कुंती

पांडवों की माँ, जिन्होंने कृष्ण से विपत्तियाँ माँगीं, ताकि उनके दर्शन होते रहें

संक्षेप में

कुंती (पृथा) शूरसेन की पुत्री, वसुदेव की बहन और पांडवों की माँ थीं, यानी श्रीकृष्ण की बुआ। महाभारत युद्ध के बाद जब कृष्ण द्वारका लौटने लगे, तो कुंती ने उनकी स्तुति करते हुए माँगा: हम पर बार-बार विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि उन्हीं में आपके दर्शन होते हैं, जिनके बाद फिर जन्म नहीं होता।

श्रीकृष्ण के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त

एक नज़र में

कुंती — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण-महाभारत के भक्तमहाभारत (समीक्षित पाठ), 1.104.1–3; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 1.8.17
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवत, महाभारतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 1.8.17–44; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.104; 5.144
संतानअर्जुनमहाभारत (समीक्षित पाठ), 5.7.19

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत और महाभारत

कुंती की कथा महाभारत में आदि से अंत तक है। उनकी प्रसिद्ध स्तुति श्रीमद्भागवत के पहले स्कंध के आठवें अध्याय में है, जो युद्ध के बाद कृष्ण के द्वारका लौटने के समय कही गई।

पृष्ठभूमि

कौन थीं

महाभारत बताता है कि यदुवंशी शूर (वसुदेव के पिता) की पुत्री पृथा को उन्होंने अपने निःसंतान मित्र और फुफेरे भाई कुंतिभोज को दे दिया था; इसीलिए वे कुंती कहलाईं। कुंतिभोज के घर उन्होंने कठोर व्रत वाले ऋषि दुर्वासा की पूरे यत्न से सेवा की, और दुर्वासा ने उन्हें एक मंत्र दिया: इससे जिस देवता को बुलाओगी, उनकी कृपा से तुम्हें पुत्र होगा।

कौतूहल में कुंवारी कुंती ने सूर्य देव को बुलाया, और उनसे कवच-कुंडल वाला पुत्र कर्ण जन्मा। युद्ध से पहले कुंती ने कर्ण से मिलकर उन्हें अपना पुत्र बताया; कर्ण ने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा, पर वचन दिया कि अर्जुन के सिवा वे कुंती के किसी पुत्र को नहीं मारेंगे, और कुंती के पाँच पुत्र बने रहेंगे।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

कुंती की भक्ति कृतज्ञता से भरी है। स्तुति में वे याद करती हैं: जैसे आपने देवकी को कंस की क़ैद से छुड़ाया, वैसे ही मुझे और मेरे बेटों को बार-बार विपत्तियों से बचाया: विष से, लाक्षागृह की आग से, राक्षसों से, दुष्टों की सभा से, वनवास के कष्टों से, युद्ध के महारथियों के अस्त्रों से, और अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से।

वे यह भी कहती हैं कि आप अकिंचन लोगों के धन हैं; जिसका कुल, ऐश्वर्य, विद्या और धन का घमंड बढ़ा हो, वह आपका नाम भी ठीक से नहीं ले पाता।

प्रमुख कथाएँ

कुंती-स्तुति

मूल ग्रंथ में

युद्ध के बाद कृष्ण द्वारका जाने को रथ पर बैठे, तो कुंती ने उनकी स्तुति की: मैं आपको प्रणाम करती हूँ, आप प्रकृति से परे आदि-पुरुष हैं, सब प्राणियों के भीतर-बाहर रहकर भी दिखाई नहीं देते, जैसे नाटक का अभिनेता अपने वेश में पहचाना नहीं जाता। जिन्हें परमहंस मुनि भी कठिनाई से जानते हैं, हम स्त्रियाँ उन्हें कैसे देखें?

फिर उन्होंने वह वर माँगा, जो इस स्तुति की पहचान है: हे जगद्गुरु, हम पर हर जगह, बार-बार विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि उनमें आपके दर्शन होते हैं, और आपके दर्शन के बाद फिर जन्म नहीं लेना पड़ता।

कुंती ने यशोदा की वह लीला भी याद की: जब तुमने दही की मटकी फोड़ी और गोपी यशोदा ने रस्सी उठाई, तो आँसुओं से काजल बहाती, डर से झुकी तुम्हारी आँखें, जिनसे स्वयं भय भी डरता है, मुझे आज भी मोह में डाल देती हैं।

अंत में उन्होंने माँगा: हे विश्वेश, पांडवों और वृष्णियों में बँधा मेरा यह दृढ़ स्नेह-पाश काट दीजिए; और जैसे गंगा का प्रवाह समुद्र की ओर बहता है, वैसे ही मेरी बुद्धि किसी और ओर न जाकर सदा आपमें प्रेम से बहती रहे। स्तुति सुनकर कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए।

भक्ति और शरणागति की सीख

विपत्ति में भगवान

कुंती-स्तुति भक्ति का एक अनोखा भाव सिखाती है: सुख में मनुष्य भगवान को भूल जाता है, इसलिए भक्त विपत्ति से भी नहीं डरता, उसे भगवान के दर्शन का अवसर मानता है। और भगवान को पाने की बाधा कुल, धन और विद्या का घमंड है; वे अकिंचनों के धन हैं।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

विपत्तियाँ आती रहें

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो। भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥

हे जगद्गुरु, हम पर हर जगह, सदा विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि उनमें आपके दर्शन होते हैं, जिनके बाद फिर संसार का दर्शन (जन्म) नहीं होता।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 1, अध्याय 8, श्लोक 25 (कृष्णाचार्य संस्करण का पाठ; GRETIL में "विपदः सन्तु ताः")

गंगा जैसी अनन्य प्रीति

त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत्। रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति॥

हे मधुपति, जैसे गंगा अपना प्रवाह लगातार समुद्र की ओर ले जाती है, वैसे ही मेरी बुद्धि किसी और ओर न जाकर बार-बार आप में ही प्रेम से बहती रहे।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 1, अध्याय 8, श्लोक 42

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देवता

ऋषि

  • महर्षि दुर्वासा — जिन्होंने कुंती को देवताओं को बुलाने का मंत्र दिया (महाभारत 1.104.5–7)

स्रोत

कुंती — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न