नाभादास

भक्तमाल के रचयिता, जिन्होंने गुरु की आज्ञा से भक्तों का यश गाया

संक्षेप में

अकाल पड़ा, तो एक माँ अपने पाँच बरस के अंधे बेटे को जंगल में छोड़ गई। दो संत, कील्ह और अग्रदास, उधर से निकले, बालक को उठा लाए, और कहते हैं कमंडलु के जल से उसकी आँखें खुल गईं। वही बालक नाभादास बना, जिसकी "भक्तमाल" आज तक भक्तों को याद रखने वाली माला है।

भक्त-चरित के रचयितारामानंदी परंपरा

एक नज़र में

नाभादास — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीभक्त-चरित के रचयिताभक्तमाल (नाभादास), मूल मंगलाचरण, दोहा 4, पृ. 11; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. iv
परंपरारामानंदी परंपराभक्तमाल (नाभादास), प्रियादास की टीका, कवित्त 13, पृ. 12
कालसोलहवीं-सत्रहवीं सदी; Macauliffe भक्तमाल को लगभग 1578 ई. का मानते हैं (मत अलग-अलग)Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 2; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. iv
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)गोस्वामी तुलसीदासभक्तमाल (नाभादास), प्रियादास की टीका, कवित्त 517, पृ. 133; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. x

जीवन

अंधा बालक और दो संत

परंपरागत कथा

प्रियादास कहते हैं कि नाभा का जन्म "हनुमान वंश" में हुआ, और वे जन्म से आँखों से हीन थे। पाँच बरस की उम्र में अकाल पड़ा, और विपत्ति में माँ उन्हें जंगल में छोड़ गई।

उसी राह से कील्ह और अग्रदास निकले। उन्होंने अनाथ बालक से उसका हाल पूछा। प्रियादास कहते हैं कि सिद्ध संतों ने कमंडलु का जल आँखों पर छिड़का, और बालक की आँखें खुल गईं; पहली बार उसने उन दोनों को देखा।

बालक उनके पाँव पड़ा और रो पड़ा। संत उसे साथ ले आए। कील्ह की आज्ञा से अग्रदास ने उसे मंत्र दिया। गलता में संतों की सेवा होती थी, वहीं उसे टहल में लगा दिया गया। संतों के चरण धोना और उनका जूठा प्रसाद पाना, इसी से उसके हृदय में भक्ति का रंग चढ़ा।

Macauliffe भी यही कथा देते हैं, और जोड़ते हैं कि नाभाजी ग्वालियर राज्य में जन्मे थे और उनका मूल नाम नारायणदास बताया जाता है।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

जहाज़, पंखा और भक्तमाल की आज्ञा

परंपरागत कथा

एक दिन अग्रदास मानसी पूजा में, यानी मन में भगवान की सेवा में, लगे थे, और नाभा धीरे-धीरे उन्हें पंखा झल रहे थे। उसी समय अग्रदास का एक शिष्य, जो जहाज़ पर था, संकट में पड़ा और उसने गुरु का ध्यान किया। अग्रदास का मन खिंच गया और पूजा का ध्यान छूट गया।

तब नाभा ने धीरे से कहा: जहाज़ तो बहुत दूर निकल गया, अब आप फिर उसी छवि में लौट आइए। अग्रदास ने आँखें खोलकर पूछा, "कौन बोला?" वही बालक, जिसे उन्होंने अपना प्रसाद देकर पाला था।

अग्रदास समझ गए कि यह संतों की कृपा है। उन्होंने आज्ञा दी: अब संतों के ही रूप और गुण गाओ। नाभा ने हाथ जोड़कर कहा कि राम और कृष्ण को तो गा सकता हूँ, पर भक्तों का ओर-छोर नहीं पा सकूँगा। अग्रदास बोले, वे ख़ुद तुम्हारे हृदय में आकर सब कह देंगे।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

भक्त, भक्ति, भगवान, गुरु

भक्तमाल का पहला दोहा ही नाभादास की पूरी दृष्टि बता देता है: भक्त, भक्ति, भगवान और गुरु, ये चार नाम हैं, पर देह एक। इनके चरणों की वंदना से अनेक विघ्न मिट जाते हैं।

तीसरे दोहे में वे कहते हैं कि संतों ने श्रुति, पुराण और इतिहास मथकर निर्णय किया है: भजने लायक दो ही हैं, या तो हरि, या हरि के दास। इसीलिए नाभादास भगवान के साथ-साथ भक्तों का यश गाते हैं।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

भक्तमाल का मंगलाचरण

भक्त भक्ति भगवन्त गुरु, चतुर नाम वपु एक। इनके पद वन्दन किये, नाशहिं विघ्न अनेक॥ सन्तन निर्णय कियौ मथि, श्रुति पुराण इतिहास। भजिवे को दोई सुघर, कै हरि कै हरिदास॥ श्रीगुरु अग्रदेव आज्ञा दई, हरि भक्तन को यश गाव। भवसागर के तरन कौ, नाहिन और उपाव॥

भक्त, भक्ति, भगवान और गुरु, ये चार नाम हैं, पर शरीर एक है; इनके चरणों की वंदना से अनेक विघ्न नष्ट होते हैं। संतों ने श्रुति, पुराण और इतिहास को मथकर यह निर्णय किया कि भजने लायक दो ही सुंदर हैं: या तो हरि, या हरि के दास। गुरु अग्रदेव ने आज्ञा दी कि हरि के भक्तों का यश गाओ; संसार-सागर पार करने का इससे बड़ा कोई उपाय नहीं।

प्रामाणिक संग्रह मेंनाभादास, भक्तमाल, मूल मंगलाचरण, दोहे 1, 3, 4

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंभक्तमाल — छप्पय छंद में भक्तों की माला: हर भक्त पर एक छोटा छप्पय, जो उनके सबसे बड़े गुण की प्रशंसा करता है। बाद में प्रियादास ने संवत् 1769 (1713 ई.) में इस पर "भक्तिरसबोधिनी" टीका लिखी, जिसमें ज़्यादातर कथाएँ हैं। Macauliffe के अनुसार बाद में अलग-अलग भाषाओं में लिखे ज़्यादातर भक्त-चरित इसी पर आधारित हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतGrowse के अनुसार तुलसीदास जैसे सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के वैष्णव कवियों का सबसे पुराना उल्लेख भक्तमाल में ही मिलता है। यानी कबीर, रैदास, मीरा, सूर और तुलसी को याद रखने वाली सबसे पुरानी कड़ियों में एक नाभादास की माला है।

मत अलग-अलगभक्तमाल कब लिखी गई, इस पर मत अलग हैं। Macauliffe लगभग 1578 ई. कहते हैं, जबकि Growse लिखते हैं कि आज का पाठ नाभाजी के शिष्य नारायणदास ने शाहजहाँ के समय में संपादित किया, या शायद पूरा उन्होंने ही लिखा। Macauliffe ख़ुद नाभाजी का मूल नाम नारायणदास बताते हैं, जिससे यह उलझन और बढ़ती है।

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स्रोत

नाभादास — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न