गोरखनाथ

नाथ योगियों के गुरु, जिनकी कथाएँ बंगाल से नेपाल और महाराष्ट्र तक फैली हैं

संक्षेप में

गुरु ने भिक्षा में मिले पकवान की तारीफ़ की, तो शिष्य अगले दिन फिर वही माँगने पहुँचा। गृहिणी ने कहा: पकवान चाहिए तो अपनी आँख दो। शिष्य ने बिना झिझक आँख निकालकर दे दी। महीपति की यह कथा गोरखनाथ की है, नाथ योगियों के गुरु, जिनकी गुरु-भक्ति कहावत बन गई।

नाथ योगीनाथ परंपरा

एक नज़र में

गोरखनाथ — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीनाथ योगीD. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), pp. 2–4; Briggs, Gorakhnath and the Kanphata Yogis (1938), pp. 247–250
परंपरानाथ परंपराD. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), p. 2; महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 22, ओवी 133–137
कालBriggs के अनुसार 1200 ई. से पहले, शायद ग्यारहवीं सदी के आरंभ में; परंपराएँ उन्हें कहीं-कहीं युगों पुराना बताती हैं (आधुनिक विद्वानों का मत)Briggs, Gorakhnath and the Kanphata Yogis (1938), p. 250
इनसे प्रेरित (परंपरागत कथा)संत ज्ञानेश्वरमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 22, ओवी 133–137; बहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), अभंग 1, p. 1

जीवन

इतिहास क्या कहता है

आधुनिक विद्वानों का मत

Briggs गोरखनाथ की तिथि के सारे प्रमाण चार दौरों में रखते हैं: कबीर और नानक के साथ जोड़ने वाली कथाएँ (जो असल में उन्हें और पहले ले जाती हैं), ग्यारहवीं-बारहवीं सदी, सातवीं-आठवीं सदी, और उससे भी पहले के इक्के-दुक्के संकेत। उनका निष्कर्ष है कि गोरखनाथ 1200 ई. से पहले हुए, शायद ग्यारहवीं सदी के आरंभ में, और मूल रूप से पूर्वी बंगाल से आए थे।

Briggs के अनुसार इस निष्कर्ष को कुछ और बातें सहारा देती हैं: 1287 का सोमनाथ का एक शिलालेख, जिससे लगता है कि तब तक गोरखनाथ का मंदिर और मूर्ति बन चुके थे; और तेरहवीं सदी में गोरखपुर के मंदिर का तोड़ा जाना।

बंगाल का नाथ-साहित्य

आधुनिक विद्वानों का मत

Sen लिखते हैं कि मीननाथ और गोरक्षनाथ से शुरू हुए नाथ-पंथ का तेरहवीं सदी तक बांग्ला में बड़ा साहित्य बन चुका था। Sen इसे शैव और बौद्ध धर्म के बीच का एक मेल मानते हैं, जो शिव-उपासना के ज़्यादा क़रीब रहा। मयनामती के गीत गोरक्षनाथ और उनके दो बंगाली शिष्यों, हरिसिद्धा और मयनामती, की महिमा गाते हैं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

गोरक्ष-विजय: गुरु को जगाना

परंपरागत कथा

Sen के अनुसार बांग्ला ग्रंथ "गोरक्ष-विजय", जिसे "मीन-चेतन" भी कहते हैं, बताता है कि गोरक्षनाथ ने अपने गुरु मीननाथ को उनके आध्यात्मिक पतन से कैसे उबारा। इस काव्य का स्वर शांत और ऊँचा है, और इसमें कठोर वैराग्य की भावना है।

Sen लिखते हैं कि नाथ-साहित्य के नायक हर प्रलोभन के बीच अटूट संयम रखते हैं, और उनमें सबसे ऊपर गोरक्षनाथ हैं, "योगियों के राजा": वे स्त्री के हर प्रलोभन को ठुकराते हैं और मीननाथ को उस नैतिक गड्ढे से निकालते हैं, जिसमें वे अनजाने में गिर गए थे।

गुरु के लिए आँख का दान

परंपरागत कथा

महीपति की कथा में मत्स्येंद्रनाथ के "अलख" पुकारने पर गोबर के एक ढेर से बारह बरस का एक तेजस्वी बालक निकलता है; इसीलिए, महीपति के अनुसार, उसका नाम गोरक्षनाथ पड़ा। अनुवादक की टिप्पणी है कि कथा के अनुसार बारह बरस एक गाय ने उसे दूध पिलाकर पाला ("गो" + "रक्षा")।

भिक्षा में मिले पकवान गुरु को अच्छे लगे, तो अगले दिन गोरख उसी घर फिर पहुँचे। गृहिणी ने झुँझलाकर कहा: पकवान चाहिए तो अपनी एक आँख दो। गोरख ने तुरंत आँख निकालकर उसकी हथेली पर रख दी। गृहिणी डर गई, पकवान बनाकर दिए। गुरु को सब पता चला तो बोले: धन्य है तुम्हारा साहस, अब दूसरी आँख मुझे दो। गोरख ने वह भी निकाल दी। मत्स्येंद्र ने आँखों पर हाथ फेरा, दोनों आँखें लौट आईं, और उन्होंने कहा: तुम्हारे जैसा शिष्य मैंने नहीं देखा।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

सिद्धियों को ठोकर

महीपति लिखते हैं कि गोरख जहाँ पैर रखते, सिद्धियाँ हाथ बाँधे खड़ी हो जातीं, पर वे उनकी परवाह न करते और घर-घर भिक्षा माँगते रहते। तपस्वी भी काम और क्रोध से या सिद्धियों के लोभ से अपना पुण्य गँवा देता है; इसलिए मत्स्येंद्र के इस शिष्य ने काम और अहंकार को जीतकर सिद्धियों को ठोकर मार दी।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

परंपरागत कथामहाराष्ट्र की परंपरा ज्ञानेश्वर की गुरु-परंपरा को गोरखनाथ से जोड़ती है, पर बीच की कड़ियाँ स्रोतों में अलग हैं। बहिणाबाई के पहले अभंग में क्रम है: आदिनाथ (शिव) से मत्स्येंद्र, मत्स्येंद्र से गोरक्ष, गोरक्ष से गहिनी, गहिनी से निवृत्ति, और निवृत्ति से ज्ञानेश्वर। महीपति गोरक्ष और गहिनीनाथ के बीच तीन नाम और देते हैं: शांभव, अद्वयानंद और प्रभव।

संबंधित संत

स्रोत

गोरखनाथ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न