राजा बलि
तीनों लोकों का विजेता, जिसने वचन के लिए अपना सिर भगवान के तीसरे पग के आगे कर दिया
संक्षेप में
राजा बलि विरोचन के पुत्र और भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे, असुरों के राजा, जिन्होंने तीनों लोक जीत लिए थे। जब भगवान वामन बनकर तीन पग भूमि माँगने आए, तो गुरु शुक्राचार्य के रोकने और शाप देने पर भी उन्होंने वचन नहीं तोड़ा, और तीसरे पग के लिए अपना सिर आगे कर दिया।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 8.15.3–4; 8.22.28–30 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 8.15–8.23 |
| पितामह | भक्त प्रह्लाद | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.18.16 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, आठवाँ स्कंध
राजा परीक्षित पूछते हैं कि जगत के स्वामी ने एक याचक की तरह बलि से तीन पग भूमि क्यों माँगी, और माँग पूरी होने पर भी उस निर्दोष को बाँधा क्यों? इसी प्रश्न के उत्तर में शुकदेव आठवें स्कंध के पंद्रहवें से तेईसवें अध्याय तक बलि और वामन की कथा कहते हैं।
पृष्ठभूमि
वंश
भागवत के अनुसार प्रह्लाद के पुत्र विरोचन थे, और विरोचन के पुत्र बलि। बलि के सौ पुत्र हुए, जिनमें सबसे बड़े बाणासुर थे।
तीनों लोकों की विजय
देवासुर संग्राम में इन्द्र ने बलि को हराकर मार डाला था, पर भृगुवंशी ब्राह्मणों, यानी शुक्राचार्य और उनके शिष्यों ने उन्हें फिर जीवित किया। बलि ने तन-मन-धन से उनकी सेवा की, और उन्होंने बलि से विश्वजित यज्ञ करवाया, जिसकी अग्नि से सोने का रथ, घोड़े और दिव्य धनुष निकले। पितामह प्रह्लाद ने उन्हें कभी न मुरझाने वाली माला दी।
बलि ने स्वर्ग पर चढ़ाई की, और देवगुरु बृहस्पति की सलाह पर देवता स्वर्ग छोड़कर छिप गए। बलि ने इन्द्र की नगरी पर अधिकार करके तीनों लोक अपने वश में कर लिए, और भृगुवंशियों ने उनसे सौ अश्वमेध यज्ञ करवाए।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
बलि की भक्ति वचन की सच्चाई में दिखती है। शुक्राचार्य ने बताया कि यह बालक स्वयं विष्णु है, तब भी उन्होंने कहा कि अगर यह वही विष्णु है, तो इसे देना और भी अच्छा। भगवान ने ख़ुद बाद में कहा कि गुरु के डाँटने और शाप देने पर भी इस सत्यवादी ने सत्य नहीं छोड़ा।
और जब सब छिन गया, तो बलि ने इसे दंड नहीं, कृपा माना: सबसे योग्य के हाथों मिला दंड सबसे बड़ा सम्मान है, जो माता, पिता, भाई और मित्र भी नहीं दे पाते। आप ही हम असुरों के छिपे हुए परम गुरु हैं, जिन्होंने धन के मद में अंधे हमें आँखें दीं।
प्रमुख कथाएँ
वामन का आगमन
मूल ग्रंथ मेंदेवताओं की माता अदिति के व्रत से भगवान ने वामन रूप में जन्म लिया। उन्होंने सुना कि बलि नर्मदा के उत्तरी तट पर भृगुकच्छ नाम की जगह भृगुवंशियों के साथ अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं। वे छाता, दंड और जल-भरा कमंडल लिए, मूँज की मेखला और यज्ञोपवीत पहने, एक बौने ब्रह्मचारी के रूप में यज्ञशाला में पहुँचे।
उनके तेज से पुरोहित भी चकित होकर उठ खड़े हुए। बलि ने प्रसन्न होकर आसन दिया, उनके पैर धोए, और वह जल अपने सिर पर रखा। फिर बोले: आज मेरे पितर तृप्त हुए, मेरा कुल पवित्र हुआ; ब्रह्मचारी, जो चाहो माँग लो: गाय, सोना, घर, अन्न, कन्या, गाँव, घोड़े, हाथी या रथ।
तीन पग भूमि
मूल ग्रंथ मेंवामन ने बलि के कुल और उनके पितामह प्रह्लाद की प्रशंसा की, और कहा: मुझे बस अपने पैरों से नापी तीन पग भूमि चाहिए। बलि हँसे: तुम बालक हो, नादान हो; तीनों लोकों के स्वामी से तीन पग माँगते हो? मुझसे माँगने वाले को फिर किसी से माँगना न पड़े, इतनी भूमि ले लो।
वामन बोले: जिसने इंद्रियों को नहीं जीता, उसे तीनों लोकों के सारे सुख भी तृप्त नहीं कर सकते। संतोष ही सुख है; मुझे तीन पग ही चाहिए।
गुरु की चेतावनी और शाप
मूल ग्रंथ मेंशुक्राचार्य ने बलि को रोका: यह कश्यप और अदिति का पुत्र, स्वयं अविनाशी विष्णु है, देवताओं का काम करने आया है। यह तीन पग में तीनों लोक नाप लेगा; एक पग से धरती, दूसरे से स्वर्ग, और विराट शरीर से आकाश; तीसरा पग कहाँ रखोगे? जो दान जीविका ही छीन ले, उसकी प्रशंसा नहीं होती।
बलि कुछ क्षण चुप रहे, फिर बोले: आपने सच कहा, पर मैं प्रह्लाद का पौत्र होकर, "दूँगा" कहकर धन के लोभ में एक ब्राह्मण को कैसे लौटा दूँ? मुझे नरक, ग़रीबी, पद छिनने या मृत्यु से उतना डर नहीं, जितना ब्राह्मण को धोखा देने से। दधीचि और शिबि ने प्राण तक दे दिए; अगर यह विष्णु ही है, तो इसे देना और भी अच्छा, और यह मुझे अधर्म से बाँधे भी, तो भी मैं इसे चोट नहीं पहुँचाऊँगा।
आज्ञा न मानने वाले शिष्य को शुक्राचार्य ने शाप दिया: तू अपने को पंडित मानता है और मेरी बात टालता है; जल्दी ही तेरी लक्ष्मी छिन जाएगी। शाप पाकर भी बलि सत्य से नहीं डिगे। उनकी पत्नी विन्ध्यावली सोने के कलश में जल लाईं, बलि ने वामन के पैर धोए, और जल छोड़कर भूमि दान कर दी।
तीसरा पग: बलि का सिर
मूल ग्रंथ मेंउसी क्षण वामन का रूप बढ़ने लगा, और बलि ने उस विराट शरीर में धरती, आकाश, दिशाएँ, समुद्र, देवता, ऋषि, सारा संसार देखा। भगवान ने एक पग से धरती नापी, शरीर से आकाश, भुजाओं से दिशाएँ, और दूसरे पग से स्वर्ग; तीसरे पग के लिए बलि का कुछ भी नहीं बचा।
भगवान की इच्छा जानकर गरुड़ ने बलि को वरुण के पाश में बाँध दिया। वामन बोले: तुमने तीन पग दिए थे, दो में सब नप गया; तीसरा कहाँ है? वचन पूरा न करने वाले को नरक जाना पड़ता है।
बंधे हुए, सब कुछ छिन जाने पर भी बलि का मन नहीं डोला। उन्होंने शांत स्वर में कहा: अगर आप मेरे वचन को झूठा मानते हैं, तो मैं उसे सच कर देता हूँ, धोखा नहीं होने दूँगा; तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए। मुझे नरक, बंधन या पद छिनने का उतना डर नहीं, जितना बदनामी का।
प्रह्लाद का आगमन और सुतल
मूल ग्रंथ मेंतभी पितामह प्रह्लाद वहाँ आए। बंधे हुए बलि पहले की तरह उनकी पूजा न कर सके; आँसू भरी आँखों से, लज्जा से सिर झुकाकर केवल प्रणाम किया। प्रह्लाद ने भगवान को प्रणाम किया और कहा: आपने ही इसे इन्द्र का पद दिया था, और आपने ही आज ले लिया; यह भी उतना ही अच्छा है। मैं इसे बड़ी कृपा मानता हूँ कि इसे मोह में डालने वाली लक्ष्मी से छुड़ा दिया।
बलि की पत्नी विन्ध्यावली और ब्रह्मा ने भी प्रार्थना की कि जिसने सब कुछ दे दिया, उसे बंधन में रखना उचित नहीं। तब भगवान बोले: ब्रह्मन्, जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लेता हूँ, क्योंकि धन के मद में मनुष्य अकड़कर संसार और मेरा भी अपमान करने लगता है।
भगवान ने कहा: इसने मेरी माया को जीत लिया; धन गया, पद गया, बाँधा गया, अपनों ने छोड़ दिया, गुरु ने शाप दिया, फिर भी सत्य नहीं छोड़ा। यह अगले सावर्णि मन्वंतर में इन्द्र बनेगा; तब तक विश्वकर्मा के बनाए सुतल लोक में रहे, जहाँ न रोग हैं, न थकान, न पराजय। मैं वहाँ सब ओर से तुम्हारी रक्षा करूँगा, और तुम मुझे सदा अपने पास देखोगे।
बलि ने आँसुओं के साथ गद्गद वाणी में कहा: लोकपाल भी जो कृपा कभी न पा सके, वह आपने मुझ नीच असुर पर की। फिर वे पाश से छूटकर, असुरों के साथ प्रसन्न मन से सुतल चले गए। प्रह्लाद ने कहा: ऐसी कृपा ब्रह्मा, लक्ष्मी और शिव को भी नहीं मिली, कि आप हम असुरों के दुर्ग-पाल, यानी क़िले के रखवाले बन गए।
ग्रंथों में अंतर
"भगवान बलि के द्वारपाल बने" वाली प्रसिद्ध बात भागवत के श्लोक में ठीक इन शब्दों में नहीं है। श्लोक में भगवान कहते हैं कि मैं सदा तुम्हारे पास रहूँगा और रक्षा करूँगा, और प्रह्लाद उन्हें असुरों का "दुर्गपाल" कहते हैं। 1916 के कृष्णाचार्य संस्करण ने बाईसवें अध्याय के सार में इसे "हरि का बलि का द्वारपाल बनना" लिखा है।
भक्ति और शरणागति की सीख
जिस पर कृपा, उसका धन
बलि की कथा भागवत की सबसे चौंकाने वाली सीख देती है: भगवान जिस पर कृपा करते हैं, उसका धन छीन लेते हैं। कारण भी वे ख़ुद बताते हैं: जन्म, कर्म, उम्र, रूप, विद्या, ऐश्वर्य और धन का घमंड मनुष्य को अकड़ा देता है; जो इनके बीच भी न अकड़े, उस पर मेरी कृपा है।
वचन की सच्चाई
बलि के लिए दिया हुआ वचन सबसे बड़ा धर्म था। गुरु के शाप से, सब कुछ खो जाने से, बंधन से भी उन्होंने वचन को झूठा नहीं होने दिया; और भगवान ने उसी सच्चाई को उनकी सबसे बड़ी विजय कहा।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
तीसरा पग, मेरे सिर पर
यद्युत्तमश्लोक भवान्ममेरितं
वचो व्यलीकं सुरवर्य मन्यते।
करोम्यृतं तन्न भवेत्प्रलम्भनं
पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्णि मे निजम्॥हे उत्तमश्लोक, हे देवश्रेष्ठ, अगर आप मेरी कही बात को झूठा मानते हैं, तो मैं उसे सच कर देता हूँ, धोखा नहीं होने दूँगा: अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए।
भगवान का वचन
ब्रह्मन्यमनुगृह्णामि तद्विशो विधुनोम्यहम्।
यन्मदः पुरुषः स्तब्धो लोकं मां चावमन्यते॥ब्रह्मन्, जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लेता हूँ; क्योंकि धन के मद में अकड़ा हुआ मनुष्य संसार का और मेरा भी अपमान करने लगता है।
परंपरा में स्थान
यमराज भागवत में जिन बारह लोगों को भगवान के गूढ़ धर्म का जानकार कहते हैं, उनमें बलि भी हैं, और उनके पितामह प्रह्लाद भी।
संबंधित भक्त
- भक्त प्रह्लाद — पितामह
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देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 6.3, 6.18, 8.15–8.23
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 8, पृ. 39–41 (scan leaf n44–n46)
