ध्रुव

सौतेली माँ के कड़वे बोल से निकला पाँच बरस का बालक, जिसे भगवान ने अटल ध्रुव-पद दिया

संक्षेप में

ध्रुव राजा उत्तानपाद और रानी सुनीति के पुत्र थे। सौतेली माँ सुरुचि ने उन्हें पिता की गोद से झिड़क दिया, तो पाँच बरस का यह बालक वन चला गया और कठोर तप से भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। भगवान ने उन्हें वह अटल पद दिया, जिसके चारों ओर ग्रह और तारे घूमते हैं।

भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

ध्रुव — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 4.8.8–9; विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Book I, ch. XI, p. 159
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवत, विष्णु पुराणश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 4.8–4.12; विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Book I, ch. XI–XII, pp. 158–175

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत, चौथा स्कंध

भागवत में ध्रुव की कथा मैत्रेय ऋषि विदुर को सुनाते हैं, स्वायम्भुव मनु के वंश का वर्णन करते हुए। कथा आठवें से बारहवें अध्याय तक चलती है: अपमान, तप, दर्शन, राज्य, यक्षों से युद्ध और अंत में ध्रुव-लोक।

विष्णु पुराण, पहला अंश

विष्णु पुराण में पराशर मुनि यह कथा मैत्रेय को सुनाते हैं, ग्यारहवें और बारहवें अध्याय में। मोटी कथा वही है, पर कई बातें अलग हैं: ध्रुव को उपदेश नारद नहीं, सात ऋषि देते हैं; मंत्र अलग है; और वर पाकर ध्रुव पछताते नहीं।

पृष्ठभूमि

वंश

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा के दो पुत्र थे: प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं, सुनीति और सुरुचि। राजा सुरुचि को अधिक चाहते थे; सुरुचि के बेटे उत्तम थे, और सुनीति के बेटे ध्रुव।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

ध्रुव का तप भक्ति से नहीं, एक घाव से शुरू हुआ था। नारद ने लौट जाने को कहा, तो उन्होंने साफ़ माना कि सुरुचि के बोल अब भी उनके दिल में चुभे हैं, और उन्हें तीनों लोकों का वह सबसे ऊँचा पद चाहिए जो उनके पुरखों को भी न मिला।

पर भगवान के दर्शन ने उन्हें बदल दिया। वर पाकर वे पछताए कि मैंने संसार के बंधन काटने वाले से संसार ही माँग लिया; और बरसों बाद, जब कुबेर ने उनसे मुँहमाँगा वर माँगने को कहा, तो ध्रुव ने केवल इतना माँगा कि हरि की याद कभी न डिगे।

प्रमुख कथाएँ

पिता की गोद और सौतेली माँ के बोल

मूल ग्रंथ में

एक दिन राजा उत्तानपाद सुरुचि के बेटे उत्तम को गोद में बिठाकर लाड़ कर रहे थे। ध्रुव भी गोद में चढ़ना चाहते थे, पर राजा ने उन्हें नहीं बुलाया। तब राजा के सामने ही सुरुचि घमंड से बोली: तुम राजा के बेटे हो, पर मेरी कोख से नहीं जन्मे, इसलिए इस आसन के अधिकारी नहीं। अगर राजगद्दी चाहिए, तो तप करके भगवान को प्रसन्न करो और मेरी कोख से जन्म लो।

ये बोल ध्रुव को ऐसे लगे जैसे डंडे की चोट खाए साँप को। वे क्रोध से फुफकारते, रोते हुए माँ के पास चले गए; पिता चुपचाप देखते रहे।

ग्रंथों में अंतर

विष्णु पुराण में भी सुरुचि यही कहती है कि तुम दूसरी माँ से जन्मे हो, यह आसन केवल मेरे बेटे उत्तम का है; पर वहाँ "तप करके मेरी कोख से जन्म लो" वाली बात नहीं है।

Wilson बताते हैं कि मत्स्य, ब्रह्म और वायु पुराण में उत्तानपाद की एक ही पत्नी है, सूनृता, जिसके चार पुत्रों में ध्रुव एक हैं; दो रानियों वाली कथा भागवत, पद्म और नारदीय पुराण में है।

माँ सुनीति की सीख

मूल ग्रंथ में

सुनीति ने रोते बेटे को गोद में लिया, और सौतन की बात सुनकर ख़ुद भी रो पड़ीं। फिर बोलीं: बेटा, किसी दूसरे का बुरा मत सोचना; जो दूसरों को दुख देता है, वह ख़ुद वही भोगता है। अगर उत्तम जैसा आसन चाहिए, तो ईर्ष्या छोड़कर भगवान के चरणों की आराधना करो। उन्हीं की सेवा से ब्रह्मा को अपना पद मिला, और तुम्हारे दादा मनु को भी।

उन्होंने कहा कि तुम्हारा दुख मिटाने वाला मैं कमल-नयन भगवान के सिवा किसी को नहीं देखती, जिन्हें स्वयं लक्ष्मी भी खोजती हैं। माँ की यह बात सुनकर ध्रुव ने मन को साधा और पिता का नगर छोड़ दिया।

ग्रंथों में अंतर

विष्णु पुराण में सुनीति की सीख अलग है। वहाँ वे कहती हैं कि राजा का सुरुचि को चाहना उसके पिछले पुण्य का फल है; समझदार अपनी स्थिति में संतोष रखता है; और अगर सुरुचि की बात चुभती है, तो पुण्य बढ़ाओ, सबसे मैत्री और भलाई रखो।

नारद की परीक्षा और मंत्र

मूल ग्रंथ में

रास्ते में देवर्षि नारद मिले। उन्होंने ध्रुव के सिर पर हाथ रखा और परखा: तुम अभी खेलने की उम्र के बालक हो, मान-अपमान क्या समझोगे? जिस भगवान को मुनि अनेक जन्मों में भी नहीं पा सकते, उन्हें तप से पाना कठिन है; अभी लौट जाओ। पर ध्रुव नहीं डिगे।

तब नारद प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि माँ ने जो राह बताई, वही कल्याण की राह है: वासुदेव का भजन करो। यमुना के किनारे पवित्र मधुवन जाओ, जहाँ हरि सदा रहते हैं; वहाँ भगवान के सुंदर रूप का ध्यान करो, और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र से तुलसी, जल, फूल और वन के फल-मूल से उनकी पूजा करो।

ग्रंथों में अंतर

विष्णु पुराण में ध्रुव को वन में सात मुनि मिलते हैं, जो मृगछाला पर बैठे हैं। वे भी कहते हैं कि चार-पाँच बरस के राजकुमार को किस बात का दुख? ध्रुव के आग्रह पर वे ध्यान की विधि और एक अलग मंत्र बताते हैं: "ॐ, हिरण्यगर्भ, आत्मा और प्रधान रूप वासुदेव को नमस्कार", जिसे वे मनु का जपा हुआ बताते हैं।

मधुवन में तप

मूल ग्रंथ में

मधुवन में ध्रुव ने महीने-दर-महीने तप कठोर किया। पहले महीने हर तीसरे दिन कैथ और बेर खाए; दूसरे महीने हर छठे दिन सूखी घास और पत्ते; तीसरे महीने हर नौवें दिन केवल जल; चौथे महीने हर बारहवें दिन केवल हवा; और पाँचवें महीने साँस रोककर एक पैर पर खंभे की तरह खड़े रहे।

जब वे एक पैर पर खड़े हुए, तो उनके अँगूठे के दबाव से धरती ऐसे झुक गई जैसे हाथी के चढ़ने से नाव। उन्होंने अपनी साँस रोकी, तो सारे लोकों की साँस रुकने लगी। घबराए देवता भगवान की शरण गए, और भगवान ने कहा: डरो मत, मैं बालक को तप से लौटाऊँगा।

ग्रंथों में अंतर

विष्णु पुराण में तप तोड़ने के लिए इन्द्र के साथी माया रचते हैं। पहले माँ सुनीति का रूप आकर रोती है: मेरे बेटे, पाँच बरस के बालक को ऐसे तप से क्या काम? फिर हथियार उठाए राक्षस और आग उगलते सियार आते हैं। पर ध्रुव का मन गोविंद में ऐसा लगा था कि उन्होंने कुछ देखा ही नहीं।

शंख का स्पर्श

मूल ग्रंथ में

भगवान गरुड़ पर मधुवन आए। ध्रुव ने अपने हृदय में बिजली जैसा चमकता रूप देखा था; वह अचानक भीतर से हटा, तो आँख खोलकर उन्होंने वही रूप सामने खड़ा पाया। वे धरती पर दंडवत गिर पड़े, और ऐसे निहारने लगे मानो आँखों से भगवान को पी रहे हों।

ध्रुव स्तुति करना चाहते थे, पर नहीं जानते थे कैसे। सबके हृदय में बसे हरि यह जान गए, और उन्होंने हाथ जोड़े खड़े बालक के गाल को कृपा से अपने वेदमय शंख से छू दिया। उसी क्षण ध्रुव के मुँह से दिव्य वाणी फूट पड़ी, और वे भक्ति-भाव से स्तुति करने लगे।

ग्रंथों में अंतर

इस प्रसंग में दोनों ग्रंथ एक हैं। विष्णु पुराण में भी ध्रुव कहते हैं कि मैं बालक आपकी स्तुति कैसे करूँ, और भगवान अपने शंख की नोक से उन्हें छूते हैं, जिससे वे प्रसन्न होकर स्तुति करने लगते हैं।

ध्रुव-पद का वर, और पछतावा

मूल ग्रंथ में

भगवान ने कहा: मैं तुम्हारे मन की बात जानता हूँ। तुम्हें वह चमकता ध्रुव-स्थान मिलेगा जो किसी और को नहीं मिला, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारे ऐसे घूमते हैं जैसे खूँटे के चारों ओर बैल। पिता के वन जाने पर तुम छत्तीस हज़ार बरस राज करोगे, और अंत में मेरे धाम आओगे। भगवान ने यह भी बताया कि उत्तम शिकार में मारे जाएँगे, और उन्हें खोजती उनकी माँ वन की आग में चली जाएँगी।

वर पाकर ध्रुव बहुत प्रसन्न होकर नहीं लौटे। उन्होंने सोचा: जिन चरणों की छाया सनंदन जैसे मुनि अनेक जन्मों की समाधि से पाते हैं, वह मुझे छह महीनों में मिल गई, और मैंने उनसे नश्वर राज्य माँग लिया। मेरी हालत उस कंगाल जैसी है, जिसे सम्राट सब कुछ देने को तैयार था और उसने धान की भूसी माँगी।

ग्रंथों में अंतर

विष्णु पुराण में ध्रुव पछताते नहीं। वहाँ भगवान बताते हैं कि पिछले जन्म में तुम एक ब्राह्मण थे; एक राजकुमार से मित्रता हुई, उसका वैभव देखकर तुम्हारे मन में राजकुमार बनकर जन्म लेने की इच्छा जागी। फिर वर देते हैं: सूर्य, चंद्र, ग्रहों और सप्तर्षियों से भी ऊपर का स्थान, एक कल्प तक; और माँ सुनीति भी पास ही एक चमकते तारे के रूप में रहेंगी।

घर वापसी

मूल ग्रंथ में

ध्रुव लौटे, तो राजा रथ से उतरकर दौड़े और बेटे को बाँहों में भर लिया, बार-बार उसका माथा सूँघा और आँसुओं से नहला दिया। सुरुचि ने भी पैरों पड़े बालक को उठाकर गले लगाया और गद्गद स्वर में कहा: जीते रहो। उत्तम और ध्रुव प्रेम से एक-दूसरे से लिपटकर रो पड़े।

भागवत यहाँ एक बात कहता है: जिस पर भगवान प्रसन्न हों, उसके आगे सब प्राणी अपने-आप झुक जाते हैं, जैसे पानी नीचे की ओर बहता है। बड़े होने पर प्रजा के प्रिय ध्रुव को राजा ने राज्य सौंपा, और ख़ुद वन चले गए।

यक्षों से युद्ध और मनु की सीख

मूल ग्रंथ में

जैसा भगवान ने कहा था, उत्तम शिकार में एक पहाड़ पर यक्ष के हाथों मारे गए, और उनकी माँ भी उसी गति को गईं। भाई की मृत्यु से क्रोधित ध्रुव ने हिमालय की घाटी में बसी यक्षों की नगरी पर चढ़ाई की और नारायण-अस्त्र से असंख्य यक्षों को मार डाला।

तब उनके दादा स्वायम्भुव मनु ऋषियों के साथ आए और बोले: बस करो, बेटा। एक के अपराध में बहुत से निर्दोषों को मारना हमारे कुल की रीति नहीं, न भगवान के भक्तों की राह। तुमने गिरीश (शिव) के भाई कुबेर का अपमान किया है; जाकर उन्हें विनय से प्रसन्न करो। ध्रुव मान गए।

कुबेर ने प्रसन्न होकर कहा: न तुमने यक्षों को मारा, न यक्षों ने तुम्हारे भाई को; जीने-मरने का स्वामी काल है। फिर उन्होंने मुँहमाँगा वर देना चाहा, और ध्रुव ने केवल इतना माँगा कि हरि की याद कभी न डिगे।

ध्रुव-लोक

मूल ग्रंथ में

ध्रुव ने छत्तीस हज़ार बरस धर्म से राज किया, और प्रजा उन्हें पिता मानती थी। अंत में भगवान के दो पार्षद, सुनंद और नंद, विमान लेकर आए: तुमने पाँच बरस की उम्र में तप से भगवान को प्रसन्न किया था, अब उस विष्णु-पद पर चलो।

जब मृत्यु सामने आई, तो ध्रुव उसके सिर पर पैर रखकर विमान पर चढ़ गए। चलते-चलते उन्हें माँ सुनीति की याद आई: उन्हें छोड़कर मैं अकेला स्वर्ग कैसे जाऊँ? पार्षदों ने दिखाया कि माँ आगे-आगे दूसरे विमान में जा रही हैं।

भक्ति और शरणागति की सीख

नारद की तीन बातें

ध्रुव को समझाते हुए नारद एक सीख देते हैं, जो बालक के लिए ही नहीं, सबके लिए है: जो गुणों में बड़ा हो, उसे देखकर प्रसन्न हो; जो कम हो, उस पर करुणा करो; और जो बराबर हो, उससे मित्रता रखो। ऐसा मनुष्य दुखों से नहीं हारता।

भगवान से क्या माँगें

ध्रुव का पछतावा भागवत की एक बड़ी सीख है। उन्होंने तप राज्य के लिए किया और राज्य मिला भी, पर दर्शन के बाद उन्हें लगा कि जो सब कुछ दे सकता था, उससे मैंने भूसी माँग ली। बाद में कुबेर के सामने उन्होंने वही माँगा जो सचमुच माँगने लायक था: हरि की अटल याद।

क्रोध पर लगाम

यक्षों के संहार के बाद मनु ध्रुव से कहते हैं: क्रोध कल्याण का सबसे बड़ा शत्रु है, इसे ऐसे शांत करो जैसे दवा रोग को। जिस क्रोधी से लोग डरते हैं, समझदार उसके वश में नहीं जाता।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

नारद का दिया मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भगवान वासुदेव को नमस्कार। नारद ने ध्रुव को इसी मंत्र से भगवान की पूजा करने को कहा, यह कहकर कि जप परम गोपनीय है।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 4, अध्याय 8, श्लोक 53–54

शंख का स्पर्श

स तं विवक्षन्तमतद्विदं हरि- र्ज्ञात्वास्य सर्वस्य च हृद्यवस्थितः। कृताञ्जलिं ब्रह्ममयेन कम्बुना पस्पर्श बालं कृपया कपोले॥

सबके हृदय में बसे हरि जान गए कि बालक स्तुति करना चाहता है, पर जानता नहीं कैसे। उन्होंने हाथ जोड़े खड़े बालक के गाल को कृपा से अपने वेदमय शंख से छू दिया।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 4, अध्याय 9, श्लोक 4

भूसी माँगने वाला कंगाल

स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितो बत। ईश्वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधनः॥

हाय, जो मुझे अपना परम पद देने को तैयार थे, उनसे मैंने मूर्खता में बस मान-सम्मान माँग लिया, जैसे पुण्य से हीन कोई कंगाल सम्राट से धान की भूसी माँग ले।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 4, अध्याय 9, श्लोक 35

परंपरा में स्थान

भागवत कहता है कि भगवान-परायण ध्रुव तीनों लोकों के मुकुट-मणि बन गए, और ज्योतिषों का पूरा चक्र उनके चारों ओर ऐसे घूमता है जैसे खूँटे के चारों ओर बैल। नारद ने प्रचेताओं के यज्ञ में वीणा बजाकर उनकी महिमा गाई।

Wilson अपनी टिप्पणी में लिखते हैं कि यह स्थान उत्तरी ध्रुव या ध्रुव तारे का है। विष्णु पुराण कहता है कि जो सुबह-शाम ध्रुव का गुणगान करेंगे, उन्हें बड़ा पुण्य मिलेगा।

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देवता

भक्ति-पाठ

ऋषि

  • देवर्षि नारद — जिन्होंने ध्रुव को मधुवन भेजा और मंत्र दिया (भागवत 4.8)

स्रोत

ध्रुव — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न