राजा अंबरीष
सातों द्वीपों का सम्राट, जिसने मन, वाणी और हर इंद्रिय भगवान की सेवा में लगा दी
संक्षेप में
राजा अंबरीष नाभाग के पुत्र और सातों द्वीपों वाली धरती के सम्राट थे, पर उन्होंने अपना मन, वाणी और हर इंद्रिय भगवान की सेवा में लगा दी। द्वादशी व्रत के पारण पर दुर्वासा ऋषि ने क्रोध में कृत्या भेजी, तो सुदर्शन चक्र ने उनकी रक्षा की, और भगवान ने कहा कि मैं भक्तों के अधीन हूँ।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 9.4.13; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 9, पृ. 6 (scan leaf n57) |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 9.4–9.5 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, नौवाँ स्कंध
अंबरीष की कथा श्रीमद्भागवत के नौवें स्कंध के चौथे और पाँचवें अध्याय में है, सूर्यवंश के राजाओं के वर्णन के बीच। राजा परीक्षित पूछते हैं कि उस राजर्षि की कथा सुनाइए, जिस पर ब्राह्मण का दुर्निवार शाप भी असर न कर सका; उत्तर में शुकदेव यह कथा कहते हैं।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
सातों द्वीपों वाली धरती और अपार धन पाकर भी अंबरीष उसे सपने जैसा मानते थे, यह जानते हुए कि वैभव का नाश मनुष्य को अंधकार में ले जाता है। भगवान वासुदेव और उनके भक्तों में उनका ऐसा प्रेम था कि सारा संसार उन्हें मिट्टी के ढेले जैसा लगता था।
उनकी भक्ति का सबसे प्रसिद्ध वर्णन यह है: उन्होंने मन को श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में, वाणी को भगवान के गुण गाने में, हाथों को मंदिर बुहारने में, कानों को कथा सुनने में, आँखों को मूर्ति और मंदिर के दर्शन में, शरीर को भक्तों के स्पर्श में, नाक को भगवान को चढ़ी तुलसी की गंध में, जीभ को उनके प्रसाद में, पैरों को तीर्थ-यात्रा में और सिर को उनके चरणों में प्रणाम में लगा दिया। कामना भी रखी, तो केवल सेवा की।
वे भगवान को समर्पित भाव से राज्य चलाते, यज्ञ करते, और धीरे-धीरे घर, पत्नी, पुत्र, हाथी-घोड़े और अपार ख़ज़ाने, सबसे उनका मोह छूट गया। उनकी एकनिष्ठ भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उनकी रक्षा के लिए अपना सुदर्शन चक्र दे दिया।
प्रमुख कथाएँ
द्वादशी का पारण
मूल ग्रंथ मेंभगवान की आराधना के लिए अंबरीष ने अपनी रानी के साथ एक वर्ष तक द्वादशी का व्रत रखा। व्रत के अंत में कार्तिक मास में तीन रात उपवास करके, यमुना में स्नान करके उन्होंने मधुवन में भगवान की बड़ी पूजा की, ब्राह्मणों को भोजन कराया, और सुनहरे सींगों और चाँदी के खुरों वाली अनगिनत सजी हुई गाएँ दान कीं (भागवत की गिनती में "छह न्यर्बुद")।
जब वे पारण करने ही वाले थे, दुर्वासा ऋषि अतिथि बनकर आए। राजा ने उठकर स्वागत किया और भोजन की प्रार्थना की। दुर्वासा ने स्वीकार किया, और स्नान-ध्यान के लिए यमुना चले गए; वहाँ वे देर तक ध्यान में डूबे रहे।
द्वादशी का आधा मुहूर्त ही बचा था। राजा धर्म-संकट में पड़े: ब्राह्मण से पहले खाऊँ तो दोष, और द्वादशी में पारण न करूँ तो भी दोष। ब्राह्मणों से सलाह करके उन्होंने बीच का रास्ता निकाला: केवल जल पीकर पारण करूँगा, क्योंकि जल पीना खाना भी है और नहीं भी। यह सोचकर, मन में भगवान का स्मरण करते हुए, उन्होंने जल पिया और दुर्वासा की राह देखने लगे।
कृत्या और सुदर्शन चक्र
मूल ग्रंथ मेंदुर्वासा लौटे और अपनी बुद्धि से जान गए कि राजा ने जल पी लिया है। भूखे और क्रोध से काँपते हुए वे बोले: धन के मद में अंधे इस राजा को देखो, जो विष्णु का भक्त नहीं, अपने को ईश्वर मानता है; मुझे अतिथि बुलाकर बिना खिलाए ख़ुद खा लिया। अभी इसका फल दिखाता हूँ।
उन्होंने क्रोध में अपनी एक जटा उखाड़ी, और उससे प्रलय की आग जैसी एक कृत्या पैदा की, जो हाथ में तलवार लिए, धरती को पैरों से कँपाती राजा की ओर दौड़ी। राजा अपनी जगह से हिले तक नहीं। भगवान ने भक्त की रक्षा के लिए जो चक्र पहले से रखा था, उसने उस कृत्या को ऐसे जला दिया जैसे आग क्रोधित साँप को।
फिर चक्र दुर्वासा के पीछे दौड़ा। दुर्वासा जान बचाने को भागे: मेरु की गुफा, दिशाएँ, आकाश, धरती, पाताल, समुद्र, लोकपालों के लोक और स्वर्ग, जहाँ भी गए, वहीं वह असह्य सुदर्शन दिखाई दिया।
"मैं भक्तों के अधीन हूँ"
मूल ग्रंथ मेंदुर्वासा ब्रह्मा के पास गए; ब्रह्मा ने कहा कि हम सब जिसकी आज्ञा सिर पर रखते हैं, उसके चक्र से मैं नहीं बचा सकता। फिर वे कैलास पर शिव के पास गए; शिव ने कहा कि मैं, सनत्कुमार, नारद, ब्रह्मा, कपिल और दूसरे सिद्ध भी उनकी माया नहीं जानते; यह उनका अस्त्र है, उन्हीं की शरण जाओ।
हारकर दुर्वासा वैकुण्ठ पहुँचे और काँपते हुए भगवान के चरणों में गिर पड़े: अनजाने में मैंने आपके प्रिय भक्त का अपराध किया, मुझे बचाइए। भगवान ने उत्तर दिया: ब्राह्मण, मैं भक्तों के अधीन हूँ, जैसे मेरी अपनी स्वतंत्रता ही न हो। मेरे भक्तों ने मेरा हृदय जीत लिया है। जो पत्नी, घर, पुत्र, प्राण और धन छोड़कर मेरी शरण आए, उन्हें मैं कैसे छोड़ दूँ?
भगवान ने कहा: साधु मेरा हृदय हैं, और मैं साधुओं का हृदय; वे मेरे सिवा कुछ नहीं जानते, और मैं उनके सिवा कुछ नहीं। साधु पर चलाया गया तेज चलाने वाले का ही अनिष्ट करता है। इसलिए जाओ, नाभाग के पुत्र राजा अंबरीष से क्षमा माँगो; तभी शांति मिलेगी।
क्षमा, और एक वर्ष का इंतज़ार
मूल ग्रंथ मेंचक्र से जलते दुर्वासा लौटकर अंबरीष के पैरों पर गिर पड़े। ऋषि के पैर पकड़ने से राजा बहुत लज्जित हुए, और करुणा से भरकर सुदर्शन की स्तुति करने लगे: अगर मैंने कभी दान या यज्ञ किया हो, अपना धर्म ठीक से निभाया हो, और भगवान मुझ पर प्रसन्न हों, तो यह ब्राह्मण ताप से मुक्त हो। राजा की प्रार्थना पर चक्र शांत हो गया।
दुर्वासा बोले: आज मैंने भगवान के दासों की महिमा देखी; मैंने अपराध किया, फिर भी तुम मेरा भला ही चाहते रहे। जिसके नाम भर से मनुष्य निर्मल हो जाता है, उसके दासों के लिए क्या कठिन है?
दुर्वासा के भागने और लौटने के बीच पूरा एक वर्ष बीत गया था, और इस पूरे समय राजा ने उनके लौटने की आस में केवल जल पीकर दिन बिताए। अब उन्होंने ऋषि के पैर पकड़कर उन्हें प्रसन्न किया और भोजन कराया; तृप्त होकर दुर्वासा ने आशीर्वाद दिया और ब्रह्मलोक गए। उसके बाद ही राजा ने भोजन किया।
भक्ति और शरणागति की सीख
हर इंद्रिय भगवान की सेवा में
अंबरीष की भक्ति कोई एक साधन नहीं, पूरे जीवन का ढंग है: मन, वाणी, हाथ, कान, आँख, नाक, जीभ, पैर और सिर, सब भगवान की सेवा में। वे सम्राट बने रहे, यज्ञ करते रहे, पर हर काम भगवान को अर्पित करके।
शक्ति अपनी नहीं
ऋषि का छूटना और अपना संकट टल जाना देखकर भी अंबरीष ने इसे अपनी शक्ति नहीं माना; उन्होंने इसे भगवान का प्रभाव समझा। और जिस ऋषि ने उन्हें मारने के लिए कृत्या भेजी थी, उसी के लिए उन्होंने अपने पुण्य दाँव पर लगाकर प्रार्थना की।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
इंद्रियों का समर्पण
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो-
र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने।
करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु
श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये॥उन्होंने अपना मन श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में, वाणी भगवान वैकुण्ठनाथ के गुण गाने में, हाथ हरि के मंदिर को बुहारने-सँवारने में, और कान अच्युत की पवित्र कथा सुनने में लगा दिए।
भगवान का वचन
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥हे ब्राह्मण, मैं भक्तों के अधीन हूँ, मानो मेरी अपनी स्वतंत्रता ही न हो। भक्तों को प्रिय मानने वाले मेरे हृदय को साधु भक्तों ने अपने वश में कर लिया है।
साधु मेरा हृदय
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥साधु मेरा हृदय हैं, और मैं साधुओं का हृदय। वे मेरे सिवा कुछ नहीं जानते, और मैं उनके सिवा ज़रा भी कुछ नहीं जानता।
परंपरा में स्थान
दुर्वासा जाते-जाते कहते हैं कि अंबरीष का यह निर्मल कर्म स्वर्ग की स्त्रियाँ बार-बार गाती हैं, और धरती भी उनकी पवित्र कीर्ति गाती रहेगी। अंत में अंबरीष ने राज्य अपने जैसे स्वभाव वाले पुत्रों को सौंपा और भगवान वासुदेव में मन लगाकर वन चले गए।
भागवत कहता है कि जो अंबरीष की इस पवित्र कथा का कीर्तन और चिंतन करता है, वह भगवान का भक्त बन जाता है।
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देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
ऋषि
- महर्षि दुर्वासा — जिनके क्रोध से यह कथा शुरू होती है (भागवत 9.4–9.5)
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 9.4.13–9.5.28
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 9, पृ. 6, 7, 9 (scan leaf n57, n58, n60)
