संत पीपा
गागरौनगढ़ के राजा, जो राज छोड़कर संत बने
संक्षेप में
एक राजा ने गुरु से दीक्षा माँगी, तो गुरु ने कहला भेजा: यह फ़कीरों का घर है, राजाओं का यहाँ क्या काम? राजा ने अपना धन बाँट दिया और फ़कीर बनकर लौटा। यही गागरौनगढ़ के राजा पीपा हैं, जो रामानंद के शिष्य बने। उनका एक पद गुरु ग्रंथ साहिब में है: शरीर ही भगवान का मंदिर है।
भक्त संतगुरु ग्रंथ साहिब में वाणी
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | भक्त संत | भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 61 ("पीपा प्रताप जग वासना…"), पृ. 72 |
| परंपरा | गुरु ग्रंथ साहिब में वाणी | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; p. 119 |
| काल | पंद्रहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म 1425 ई. (परंपरागत कथा) | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 111 |
| गुरु (परंपरागत कथा) | स्वामी रामानंद | भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, 61; प्रियादास की टीका, कवित्त 283–285, पृ. 39, 72–73; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 112–113 |
जीवन
देवी के भक्त राजा
परंपरागत कथाप्रियादास के अनुसार पीपा गागरौनगढ़ के राजा थे, और पहले देवी के बड़े भक्त थे। नाभादास भी कहते हैं कि वे पहले भवानी के भक्त थे, और मुक्ति माँगने उन्हीं के पास दौड़े।
एक बार उनके नगर में कुछ साधु आए। राजा ने उनकी ख़ूब सेवा की। उस रात उन्हें एक डरावना सपना आया, और उस दिन से उनका मन दुनिया से उचट गया। नाभादास कहते हैं कि देवी ने स्वयं सच कहा, और उन्हें हरि की शरण में जाने का रास्ता दिखाया।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
"कुएँ में गिरो"
परंपरागत कथादेवी ने कहा कि रामानंद को गुरु बनाओ, तभी प्रभु मिलेंगे। लोग समझे राजा पागल हो गया है। पीपा काशी पहुँचे, पर रामानंद ने द्वार पर ही रुकवा दिया। Macauliffe के अनुसार कहलवाया: मेरा घर फ़कीरों का है, राजाओं का यहाँ क्या काम?
पीपा ने अपना सब कुछ लुटा दिया और फिर द्वार पर आए। रामानंद ने परखने के लिए कहा, "कुँए में गिरो।" पीपा बड़े प्रसन्न मन से कुएँ की ओर चल पड़े, पर शिष्यों ने उन्हें रोक लिया। तब रामानंद ने उन्हें दर्शन दिए और शिष्य बना लिया।
रामानंद ने कहा कि अब घर जाओ और साधुओं की सेवा करो। एक बरस बाद पीपा ने चिट्ठी लिखकर गुरु को बुलाया। रामानंद कबीर, रैदास और दूसरे शिष्यों के साथ आए। पीपा पालकी लेकर नगर के बाहर अगवानी को गए, और हर संत को अलग-अलग साष्टांग प्रणाम किया।
रानी सीता का साथ
परंपरागत कथाजब पीपा ने गुरु के साथ घर छोड़ने का निश्चय किया, तो उनकी रानियाँ भी साथ चलने को तैयार हुईं। पीपा ने कहा कि गहने और राजसी कपड़े उतारकर गुदड़ी पहननी होगी। यह सुनकर बाक़ी सब लौट गईं, केवल सबसे छोटी रानी सीता ने गुदड़ी ओढ़ ली और साथ चल दीं।
रास्ते में पठानों ने सीता को छीन लिया, पर प्रभु ने उन्हें छुड़ा दिया। पीपा ने कहा, अब भी घर लौट जाओ। सीता ने उत्तर दिया: आपकी भक्ति में कौन-सी रुकावट आई, और कौन-सा संकट आपके उपाय से टला? सब तो हरि ने किया। Macauliffe कहते हैं कि पीपा उनकी दृढ़ता से प्रसन्न हुए।
आगे वे चीधर नाम के एक ग़रीब भक्त के घर पहुँचे। चीधर की पत्नी ने मेहमानों को खिलाने के लिए अपना इकलौता लहँगा बेच दिया और कोठरी में छिप गई। सीता ने जाकर देखा, समझ गईं, और अपना आधा वस्त्र फाड़कर उसे दे दिया। फिर सब साथ बैठकर जीमे।
राजा का मोजा
परंपरागत कथाटोडा में वहाँ का राजा (Macauliffe उसका नाम सूरसेन बताते हैं) पीपा का शिष्य बना। बाद में दरबार के कुछ लोगों ने उसके मन में शंका भर दी। पीपा उससे मिलने गए, तो कहलवा दिया गया कि राजा पूजा में बैठा है। पीपा बोले: बड़ा मूर्ख राजा है, बैठा पूजा में है, पर मन मोची के घर जूता गँठवा रहा है। राजा समझ गया कि पीपा ने उसका मन पढ़ लिया है, और दौड़कर उनके पैरों पर गिरा।
स्रोतों में अंतर
Macauliffe बताते हैं कि जब राजा की रानी घूँघट में पीपा के पास आई, तो पीपा ने कहा कि संतों से परदा करना ज़रूरी नहीं। प्रियादास के कवित्त में भी यही बात है: "करौ परदा न सन्त सौं"। Macauliffe इसे परदे की प्रथा के ख़िलाफ़ एक शुरुआती क़दम कहते हैं।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
शरीर ही मंदिर
गुरु ग्रंथ साहिब में पीपा का एक पद है, जिसका सार यह है: शरीर में ही भगवान है, शरीर ही उसका मंदिर है, शरीर में ही तीर्थ और यात्री हैं, धूप-दीप और नैवेद्य भी शरीर में ही हैं। मैंने बहुत-से देश खोजे, पर नौ निधियाँ इसी शरीर में मिलीं। जो कुछ ब्रह्मांड में है, वह शरीर में है, और सच्चा गुरु उसे दिखा देता है।
नाम की महिमा
Macauliffe एक कथा कहते हैं: एक व्यक्ति से गाय की हत्या हो गई और जाति ने उसे निकाल दिया। पीपा ने उससे भगवान का नाम लिवाया, और वेद-शास्त्र से समझाया कि जिसके एक बार नाम लेने से लाखों जन्मों के पाप मिटते हैं, उसके हज़ारों बार नाम लेने के बाद पाप कैसे बचेगा? सबने बात मानी और उसे फिर अपना लिया।
रचनाएँ और ग्रंथ
गुरु ग्रंथ साहिब मेंगुरु ग्रंथ साहिब में एक पद (राग धनासरी) — पीपा का "शरीर ही मंदिर" वाला पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। Macauliffe ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद दिया है।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
परंपरागत कथानाभादास कहते हैं कि रामानंद के चरण पाकर पीपा भक्ति की सीमा बन गए, उनके अनगिनत अनमोल गुणों को संत गले में धारण करते हैं, और उनकी रसभरी परंपरा ने सारे विश्व का मंगल किया।
संबंधित संत
- स्वामी रामानंद — गुरु
स्रोत
- श्रीभक्तमाल — नाभादास के मूल छप्पय, प्रियादास की भक्तिरसबोधिनी टीका सहित — नाभादास (मूल), प्रियादास (टीका, 1713 ई.) (1600) · छप्पय 36, 61; प्रियादास की टीका, कवित्त 282–305, पृ. 39, 72–76
- The Sikh Religion: Its Gurus, Sacred Writings and Authors, vol. VI (Bhagats of the Granth Sahib) — Max Arthur Macauliffe (1909) · pp. 1, 111–119
