सूरदास

कृष्ण-लीला के गायक, सूरसागर के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध

संक्षेप में

आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर एक गायक भक्त रहते थे। वार्ता कहती है कि वल्लभाचार्य ने उनका दीनता भरा पद सुनकर कहा: सूर होकर ऐसे क्यों घिघियाते हो, भगवान की लीला गाओ। वही सूरदास कृष्ण-लीला के गायक बने, और नाभादास ने पूछा: इनकी कविता सुनकर कौन कवि सिर न हिलाए?

सगुण भक्त-कविकृष्ण-भक्ति

एक नज़र में

सूरदास — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसगुण भक्त-कविकबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 12–13; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 73, पृ. 84
परंपराकृष्ण-भक्तिचौरासी वैष्णवन की वार्ता, सूरदासजी की वार्ता, पृ. 274–275; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 73 ("…हृदय हरि लीला भासी…"), पृ. 84
कालसोलहवीं सदी; वार्ता उन्हें वल्लभाचार्य का शिष्य बताती है; जन्म और देह-त्याग की तिथियाँ हमारे पढ़े स्रोतों में नहीं (परंपरागत कथा)चौरासी वैष्णवन की वार्ता, सूरदासजी की वार्ता, पृ. 272–275
गुरु (परंपरागत कथा)वल्लभाचार्यचौरासी वैष्णवन की वार्ता, सूरदासजी की वार्ता, पृ. 272–275

जीवन

गऊघाट के गायक

परंपरागत कथा

"चौरासी वैष्णवन की वार्ता" वल्लभाचार्य के शिष्यों की कथाओं का संग्रह है, और उसमें सूरदास की भी वार्ता है। उसके अनुसार सूरदास गऊघाट पर रहते थे, जो आगरा और मथुरा के बीच है। वे बहुत अच्छा गाते थे, ख़ुद "स्वामी" कहलाते थे, और बहुत-से लोग उनके सेवक, यानी शिष्य, बन चुके थे।

Macauliffe उन्हें उत्तर भारत में "सूरसागर के रचयिता अंधे कवि" के रूप में प्रसिद्ध बताते हैं। उनके अंधेपन की बात लोक में बहुत प्रसिद्ध है, पर भक्तमाल का उनका छप्पय और वार्ता के जो पन्ने हमने पढ़े, उनमें यह नहीं आती। नाभादास "प्रतिबिम्बित दिवि दृष्टि" कहते हैं, यानी उनकी दिव्य दृष्टि में हरि की लीला झलकती थी।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

"सूर होकर ऐसे क्यों घिघियाते हो?"

परंपरागत कथा

एक बार वल्लभाचार्य ब्रज की ओर जाते हुए गऊघाट पर ठहरे। सूरदास के शिष्यों ने उन्हें बताया कि जिन आचार्य ने दक्षिण में दिग्विजय की और भक्ति-मार्ग स्थापित किया, वे यहाँ पधारे हैं। सूरदास ने कहा, "जब वे भोजन करके विराजें, तो मुझे ख़बर करना, हम दर्शन को चलेंगे।"

सूरदास आए, तो आचार्य ने उन्हें पास बैठाया और कहा, "सूर, कुछ भगवान का यश सुनाओ।" सूरदास ने विनय के पद गाए: "हौं हरि सब पतितन को नायक", और "प्रभु मैं सब पतितन को टीको", यानी मैं सब पापियों का सरदार हूँ।

सुनकर वल्लभाचार्य बोले, "सूर होकर ऐसे क्यों घिघियाते हो? कुछ भगवान की लीला का वर्णन करो।" सूरदास ने कहा, "महाराज, मैं तो लीला समझता ही नहीं।" आचार्य ने कहा, "जाओ, स्नान कर आओ, हम तुम्हें समझाएँगे।"

स्नान के बाद आचार्य ने उन्हें पहले नाम सुनाया, फिर समर्पण करवाया, और भागवत के दशम स्कंध की अनुक्रमणिका समझाई। वार्ता कहती है कि इसी से सूरदास के सब दोष दूर हुए और उनके मन में भगवान की पूरी लीला स्फुरित हो उठी। उसी समय उन्होंने "चकई री चलि चरण सरोवर, जहाँ न प्रेम बियोग" जैसा पद गाया।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

दीनता से लीला की ओर

वार्ता की कथा सूरदास की भक्ति के दो रंग दिखाती है। पहले वे अपने को पापियों का सरदार कहकर भगवान से उद्धार माँगते हैं। फिर वल्लभाचार्य की बात सुनकर वे रोना छोड़कर कृष्ण की लीलाएँ गाने लगते हैं: जन्म, बचपन, ब्रज और गोपियाँ।

नाभादास इसी को सूर की पहचान कहते हैं: भगवान के जन्म, कर्म, गुण और रूप उनकी जीभ पर बसकर प्रकट होते थे, और उनकी कविता में चमत्कार, अनुप्रास और प्रेम का निर्वाह, सब एक साथ था।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

प्रभु मैं सब पतितन को टीको

प्रभु मैं सब पतितन को टीको॥ और पतित सब द्यौस चारि के, मैं तो जनमत ही को॥ बधिक अजामिल गनिका त्यारी, और पूतना ही को॥ मोहि छाँड़ि तुम और उधारे, मिटै सूल कैसे जी को॥ कोउ न समरथ सेव करन को, खेंचि कहत हौं लीको॥ मरियत लाज सूर पतितन में, कहत सबन में नीको॥

प्रभु, मैं सब पापियों में सबसे बड़ा हूँ। दूसरे पापी तो चार दिन के हैं, मैं तो जन्म से ही पापी हूँ। तुमने शिकारी, अजामिल, गणिका और पूतना तक को तार दिया; मुझे छोड़कर औरों का उद्धार किया, तो मेरे मन का दुख कैसे मिटे? (अंतिम दो पंक्तियों में सूर कहते हैं कि पापियों की इस पंगत में भी उन्हें लाज आती है; इनका ठीक-ठीक अर्थ टीकाकार अलग-अलग करते हैं।)

परंपरा से इनके नाम परचौरासी वैष्णवन की वार्ता, सूरदासजी की वार्ता (पृ. 274) में, वल्लभाचार्य के सामने गाया गया पद (राग धनाश्री)

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परसूरसागर — कृष्ण-लीला के पदों का विशाल संग्रह, जिसके रचयिता के रूप में सूरदास उत्तर भारत में प्रसिद्ध हैं। वार्ता कहती है कि वल्लभाचार्य ने उन्हें भागवत के दशम स्कंध की अनुक्रमणिका समझाई, और तब से उन्होंने लीला के पद गाने शुरू किए।

रचयिता संदिग्धगुरु ग्रंथ साहिब का "सूरदास" वाला पद — यह पद इन सूरदास का नहीं है। Macauliffe के अनुसार गुरु ग्रंथ साहिब के सूरदास "मदनमोहन" कहलाते थे और 1528 ई. में जन्मे थे। भक्तमाल में भी उनका छप्पय अलग है (छप्पय 126)।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

परंपरागत कथानाभादास ने भक्तमाल में सूर की कविता की प्रशंसा सबसे ऊँचे शब्दों में की: ऐसा कौन कवि है जो सूर की कविता सुनकर सिर न हिलाए? उनकी विमल बुद्धि के गुण जो कानों से सुन ले, उसकी बुद्धि भी निर्मल हो जाती है।

आधुनिक विद्वानों का मतश्यामसुंदरदास के अनुसार कबीर के निर्गुण मार्ग ने तुलसी और सूर के सगुण मार्ग के लिए रास्ता साफ़ किया। तुलसी ने राम की कथा गाई, सूर ने कृष्ण की लीला।

संबंधित संत

स्रोत

सूरदास — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न