वृत्रासुर
इन्द्र से लड़ता असुर, जिसने युद्ध के बीच भगवान से उनके दासों का दास होना माँगा
संक्षेप में
वृत्रासुर त्वष्टा के यज्ञ से इन्द्र को मारने के लिए जन्मा असुर था, पर पिछले जन्म में वह भक्त राजा चित्रकेतु था। इन्द्र से युद्ध के बीच उसने भगवान से स्वर्ग, ब्रह्मलोक या मोक्ष नहीं, केवल उनके दासों का दास होना माँगा, और इन्द्र ने ख़ुद माना कि असुर होकर भी वह सिद्ध भक्त है।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.9.11–18 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.9–6.12; 6.17.38 |
| पिछला जन्म | चित्रकेतु | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.17.38 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, छठा स्कंध
वृत्र की कथा श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध, अध्याय 9 से 12 में है। राजा परीक्षित को आश्चर्य होता है कि जिसकी भक्ति देवताओं और ऋषियों को भी कठिनाई से मिलती है, वह भक्ति इस असुर में कैसे थी; इसका उत्तर अध्याय 14 से 17 की चित्रकेतु-कथा में है।
पृष्ठभूमि
जन्म
त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप देवताओं के पुरोहित थे, पर माँ की ओर के स्नेह से असुरों को भी छिपकर यज्ञ-भाग देते थे। यह जानकर इन्द्र ने क्रोध में उनके तीनों सिर काट दिए। पुत्र के मारे जाने पर त्वष्टा ने यज्ञ में आहुति दी: हे इन्द्र-शत्रु, बढ़ो और शत्रु को जल्दी मारो। यज्ञ की अग्नि से एक भयानक रूप वाला असुर उठा, जो हर दिन चारों ओर बढ़ता था; उसने सब लोकों को घेर लिया, इसलिए उसका नाम वृत्र पड़ा।
भागवत बताता है कि यह वृत्र पिछले जन्म में विद्याधरों का राजा चित्रकेतु था, जो पार्वती के शाप से असुर योनि में आया, पर ज्ञान और विज्ञान उसके साथ रहे।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
वृत्र की भक्ति युद्ध के बीच दिखी। वह जानता था कि इन्द्र का वज्र भगवान हरि के तेज और दधीचि के तप से बना है, और भगवान ने ही इन्द्र को उसे चलाने भेजा है। इसलिए वह मृत्यु से नहीं डरा; उसने कहा कि भगवान संकर्षण के बताए अनुसार मैं उनके चरणों में मन लगाकर, वज्र से संसार का बंधन कटते ही मुनियों की गति पाऊँगा।
उसने यह भी कहा कि भगवान अपने एकनिष्ठ भक्तों को वह संपत्ति नहीं देते, जिससे द्वेष, चिंता, मद और कलह पैदा हो; जब धन, धर्म और कामना के प्रयास विफल हों, तो उसे भगवान की कृपा समझो।
प्रमुख कथाएँ
इन्द्र से युद्ध
मूल ग्रंथ मेंदेवताओं के सब अस्त्र वृत्र निगल गया। तब भगवान के कहने पर देवताओं ने महर्षि दधीचि से उनका शरीर माँगा; दधीचि ने कहा कि जो नश्वर शरीर से भी प्राणियों पर दया करके धर्म और यश न कमाए, उस पर पेड़-पौधे भी शोक करते हैं, और योग से देह त्याग दी। उनकी हड्डियों से विश्वकर्मा ने वज्र बनाया, और इन्द्र उसे लेकर वृत्र पर टूट पड़े।
युद्ध में असुर सेना भागने लगी, तो वृत्र ने उन्हें ललकारा और अपनी भयंकर गर्जना से देवताओं को मूर्छित कर दिया। इन्द्र की फेंकी गदा उसने खेल-खेल में बाएँ हाथ से पकड़ ली, और उसी से ऐरावत के माथे पर ऐसा प्रहार किया कि हाथी इन्द्र सहित पीछे हट गया। पर घायल वाहन वाले, दुखी इन्द्र पर उसने दोबारा प्रहार नहीं किया।
फिर अपने भाई विश्वरूप के मारे जाने को याद करते हुए वृत्र ने इन्द्र से कहा: तुम ब्राह्मण, गुरु और भाई के हत्यारे हो; आज मैं अपने भाई के ऋण से उऋण होऊँगा। और अगर तुम्हारा वज्र मेरा सिर काटे, तो मैं महात्माओं के चरणों की धूल पाऊँगा। सुरेश, देर क्यों करते हो? यह वज्र भगवान के तेज से भरा है, यह व्यर्थ नहीं जाएगा; जहाँ हरि हैं, वहीं विजय है।
भयंकर युद्ध में इन्द्र के हाथ से वज्र छूटकर वृत्र के पास गिर पड़ा, और लज्जित इन्द्र उसे उठा नहीं रहे थे। तब वृत्र बोला: वज्र उठाओ और अपने शत्रु को मारो, यह दुखी होने का समय नहीं। लड़ने वालों की जीत हमेशा एक की नहीं होती; सब काल के, भगवान के अधीन हैं, जैसे लकड़ी की कठपुतली। इसलिए यश-अपयश, जीत-हार, सुख-दुख और जीवन-मृत्यु में समान रहना चाहिए।
इन्द्र ने आश्चर्य से कहा: हे दानव, तुम सिद्ध हो, जिसकी ऐसी बुद्धि है। तुमने वह वैष्णवी माया पार कर ली, जो सबको मोहती है; असुर भाव छोड़कर तुम महापुरुष बन गए। रजोगुणी स्वभाव में भी भगवान वासुदेव में ऐसी दृढ़ बुद्धि, यह बड़ा आश्चर्य है। जो अमृत के समुद्र में खेलता हो, उसे गड्ढे के पानी से क्या?
फिर युद्ध चला। इन्द्र ने वृत्र की दोनों भुजाएँ काट दीं, तो उसने मुँह फैलाकर इन्द्र को ऐरावत सहित निगल लिया। पर भगवान के कवच और योगमाया से रक्षित इन्द्र मरे नहीं; वज्र से उसका पेट फाड़कर बाहर निकले और उसका सिर काट दिया। तब सब देवताओं के देखते-देखते वृत्र के शरीर से उसकी आत्म-ज्योति निकली और भगवान में जा मिली।
भक्ति और शरणागति की सीख
देह असुर की, मन भक्त का
वृत्र की कथा दिखाती है कि भक्ति जन्म या योनि की मोहताज नहीं। जिसे सारा संसार पापी असुर मानता था, उसी ने युद्ध के मैदान में स्वर्ग, ब्रह्मा का पद, पृथ्वी का राज, पाताल का अधिकार, योग-सिद्धियाँ और मोक्ष, सब ठुकराकर केवल भगवान के बिना न रहना माँगा।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
अहं हरे तव: दासों का दास
अहं हरे तव पादैकमूल-
दासानुदासो भवितास्मि भूयः।
मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते
गृणीत वाक्कर्म करोतु कायः॥हे हरि, मैं फिर से उन दासों का दास बनूँ, जिनका एकमात्र आश्रय आपके चरण हैं। हे प्राणनाथ, मेरा मन आपके गुणों का स्मरण करे, वाणी आपका गुणगान करे, और शरीर आपकी सेवा के कर्म करे।
दर्शन की तड़प
अजातपक्षा इव मातरं खगाः
स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा
मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥हे कमलनयन, जैसे बिना पंख वाले चिड़िया के बच्चे माँ की राह देखते हैं, जैसे भूखे बछड़े दूध के लिए तड़पते हैं, और जैसे परदेस गए प्रिय के लिए उदास प्रिया व्याकुल रहती है, वैसे ही मेरा मन आपको देखने को तरसता है।
संबंधित भक्त
- चित्रकेतु — पिछला जन्म
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देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 6.9–6.12; 6.17.38
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 6, पृ. 24 (scan leaf n313)
