रुक्मिणी
विदर्भ की राजकुमारी, जिसने कृष्ण को मन से पति चुना और अपना संदेश भेजकर उन्हें बुलाया
संक्षेप में
रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थीं, जिन्होंने कृष्ण के गुण सुनकर उन्हें मन से पति चुन लिया। भाई रुक्मी उनका विवाह शिशुपाल से करना चाहता था, तो उन्होंने एक ब्राह्मण के हाथ कृष्ण को संदेश भेजा, और कृष्ण अंबिका-मंदिर से उनका हरण करके उन्हें द्वारका ले गए।
श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.52.21–22; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10 उत्तरार्ध, पृ. 18 (scan leaf n215) |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.52–10.54; 10.60 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कंध
रुक्मिणी की कथा श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध, अध्याय 52 से 54 में है, जहाँ उनका संदेश, हरण और विवाह है; और अध्याय 60 में, जहाँ कृष्ण हँसी में उनके प्रेम की परीक्षा लेते हैं।
पृष्ठभूमि
कौन थीं
विदर्भ के राजा भीष्मक के पाँच पुत्र थे, रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्ममाली, और एक सुंदर पुत्री, रुक्मिणी। घर आने वाले लोगों से कृष्ण के रूप, पराक्रम और गुणों के गीत सुनकर रुक्मिणी ने उन्हें अपने योग्य पति माना; और कृष्ण ने भी उन्हें बुद्धि, शील और गुणों में अपने योग्य पत्नी माना।
बाकी परिवार रुक्मिणी का विवाह कृष्ण से करना चाहता था, पर कृष्ण से द्वेष रखने वाले बड़े भाई रुक्मी ने उन्हें रोककर चेदि के राजा शिशुपाल को चुना।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
रुक्मिणी का प्रेम पहले सुनने से जन्मा: कृष्ण के गुण कानों से भीतर जाकर ताप हरते हैं, और उनका रूप देखने वालों की आँखों का सबसे बड़ा लाभ है। उन्होंने कहा कि यह सुनकर उनका मन लाज छोड़कर कृष्ण में लग गया।
संदेश के अंत में उन्होंने कहलवाया कि शिव जैसे महात्मा भी जिनके चरणों की धूल में नहाना चाहते हैं, यदि उनकी कृपा न मिली, तो व्रत से सूखे इन प्राणों को त्याग दूँगी, सौ जन्मों में ही सही, आप मिलेंगे।
प्रमुख कथाएँ
रुक्मिणी का संदेश
मूल ग्रंथ मेंयह जानकर रुक्मिणी बहुत दुखी हुईं, और एक भरोसेमंद ब्राह्मण को तुरंत द्वारका भेजा। ब्राह्मणों का आदर करने वाले कृष्ण ने उसे अपने आसन से उठकर बैठाया, उसकी पूजा की, खिलाया, और पूछा कि कैसे आना हुआ। ब्राह्मण ने रुक्मिणी का संदेश सुनाया।
संदेश में रुक्मिणी कहती हैं: हे मुकुंद, कुल, शील, रूप, विद्या, आयु, धन और प्रभाव में आपके जैसा कौन है? कौन धीर, कुलीन कन्या समय आने पर आपको पति नहीं चुनेगी? इसलिए मैंने आपको पति चुना है, और ख़ुद को आपको सौंप दिया है; ऐसा न हो कि वीर का भाग शिशुपाल छू ले, जैसे सिंह का भाग सियार।
फिर उन्होंने उपाय भी बताया: कल विवाह है; आप सेना के साथ गुप्त रूप से आइए, शिशुपाल और जरासंध की सेना को हराकर पराक्रम के बल पर मुझसे विवाह कीजिए। यदि सोचें कि भीतर महल में रहने वाली को बंधुओं को मारे बिना कैसे ले जाएँ, तो विवाह से एक दिन पहले कुल-देवी की यात्रा होती है, जिसमें नई दुल्हन नगर से बाहर गिरिजा के दर्शन को जाती है।
ग्रंथों में अंतर
लिखा हुआ पत्र: लोक में यह प्रसंग "रुक्मिणी का पत्र" के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीमद्भागवत के GRETIL पाठ में ब्राह्मण उनके "गुह्य संदेश" लाता है (10.52.44); कृष्णाचार्य संस्करण (1916) में यहाँ कोष्ठक में दो अतिरिक्त श्लोक हैं, जिनमें ब्राह्मण लिखा हुआ पत्र कृष्ण के चरणों में रखता है और कृष्ण उसे पढ़वाते हैं।
अंबिका-मंदिर से हरण
मूल ग्रंथ मेंसंदेश सुनकर कृष्ण ने ब्राह्मण का हाथ पकड़कर हँसते हुए कहा: मेरा मन भी उसी में लगा है, रात को नींद नहीं आती; मैं जानता हूँ कि रुक्मी ने द्वेष से यह विवाह रोका है। मैं उन नीच राजाओं को युद्ध में मथकर उसे ले आऊँगा। और उन्होंने तुरंत रथ जुतवाया।
उधर रुक्मिणी चिंता में थीं: विवाह में एक ही रात बची है, कमलनयन नहीं आए, ब्राह्मण भी नहीं लौटा; क्या उन्होंने मुझमें कोई दोष देखा? क्या विधाता, शिव या देवी गौरी मुझसे रूठे हैं? यह सोचते हुए उन्होंने आँसू भरी आँखें बंद कर लीं, तभी उनकी बाईं जाँघ, भुजा और आँख फड़कीं, शुभ समाचार का संकेत।
अगले दिन रुक्मिणी मौन रहकर, माताओं और सखियों के साथ, सशस्त्र सैनिकों से घिरी, पैदल अंबिका के मंदिर गईं, मन में मुकुंद के चरणों का ध्यान करते हुए। वहाँ उन्होंने देवी को प्रणाम करके प्रार्थना की: हे अंबिका, भगवान कृष्ण मेरे पति हों, आप इसकी अनुमति दें।
मंदिर से निकलकर वे धीरे-धीरे रथ की ओर बढ़ते हुए कृष्ण की राह देख रही थीं। उनके रूप पर मुग्ध वहाँ आए राजा सुध-बुध खो बैठे, और उसी समय सब शत्रुओं के देखते-देखते कृष्ण ने रथ पर चढ़ती राजकुमारी को उठाकर अपने गरुड़-ध्वज वाले रथ पर बैठा लिया और चल पड़े, जैसे सियारों के बीच से सिंह अपना भाग ले जाए।
रुक्मी ने पीछा किया और कृष्ण से लड़ा। कृष्ण ने उसकी ढाल-तलवार काट दी और उसे मारने के लिए तलवार उठाई, तो डर से काँपती रुक्मिणी उनके चरणों में गिरकर बोलीं: हे देवों के देव, मेरे भाई को मत मारिए। करुणा से कृष्ण रुक गए, और उसे केवल बाँधकर, सिर और दाढ़ी-मूँछ के बाल मूँडकर कुरूप कर दिया; बलराम ने आकर उसे छुड़वाया।
कृष्ण की परीक्षा
मूल ग्रंथ मेंएक दिन द्वारका में कृष्ण ने हँसी में रुक्मिणी से कहा: बड़े-बड़े राजा तुम्हें चाहते थे, फिर तुमने हमें क्यों चुना? हम राजाओं के डर से समुद्र में आ बसे हैं, हमारा रास्ता साफ़ नहीं; हम अकिंचन हैं, और अकिंचनों को ही प्रिय हैं, इसलिए धनवान हमें कम भजते हैं। बराबर वालों में विवाह होता है; अब भी अपने योग्य किसी क्षत्रिय को चुन लो। हम तो उदासीन हैं, पत्नी और संतान के इच्छुक नहीं।
प्रियतम से ऐसी बात पहले कभी न सुनी थी। रुक्मिणी डरकर काँपने लगीं, पैर के नाखून से धरती कुरेदती, आँसू बहाती, सिर झुकाए खड़ी रहीं; हाथ से पंखा गिर पड़ा, और वे बेसुध होकर गिर पड़ीं। कृष्ण तुरंत पलंग से उतरे, उन्हें उठाया, आँसू पोंछे और कहा: वैदर्भी, बुरा मत मानो; मैं जानता हूँ तुम केवल मुझमें लगी हो। मैंने यह हँसी में कहा था, तुम्हारी बात सुनने और प्रेम से फड़कते होंठ देखने को।
संभलकर रुक्मिणी ने उत्तर दिया: सच है, मैं आपके योग्य नहीं; कहाँ अपनी महिमा में रमे तीनों लोकों के स्वामी, और कहाँ मैं। सच है कि आप मानो गुणों से डरकर समुद्र में सोते हैं, शुद्ध चेतना के रूप में; और आपके सेवकों ने राजपद को अंधकार मानकर छोड़ दिया है। हे कमलनयन, आपके चरणों में मेरा प्रेम बना रहे; और जब आप मेरी ओर देखते हैं, वही मुझ पर सबसे बड़ी कृपा है।
कृष्ण बोले: साध्वी, यही सुनने के लिए मैंने तुम्हें छेड़ा था; तुमने जो कहा, सब सत्य है। मैंने तुम्हारे प्रेम और पतिव्रत को देख लिया, क्योंकि ऐसी बातों से डिगाए जाने पर भी तुम्हारी बुद्धि मुझसे नहीं हटी।
भक्ति और शरणागति की सीख
सुनने से जन्मा प्रेम
रुक्मिणी ने कृष्ण को देखा नहीं था, केवल उनके गुण सुने थे, और उसी से मन उन्हें सौंप दिया। भागवत में उनकी कथा श्रवण से भक्ति का उदाहरण है; और अध्याय 60 दिखाता है कि ऐसे प्रेम को भगवान की परीक्षा भी डिगा नहीं पाती।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
गुण सुनकर लगा मन
श्रुत्वा गुणान्भुवनसुन्दर शृण्वतां ते
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥हे भुवन-सुंदर, आपके गुण सुनने वालों के कानों से भीतर जाकर उनका सारा ताप हर लेते हैं, और आपका रूप देखने वालों की आँखों का सबसे बड़ा लाभ है। हे अच्युत, यह सुनकर मेरा मन लाज छोड़कर आप में लग गया है।
मैंने आपको पति चुना
तन्मे भवान्खलु वृतः पतिरङ्ग जाया-
मात्मार्पितश्च भवतोऽत्र विभो विधेहि।
मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्य आरा-
द्गोमायुवन्मृगपतेर्बलिमम्बुजाक्ष॥इसलिए मैंने आपको ही पति चुना है, और अपने को आपको सौंप दिया है; हे विभु, मुझे अपनी पत्नी बनाइए। हे कमलनयन, ऐसा न हो कि वीर के भाग को शिशुपाल आकर छू ले, जैसे सिंह के भाग को सियार।
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देवता
- श्री कृष्ण — श्रीकृष्ण के पाठ और तीर्थ
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 10.52.21–44; 10.53; 10.54.31–36; 10.60.10–51
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 10 उत्तरार्ध, पृ. 18 (scan leaf n215)
