यशोदा

व्रज की माँ, जिसने भगवान को बेटा मानकर ओखल से बाँधा, और भगवान बँध गए

संक्षेप में

माता यशोदा व्रज के राजा नंद की पत्नी थीं, जिन्होंने श्रीकृष्ण को अपना पुत्र मानकर पाला। एक बार उन्होंने कृष्ण के मुख में पूरा ब्रह्मांड देखा, और एक बार माखन चुराने पर उन्हें ओखल से बाँध दिया। भागवत कहता है कि जो कृपा उन्हें मिली, वह ब्रह्मा, शिव और लक्ष्मी को भी नहीं मिली।

श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

यशोदा — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.3.53; 10.9.1; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 19 (scan leaf n116)
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.3–10.9; 10.46; 10.82
पतिनंद बाबाश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.9.1; 10.8.50; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 19 (scan leaf n116)

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कंध

यशोदा का वर्णन श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में कई जगह है: कृष्ण के व्रज आने पर (अध्याय 3), बाल-लीलाओं में (अध्याय 6 से 9), उद्धव के व्रज आने पर (अध्याय 46), और बरसों बाद कुरुक्षेत्र में मिलने पर (अध्याय 82)।

पृष्ठभूमि

कौन थीं

यशोदा व्रज के राजा नंद की पत्नी थीं। कृष्ण के जन्म की रात वसुदेव ने बालक कृष्ण को सोती यशोदा के पलंग पर रख दिया और उनकी नवजात कन्या को ले गए। थकान और नींद से बेसुध यशोदा को बस इतना पता चला कि संतान हुई है, यह नहीं कि बेटा या बेटी।

भागवत बताता है कि पिछले जन्म में नंद वसुओं में श्रेष्ठ द्रोण थे और यशोदा उनकी पत्नी धरा। उन्होंने ब्रह्मा से माँगा था कि धरती पर जन्म लें तो भगवान हरि में हमारी परम भक्ति हो; इसलिए भगवान ने व्रज में उनका पुत्र बनकर रहना स्वीकार किया।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

यशोदा की भक्ति वात्सल्य की है: वे कृष्ण को भगवान नहीं, अपना बेटा मानती थीं। भागवत कहता है कि जिन हरि की महिमा वेद, उपनिषद, सांख्य और योग गाते हैं, उन्हें यशोदा अपना पुत्र ही समझती रहीं। दही मथते हुए भी वे उनकी बाल-लीलाओं के गीत गाती थीं।

जब पूतना के बाद बालक बच गया, तो यशोदा और रोहिणी ने गोपियों के साथ गाय की पूँछ घुमाकर, गोबर-गोमूत्र से और भगवान के नामों से उसकी रक्षा का अनुष्ठान किया, जिस बालक से सारे जगत की रक्षा होती है।

प्रमुख कथाएँ

मुख में ब्रह्मांड

मूल ग्रंथ में

एक दिन बलराम और ग्वाल-बालों ने यशोदा से शिकायत की कि कृष्ण ने मिट्टी खाई है। यशोदा ने हाथ पकड़कर डाँटा। कृष्ण बोले: माँ, मैंने नहीं खाई, ये सब झूठ बोल रहे हैं; विश्वास न हो तो मेरा मुँह देख लो। यशोदा ने कहा: तो मुँह खोलो।

मुँह खुला, तो यशोदा ने उसमें सारा जगत देखा: आकाश, दिशाएँ, पर्वत, द्वीप, समुद्र, पृथ्वी, वायु, अग्नि, चंद्रमा, तारे, और उनके साथ अपना व्रज और ख़ुद को भी। वे डर गईं: यह सपना है, देवताओं की माया है, या मेरी बुद्धि का भ्रम? फिर उन्होंने उस परम तत्त्व को प्रणाम किया, जिसकी माया से उन्हें लगता है कि "मैं हूँ, ये मेरे पति हैं, यह मेरा बेटा है"।

तब भगवान ने उन पर पुत्र-स्नेह वाली अपनी वैष्णवी माया फैला दी। यशोदा उसी क्षण सब भूल गईं, बेटे को गोद में उठा लिया, और उनका हृदय पहले जैसा स्नेह से भर गया।

ओखल से बँधे भगवान

मूल ग्रंथ में

एक दिन यशोदा ख़ुद दही मथ रही थीं। कृष्ण दूध पीने आए, मथानी पकड़ ली, और माँ ने उन्हें गोद में दूध पिलाना शुरू किया। तभी चूल्हे पर रखा दूध उफनने लगा, और यशोदा उन्हें अतृप्त छोड़कर उधर दौड़ीं। गुस्से में कृष्ण ने होंठ दबाकर पत्थर से दही की मटकी फोड़ दी, झूठे आँसू बहाए, और भीतर जाकर माखन खाने लगे।

लौटकर टूटी मटकी देखी तो यशोदा हँस पड़ीं। कृष्ण उलटे ओखल पर चढ़कर छींके से माखन बंदरों को बाँट रहे थे, चोरी की आशंका से इधर-उधर देखते हुए। माँ को छड़ी लिए आते देखा तो डरकर भागे; जिन्हें योगियों का तप से साधा मन भी नहीं पकड़ पाता, उनके पीछे यशोदा दौड़ीं और आख़िर पकड़ लिया। रोते, आँखें मलते, डरे हुए बेटे को देखकर उन्होंने छड़ी फेंक दी, और उनकी महिमा न जानते हुए रस्सी से ओखल में बाँधने लगीं।

पर रस्सी दो उँगल छोटी पड़ गई। यशोदा ने दूसरी जोड़ी, वह भी दो उँगल छोटी; घर की सारी रस्सियाँ जोड़ डालीं, फिर भी दो उँगल कम। गोपियाँ मुस्कुरा रही थीं, यशोदा भी मुस्कुराती हुई अचरज में पड़ गईं। माँ को पसीने से भीगी, बिखरे बालों वाली और थकी हुई देखकर कृष्ण ने कृपा की, और बँध गए।

शुकदेव कहते हैं: इस तरह, जिनके वश में सारा जगत है, उन स्वतंत्र भगवान ने दिखाया कि वे अपने भक्तों के वश में रहते हैं। पेट पर रस्सी बाँधे वही बालक ओखल घसीटता हुआ दो अर्जुन के पेड़ों के बीच से निकला; इसी प्रसंग में भागवत उन्हें "दामोदर" कहता है।

विरह और मिलन

मूल ग्रंथ में

कृष्ण के मथुरा जाने के बाद जब उद्धव व्रज आए और नंद कृष्ण की बातें याद करने लगे, तो बेटे की लीलाएँ सुनते हुए यशोदा के आँसू बहते रहे और स्नेह से उनके स्तनों से दूध बह चला। नंद और यशोदा का कृष्ण में ऐसा प्रेम देखकर उद्धव भी आनंद से भर गए।

बरसों बाद सूर्य-ग्रहण पर कुरुक्षेत्र में मिलन हुआ। यशोदा ने कृष्ण और बलराम को गोद में बिठाकर गले लगाया, और उनका सारा दुख मिट गया। देवकी और रोहिणी ने उन्हें गले लगाकर कहा: व्रजेश्वरी, तुम्हारी मित्रता कौन भूल सकता है? इन्द्र का वैभव पाकर भी उसका बदला नहीं चुकाया जा सकता; इन दोनों ने अपने माता-पिता को देखा भी नहीं था, और तुमने इन्हें आँख की पलक की तरह सँभाला।

भक्ति और शरणागति की सीख

प्रेम से बँधते हैं भगवान

ओखल-बंधन की कथा भागवत का एक बड़ा संदेश है: जिन्हें घर की सारी रस्सियाँ नहीं बाँध सकीं, वे माँ का परिश्रम देखकर अपनी इच्छा से बँध गए। भगवान ज्ञानियों और तपस्वियों को भी उतनी आसानी से नहीं मिलते, जितनी आसानी से प्रेम करने वाले भक्तों को।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

यशोदा की कृपा सबसे बड़ी

नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया। प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत्प्राप विमुक्तिदात्॥

मोक्ष देने वाले भगवान से गोपी यशोदा ने जो कृपा पाई, वह न ब्रह्मा को मिली, न शिव को, न उनके वक्ष पर रहने वाली लक्ष्मी को।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 9, श्लोक 20

भक्तों को सहज मिलते हैं

नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह॥

गोपी यशोदा के पुत्र ये भगवान देहधारियों को, ज्ञानियों को और आत्मज्ञानियों को भी उतनी आसानी से नहीं मिलते, जितनी आसानी से यहाँ भक्ति करने वालों को।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 9, श्लोक 21

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देवता

स्रोत

यशोदा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न