श्रीमंत शंकरदेव

असम में वैष्णव सुधार के प्रवर्तक, जिन्होंने बलि की जगह भक्ति और प्रार्थना सिखाई

संक्षेप में

बलि और कर्मकांड के बोलबाले में एक कायस्थ ने सिखाया कि मुक्ति बलि से नहीं, विश्वास और प्रार्थना से मिलती है। ब्राह्मणों के विरोध से उन्हें अपना घर छोड़कर बरपेटा जाना पड़ा, पर वहीं से उनकी बात पूरे असम में फैली। यही श्रीमंत शंकरदेव थे, असम के वैष्णव सुधार के प्रवर्तक।

संत-कविएकशरण धर्म (असम)

एक नज़र में

श्रीमंत शंकरदेव — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कविGait, A History of Assam (1906), p. 59
परंपराएकशरण धर्म (असम)Gait, A History of Assam (1906), pp. 57–58, 101–102
कालसोलहवीं सदी; परंपरा जन्म 1449 और देह-त्याग 1569 बताती है, पर Gait के अनुसार जन्म-तिथि शायद तीस-चालीस बरस पहले की है (मत अलग-अलग)Gait, A History of Assam (1906), p. 57
शिष्य (ऐतिहासिक प्रमाण)माधवदेवGait, A History of Assam (1906), p. 57
प्रेरणा-स्रोत (आधुनिक विद्वानों का मत)चैतन्य महाप्रभुD. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), p. 242

जीवन

बरदोवा का कायस्थ

परंपरागत कथा

Gait के अनुसार शंकरदेव नौगाँव के बरदोवा (बटद्रवा) के कायस्थ थे। एक परंपरा उनके वंश को "बारो भुइयाँ" से जोड़ती है: पूर्वज शांतनु वैष्णव बने और नौगाँव के रामपुर चले गए; उनके एक वंशज राजधर बरदोवा में बसे, और राजधर के बेटे कुसुंबर शंकरदेव के पिता थे।

गुरु-चरित और शंकर-चरित एक दूसरी कथा देते हैं: कामतापुर के राजा दुर्लभ नारायण को सात ब्राह्मण और सात कायस्थ परिवार भेंट में मिले, जिन्हें सीमा की रक्षा के लिए बसाया गया। उनके नेता चंडीबर नाम के कायस्थ थे, जो बाद में बरदोवा में बसे; Gait के अनुसार यहीं उनके परपोते शंकरदेव का जन्म हुआ।

विरोध, और बरपेटा

ऐतिहासिक प्रमाण

Gait लिखते हैं कि शंकरदेव ने शुद्ध विष्णु-भक्ति का प्रचार किया और सिखाया कि मुक्ति बलि से नहीं, विश्वास और प्रार्थना से मिलती है। पहले उन्होंने अहोम राज्य में प्रचार की कोशिश की, पर राजा के कान भरने वाले ब्राह्मणों की शत्रुता से उन्हें इतना सताया गया कि वे बरपेटा चले गए।

बरपेटा कोच राजा नर नारायण के राज्य में था, जिनके उदार और न्यायप्रिय शासन में शंकरदेव ने अपना मत दूर-दूर तक फैलाया। Gait के अनुसार कहा जाता है कि राजा की उनसे कई भेंटें हुईं, और कुछ कहते हैं कि राजा उनके शिष्य बनना चाहते थे, पर शंकरदेव ने यह सम्मान स्वीकार नहीं किया।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

बलि नहीं, विश्वास और प्रार्थना

Gait के अनुसार शंकरदेव के मत का सार था शुद्ध विष्णु-भक्ति, और बलि की जगह विश्वास और प्रार्थना से मुक्ति। उनके अनुयायियों में माधवदेव की शाखा बलि और मूर्ति-पूजा के विरोध में सबसे दृढ़ रही, जबकि ब्राह्मण गोसाइयों की शाखाएँ जाति-भेद पर ज़्यादा ध्यान देती थीं।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंवैष्णव पद और उपदेश — Gait के अनुसार नर नारायण के समय की असमिया की कई प्रसिद्ध रचनाएँ इसी दौर की हैं: शंकरदेव और माधवदेव ने अनेक वैष्णव पद और उपदेश लिखे, और उसी समय अनंत कंदली ने भागवत और दूसरे ग्रंथों का असमिया में अनुवाद किया।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

ऐतिहासिक प्रमाणGait के अनुसार शंकरदेव ने माधवदेव को अपना उत्तराधिकारी चुना। उनके बाद कुछ ब्राह्मण शिष्य अलग हुए और उन्होंने मजुली के औनियाटी, दक्खिनपाट जैसे सत्र (धार्मिक केंद्र) बनाए। शंकरदेव और माधवदेव के शिष्य पूरे देश में घूमकर सत्र स्थापित करते रहे, और आम लोग ही नहीं, ऊँचे अधिकारी भी खुलकर "महापुरुषिया" बने।

आधुनिक विद्वानों का मतSen के अनुसार पुराने असमिया साहित्य में बार-बार उल्लेख है कि शंकरदेव चैतन्य से मिले, और सोलहवीं सदी के इस महान वैष्णव संत पर चैतन्य के गहरे प्रभाव के स्पष्ट प्रमाण हैं।

संबंधित संत

VedikMARG पर आगे पढ़ें

लेख

स्रोत

श्रीमंत शंकरदेव — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न