. 23
परंपराकृष्ण-भक्तिदो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वैष्णव 218, पृ. 432–434
कालवार्ता उन्हें श्री गुसाँईंजी का सेवक बताती है; जन्म और देह-त्याग की तिथियाँ हमारे पढ़े स्रोतों में नहीं (परंपरागत कथा)दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वैष्णव 218, पृ. 432–434

जीवन

दिल्ली के पठान

परंपरागत कथा

"दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता" में रसखान की वार्ता का शीर्षक ही है: "रसखान पठान, दिल्ली में रहते, तिनकी वार्ता"। वार्ता बताती है कि दिल्ली में एक साहूकार का बेटा बहुत सुंदर था, और रसखान का मन उसी में लग गया। वे बिना वेतन उसकी चाकरी करते, आठों पहर उसी में मगन रहते, और लोगों की निंदा की परवाह नहीं करते।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

एक तस्वीर, और गोविंदकुंड पर तीन दिन

परंपरागत कथा

एक दिन चार वैष्णव भगवान की बातें करते हुए कह रहे थे: प्रभु में मन ऐसे लगाना चाहिए, जैसे रसखान का मन साहूकार के बेटे में लगा है। रसखान उधर से निकले, यह सुना, और पूछा कि मेरी क्या बात हो रही है। वैष्णवों ने बताया, तो रसखान बोले: प्रभु का रूप दिखे, तब तो मन लगाऊँ।

वैष्णवों ने उन्हें श्रीनाथजी का एक चित्र दिखाया। रसखान ने वह चित्र ले लिया और मन में ठान लिया कि ऐसा रूप देखूँगा, तभी अन्न खाऊँगा। वहीं से घोड़े पर बैठे और एक रात में वृंदावन पहुँच गए। सारा दिन भेष बदलकर सब मंदिरों में दर्शन किए, पर वैसा रूप कहीं न दिखा।

फिर वे गोपालपुर गए और भेष बदलकर श्रीनाथजी के दर्शन को गए, पर द्वारपाल ने उन्हें दूसरी जात का पहचानकर धक्का देकर निकाल दिया। रसखान गोविंदकुंड पर जाकर पड़ रहे, और तीन दिन तक बिना खाए-पिए वहीं पड़े रहे।

वार्ता कहती है कि तब श्रीनाथजी ने जाना कि यह जीव शुद्ध और सात्त्विक है, मेरा भक्त है। उन्होंने रसखान को दर्शन दिए, और गुसाँईंजी से कहा कि इसे अपनी शरण में लो। गुसाँईंजी गोविंदकुंड पर आए, रसखान को नाम सुनाया, और साथ लेकर श्रीनाथजी के दर्शन कराए और महाप्रसाद दिया।

उसके बाद रसखान श्रीनाथजी के रूप में ऐसे रमे कि जैसे-जैसे उन्हें लीला के दर्शन होते, वैसे-वैसे वे कीर्तन, कवित्त और दोहे रचते गए। वार्ता अंत में कहती है: जिनका मन एक चित्र देखते ही संसार से खिंचकर श्रीनाथजी में लग गया, उनके भाग्य की क्या बड़ाई करें।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

जिसे देवता नहीं पाते, उसे प्रेम पाता है

रसखान के सवैयों का एक प्रिय भाव है: जिस भगवान का गुण शेष, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र निरंतर गाते हैं, जिसे वेद अनादि, अनंत, अखंड बताते हैं, जिसका पार नारद, शुक और व्यास भी नहीं पाते, उसी को ब्रज की अहीर की छोरियाँ थोड़ी-सी छाछ के लिए नाच नचाती हैं। यानी भगवान ज्ञान से नहीं, प्रेम से बँधते हैं।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

सेस गनेस महेस दिनेस

सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं। जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥ नारद से सुक ब्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं। ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

जिसका यश शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र निरंतर गाते हैं; जिसे वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बताते हैं; जिसके पार पाने में नारद, शुकदेव और व्यास जैसे थक-हारकर रह जाते हैं; उसी भगवान को अहीर की छोरियाँ एक छोटी कटोरी (छछिया) भर छाछ के लिए नाच नचाती हैं।

प्रामाणिक संग्रह मेंरसखान और घनानंद (1929), सुजान रसखान, सवैया 32 (पृ. 23)

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंसुजान रसखान — 1929 के संग्रह की भूमिका के अनुसार किशोरीलाल गोस्वामी ने 1881 ई. में "सुजान रसखान" नाम से रसखान की कविताओं का संग्रह छपवाया, जिसमें कवित्त, सवैया, सोरठा और दोहा मिलाकर 128 कविताएँ थीं।

प्रामाणिक संग्रह मेंप्रेमवाटिका — उसी भूमिका के अनुसार किशोरीलाल गोस्वामी ने बाद में "प्रेमवाटिका" भी छपवाई, जिसमें प्रेम पर रसखान के 53 दोहे हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मत1929 के संग्रह के आरंभ में भारतेंदु की प्रसिद्ध पंक्ति उद्धृत है, "इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिंदुन वारिये", जो उन मुसलमान भक्त-कवियों के प्रति आदर दिखाती है, जिनमें रसखान सबसे पहले याद किए जाते हैं।

स्रोत

रसखान — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न