"आलवार" का अर्थ, और नालायिर प्रबंधम्
Hooper के अनुसार "आलवार" वह है, जो भगवान के ज्ञान में गहरे डूब गया हो, उनके ध्यान में निमग्न हो। Bhandarkar लिखते हैं कि दक्षिण के वैष्णवों में दो तरह के शिक्षक हुए: आलवार, जिन्होंने विष्णु के प्रति प्रेम और भक्ति के गीत गाए, और आचार्य, जिन्होंने शास्त्रार्थ से सिद्धांत स्थापित किए।
आलवारों के पद "नालायिर प्रबंधम्", यानी "चार हज़ार का संग्रह", में हैं। Hooper के अनुसार इन्हें नाथमुनि (मृत्यु लगभग 920 ई.) ने इकट्ठा किया और मंदिर-पूजा में गाने की व्यवस्था की।
बारिश की वह रात
Hooper परंपरा की कथा देते हैं: पोय्कै आलवार कांची के विष्णु-मंदिर के तालाब में एक कमल में जन्मे, भूतत्तालवार उसी दिन महाबलिपुरम् में एक फूल में, और पेयालवार मैलापुर के एक कुएँ में लाल कमल में। एक रात भीषण बारिश में तीनों एक-एक करके एक ही छोटी-सी जगह में शरण लेने पहुँचे, जो तीन के लिए भी कम थी।
उस भीड़ में उन्हें लगा कि कोई चौथा भी उनके बीच घुस आया है: वह स्वयं भगवान थे। सुबह होते ही तीनों भाव-विभोर होकर गा उठे, और उसी से पहली, दूसरी और तीसरी "तिरुवंतादि" बनीं, सौ-सौ पदों की। पोय्कै की पहली पंक्ति का भाव है: धरती को दीया, समुद्र को तेल और जलते सूरज को बाती बनाकर मैंने शब्दों की माला गूँथी।
बारह आलवार एक नज़र में
Hooper के अनुसार आलवारों का मुख्य क्रम परंपरा के अनुसार ही मान लिया जाता है, इस पर विद्वानों में आम सहमति है। आलवारों में जाति की कोई दीवार नहीं: नम्मालवार शूद्र परिवार में जन्मे, तिरुमलिसै को एक नीची जाति के भक्त ने पाला, तिरुप्पाण को एक पाणर (बाजा बजाने वाले) दंपति ने, और कुलशेखर राजा थे।
| आलवार | परिचय | मुख्य रचना | स्रोत |
|---|---|---|---|
| पोय्कै आलवार | कांची के मंदिर-तालाब में कमल से जन्म (परंपरा) | पहली तिरुवंतादि (100 पद) | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 11–12 |
| भूतत्तालवार | महाबलिपुरम्; अपने पद में मामल्लै (महाबलिपुरम्) का उल्लेख | दूसरी तिरुवंतादि (100 पद) | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 10–12 |
| पेयालवार | मैलापुर के कुएँ में कमल से जन्म (परंपरा) | तीसरी तिरुवंतादि (100 पद) | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 11–12 |
| तिरुमलिसै आलवार | तिरुमलिसै गाँव; नीची जाति के एक भक्त ने पाला | नान्मुगन् तिरुवंतादि, तिरुच्चंद विरुत्तम् | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 12 |
| नम्मालवार | कुरुकूर; शूद्र परिवार; सोलह बरस इमली के पेड़ के नीचे मौन | तिरुवाय्मोऴि (1102 पद) और अन्य | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 12–13 |
| मधुरकवि आलवार | नम्मालवार के शिष्य | गुरु की स्तुति में केवल दस पद | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 13 |
| कुलशेखर आलवार | त्रावणकोर के राजा, बाद में राज छोड़ा | पेरुमाळ तिरुमोऴि (103 पद) | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 13–14 |
| पेरियालवार (विष्णुचित्त) | श्रीविल्लिपुत्तूर के ब्राह्मण; मंदिर के लिए फूल-मालाएँ | तिरुप्पल्लाण्डु, तिरुमोऴि | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 14 |
| अंडाल (गोदा) | पेरियालवार की पाली हुई बेटी; अकेली स्त्री आलवार | तिरुप्पावै (30 पद), नाच्चियार तिरुमोऴि | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 14–15 |
| तोण्डरडिप्पोडि आलवार | मूल नाम विप्रनारायण; श्रीरंगम के लिए फूल | तिरुमालै, तिरुप्पळ्ळियेऴुच्चि | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 15 |
| तिरुप्पाण आलवार | पाणर दंपति ने पाला; अछूत माने जाते थे | अमलनादिपिरान् (10 पद) | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 15–16 |
| तिरुमंगै आलवार | चोल सेनापति के बेटे; पहले उपराजा | पेरिय तिरुमोऴि और अन्य | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 16–18 |
तिरुप्पाण: जिन्हें पुजारी कंधे पर ले गया
Hooper के अनुसार तिरुप्पाण अपने को अछूत मानते थे, इसलिए श्रीरंगम के द्वीप पर पैर न रखकर कावेरी के दक्षिणी किनारे से ही भगवान का गुणगान करते। एक दिन ब्राह्मण पुजारी लोकसारंग महामुनि भगवान के स्नान का पानी लेने आए और तिरुप्पाण से हटने को कहा; ध्यान में डूबे तिरुप्पाण ने सुना नहीं, तो पुजारी ने उन पर पत्थर फेंका।
कथा कहती है कि भगवान ने वह पानी स्वीकार नहीं किया और पुजारी को अपने भक्त के अपमान के लिए फटकारा। फिर आदेश दिया कि जाकर तिरुप्पाण को अपने कंधों पर बिठाकर मेरे पास लाओ। ऐसा ही हुआ, और उस अनुभव से तिरुप्पाण के दस पद फूटे।
आलवारों का समय
Hooper बताते हैं कि परंपरा आलवारों का समय ईसा से चार हज़ार बरस से भी पहले का मानती है, जबकि शुरुआती पश्चिमी विद्वानों ने उन्हें रामानुज (मृत्यु 1137 ई.) के बाद रखा था। अब यह सहमति है कि आलवार रामानुज से पहले हुए।
Hooper गोपीनाथ राव का क्रम अपनाते हैं: भूतत्तालवार अपने जन्म-स्थान के रूप में मामल्लै का नाम लेते हैं, जिसे पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम ने सातवीं सदी के मध्य में बंदरगाह बनाया, इसलिए पहले तीन आलवारों का समय सातवीं सदी का मध्य मानना होगा। नम्मालवार, कुलशेखर और तिरुमंगै को वे नौवीं सदी के पहले आधे में, और पेरियालवार व तोण्डरडिप्पोडि को उसी सदी के मध्य में रखते हैं। Govindacharya परंपरागत तिथियाँ देते हैं, जैसे अंडाल के लिए कलि संवत् 97।
