अंडाल

आलवारों में अकेली स्त्री संत, जो पहले माला ख़ुद पहनती, फिर भगवान को चढ़ने देती

संक्षेप में

पिता भगवान के लिए फूलों की माला बनाते, और बेटी चुपके से उसे पहनकर आईने में देखती। पता चला तो पिता ने वह माला अपवित्र मानकर अलग रख दी। उसी रात भगवान ने कहा: मुझे वही माला चाहिए, जो उसने पहनी हो। यही अंडाल थीं, बारह आलवारों में अकेली स्त्री संत।

आलवारमहिला संत / संत-कवयित्रीआलवार (तमिल वैष्णव)

एक नज़र में

अंडाल — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीआलवार, महिला संत / संत-कवयित्रीGovindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 41; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 14; Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 41; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 14
परंपराआलवार (तमिल वैष्णव)Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 41; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 10–15
कालपरंपरा के अनुसार कलि संवत् 97; आधुनिक विद्वान (Hooper) उन्हें नौवीं सदी के आसपास, अपने पिता पेरियालवार के समय में रखते हैं (मत अलग-अलग)Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 45; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 10–11, 14

जीवन

तुलसी-बाग़ में मिली बच्ची

परंपरागत कथा

श्रीविल्लिपुत्तूर में पेरियालवार, जिन्हें विष्णुचित्त भी कहते हैं, रहते थे। वे अपने बाग़ में तुलसी और फूल उगाते और रोज़ माला गूँथकर वटपत्रशायी भगवान को चढ़ाते। Govindacharya के अनुसार एक दिन बाग़ खोदते हुए उन्हें मिट्टी में ढकी एक सुंदर बच्ची मिली, जैसे राजा जनक को हल चलाते हुए सीता मिली थीं।

पेरियालवार ने उसे अपनी बेटी की तरह पाला। उसका नाम गोदा पड़ा, और आगे वह अंडाल कहलाई। Govindacharya बताते हैं कि आलवार परंपरा में बारह संत माने जाते हैं, जिनमें वह अकेली स्त्री हैं।

केवल रंगनाथ

परंपरागत कथा

अंडाल बड़ी हुईं, तो उनका मन कृष्ण में ऐसा रमा कि वे ख़ुद को गोपी मानकर उनसे मिलन की राह खोजने लगीं। Hooper के अनुसार जब विवाह की बात उठी, तो उन्होंने कहा कि वे किसी मनुष्य से नहीं, केवल भगवान से विवाह करेंगी।

Govindacharya के अनुसार पिता ने उन्हें अलग-अलग धामों के भगवान का वर्णन सुनाया, और श्रीरंगम के रंगनाथ का नाम आते ही अंडाल का मन वहीं बँध गया। वे रात-दिन यही गातीं: रंग आएँगे या नहीं आएँगे?

जीवन की प्रमुख कथाएँ

पहनी हुई माला

परंपरागत कथा

पिता के मंदिर जाने पर बालिका गोदा भगवान के लिए रखी मालाएँ उठाकर अपने बालों में सजाती, आईने के आगे खड़ी होकर देखती, और फिर चुपचाप रख देती। Govindacharya के अनुसार एक दिन पिता ने उसे ऐसा करते पकड़ लिया, डाँटा, और उस दिन की माला अपवित्र मानकर भगवान को नहीं चढ़ाई।

उसी रात भगवान ने पूछा कि आज माला क्यों नहीं आई। पिता ने कारण बताया, तो भगवान बोले: "अपवित्र? कहो पवित्र! तुम्हारी बेटी के पहनने से तुम्हारी माला और सुगंधित हो गई।" उस दिन से पेरियालवार भगवान को वही माला चढ़ाने लगे, जो अंडाल पहले पहन लेतीं। इसीलिए उन्हें "माला पहनकर देने वाली" कहा जाता है।

श्रीरंगम की यात्रा

परंपरागत कथा

पिता चिंता में थे कि मनुष्य और भगवान का विवाह कैसे हो। Govindacharya के अनुसार उसी रात रंगनाथ ने ख़ुद प्रकट होकर कहा कि वे अंडाल का हाथ माँगेंगे, और श्रीरंगम से उनके लोग श्रीविल्लिपुत्तूर आए।

बड़ी धूमधाम से, शहनाइयों और जयकारों के बीच, अंडाल श्रीरंगम पहुँचीं। Hooper के अनुसार परंपरा कहती है कि वहाँ वे रंगनाथ के दिव्य स्वरूप में लीन हो गईं।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

व्रत, और भगवान से मिलने की चाह

Hooper के अनुसार अंडाल के तिरुप्पावै में वे ख़ुद को एक गोपी की तरह देखती हैं, जो सहेलियों को भोर में जगाकर एक पवित्र व्रत के लिए ले जाती है, जिसका लक्ष्य है भगवान की उपस्थिति पाना। प्रेम यहाँ शास्त्र की बहस नहीं, सीधी लगन है।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंतिरुप्पावै — तीस पदों का गीत, जिसमें अंडाल एक पवित्र व्रत के ज़रिए भगवान की उपस्थिति पाने का मार्ग गाती हैं। Hooper इसे नालायिर प्रबंधम् के सबसे प्रसिद्ध अंशों में गिनते हैं।

प्रामाणिक संग्रह मेंनाच्चियार तिरुमोऴि — Hooper के अनुसार 143 पदों की रचना ("रानी की पवित्र वाणी"), जिसमें कामदेव से प्रार्थना जैसे प्रसंग हैं: भगवान से मिलन की तड़प।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतआलवारों के पद नालायिर प्रबंधम् ("चार हज़ार पदों का संग्रह") में हैं, जिसे Hooper के अनुसार नाथमुनि (मृत्यु लगभग 920 ई.) ने इकट्ठा किया और मंदिर-पूजा में गाने की व्यवस्था की। अंडाल के पद इसका हिस्सा हैं और आज भी श्रीवैष्णव मंदिरों में गाए जाते हैं।

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परंपरा

लेख

तीर्थ

स्रोत

अंडाल — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न