FAQ
सूरदास — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सूरदास सोलहवीं सदी के कृष्ण-भक्त कवि-गायक थे, जो सूरसागर के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हैं। चौरासी वैष्णवन की वार्ता के अनुसार वे आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर रहते थे, और वल्लभाचार्य के शिष्य बने।
यह बात लोक में बहुत प्रसिद्ध है, और Macauliffe भी उन्हें "अंधे कवि" के रूप में प्रसिद्ध बताते हैं। पर भक्तमाल का उनका छप्पय और वार्ता के जो पन्ने हमने पढ़े, उनमें जन्म से अंधे होने की बात नहीं है। इसलिए इसे परंपरा की बात समझना ठीक है।
चौरासी वैष्णवन की वार्ता के अनुसार वल्लभाचार्य। उसमें कथा है कि गऊघाट पर वल्लभाचार्य ने उन्हें नाम दिया, समर्पण करवाया, और भागवत के दशम स्कंध की अनुक्रमणिका समझाई।
नहीं। Macauliffe के अनुसार गुरु ग्रंथ साहिब में जिन सूरदास का पद है, वे सूरदास मदनमोहन हैं, जो 1528 ई. में जन्मे थे। भक्तमाल में भी दोनों के छप्पय अलग-अलग हैं।
यह नाभादास की भक्तमाल के सूरदास वाले छप्पय की टेक है: "सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै", यानी ऐसा कौन कवि है, जो सूर की कविता सुनकर सराहना में सिर न हिलाए?
