FAQ
श्रीमंत शंकरदेव — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शंकरदेव सोलहवीं सदी के असम के वैष्णव संत और सुधारक थे, जिन्होंने बलि की जगह विश्वास और प्रार्थना से मुक्ति का उपदेश दिया। उनके अनुयायी "महापुरुषिया" कहलाए, और बरपेटा उनका केंद्र बना।
परंपरा जन्म 1449 और देह-त्याग 1569 बताती है। Gait देह-त्याग की तिथि को शायद सही, पर जन्म-तिथि को तीस-चालीस बरस पहले की मानते हैं।
Gait के अनुसार अहोम राज्य में ब्राह्मणों की शत्रुता से उन्हें बहुत सताया गया। वे कोच राजा नर नारायण के राज्य के बरपेटा चले गए, जहाँ से उनका मत पूरे असम में फैला।
Gait के अनुसार शंकरदेव ने माधवदेव को, जो ख़ुद भी कायस्थ थे, अपना उत्तराधिकारी चुना। माधवदेव के अनुयायी आज भी बरपेटा को अपना मुख्य केंद्र मानते हैं।
Sen के अनुसार पुराने असमिया साहित्य में बार-बार उल्लेख है कि शंकरदेव चैतन्य से मिले, और उन पर चैतन्य के गहरे प्रभाव के स्पष्ट प्रमाण हैं।
