अक्रूर

कंस का भेजा दूत, जो गोकुल की धूल में कृष्ण के पदचिह्न देखकर रथ से कूद पड़ा

संक्षेप में

अक्रूर श्वफल्क के पुत्र, यदुवंशी और श्रीकृष्ण के संबंधी थे। कंस ने उन्हें कृष्ण-बलराम को मथुरा लाने भेजा, पर पूरे रास्ते वे कृष्ण के दर्शन की लालसा में डूबे रहे, और गोकुल की धूल में उनके पदचिह्न देखकर रथ से कूदकर उसमें लोटने लगे। लौटते समय यमुना के जल में उन्हें भगवान के दिव्य रूप के दर्शन हुए।

श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

अक्रूर — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.38.2, 24
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.36, 10.38–10.40, 10.57

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कंध

अक्रूर की कथा श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में कई जगह है: कंस का आदेश (अध्याय 36), गोकुल की यात्रा (38), यमुना में दर्शन (39), उनकी स्तुति (40), और बाद में द्वारका में स्यमंतक मणि का प्रसंग (57)।

पृष्ठभूमि

कौन थे

अक्रूर श्वफल्क के पुत्र थे। भागवत बताता है कि काशी में सूखा पड़ा था, तब काशी के राजा ने अपनी बेटी गान्दिनी श्वफल्क को ब्याह दी, और वहाँ वर्षा हुई; बड़े-बूढ़े कहते थे कि उनका पुत्र अक्रूर भी ऐसा ही प्रभावी है, कि जहाँ वह रहता है, वहाँ वर्षा होती है और कोई महामारी नहीं आती।

कंस उन्हें "दानपति" कहकर पुकारता है, और उनसे कहता है कि भोज और वृष्णि वंश में तुमसे बढ़कर मेरा हितैषी कोई नहीं; नंद के व्रज जाओ और वसुदेव के दोनों पुत्रों को रथ पर ले आओ, क्योंकि देवताओं ने मेरी मृत्यु उन्हीं के हाथ तय की है।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

अक्रूर कंस के दूत बनकर निकले, पर मन से वे कृष्ण के भक्त थे। रास्ते भर वे यही सोचते रहे कि कंस ने मुझ पर बड़ी कृपा की जो मुझे भेजा; आज मैं उन चरणों को देखूँगा जिनका ध्यान योगी करते हैं। उन्हें यह भरोसा भी था कि कंस का दूत होकर भी सबके हृदय की जानने वाले कृष्ण मुझे शत्रु नहीं समझेंगे।

प्रमुख कथाएँ

रास्ते की लालसा

मूल ग्रंथ में

मथुरा में रात बिताकर अक्रूर सुबह रथ पर गोकुल चले, और रास्ते भर कमल-नयन भगवान की भक्ति में डूबकर सोचते रहे: मैंने कौन-सा पुण्य किया, कौन-सा तप, किसे दान दिया, कि आज केशव को देखूँगा? मेरे जैसे विषयी के लिए यह दर्शन वैसा ही दुर्लभ है, पर काल की नदी में बहता कोई-कोई पार भी लग जाता है।

वे कल्पना करते रहे: मुकुंद का मुख, सुंदर गाल और नासिका, घुँघराले बाल, मुस्कान भरी आँखें; मैं रथ से उतरकर उनके चरणों में गिरूँगा; क्या वे मेरे सिर पर अपना कमल जैसा हाथ रखेंगे? क्या मुझे अपनी बड़ी बाँहों में भरकर "अक्रूर, तात" कहेंगे?

गोकुल की धूल

मूल ग्रंथ में

सूरज डूबते-डूबते अक्रूर गोकुल पहुँचे। वहाँ गोठ की धूल में उन्होंने कमल, जौ और अंकुश के चिह्नों वाले पदचिह्न देखे, जिनकी धूल लोकपाल अपने मुकुट पर रखते हैं। आनंद से उनके रोंगटे खड़े हो गए, आँखें भर आईं, और वे रथ से कूदकर उस धूल में लोटने लगे: अहो, ये प्रभु के चरणों की रज है!

भागवत यहीं कहता है: देहधारियों के जीवन का यही फल है कि दंभ, डर और शोक छोड़कर भगवान से जुड़ी हर चीज़ को देखकर, सुनकर ऐसा ही भाव जागे।

फिर उन्होंने गायें दुहने गए कृष्ण और बलराम को देखा, और रथ से कूदकर उनके पैरों के पास दंडवत गिर पड़े; आँसुओं से गला ऐसा भर आया कि अपना परिचय तक न दे सके। कृष्ण ने उन्हें खींचकर अपने चक्र-चिह्नित हाथ से गले लगा लिया, और बलराम उनका हाथ पकड़कर घर ले गए।

यमुना के जल में दर्शन

मूल ग्रंथ में

अगले दिन कृष्ण-बलराम को रथ पर लेकर अक्रूर मथुरा चले। रास्ते में यमुना के एक कुंड पर उन्होंने स्नान किया, और पानी में डुबकी लगाकर मंत्र जपते हुए उन्हें वहीं राम और कृष्ण दिखाई दिए। चकित होकर बाहर देखा, तो दोनों रथ पर वैसे ही बैठे थे।

फिर डुबकी लगाई, तो उन्होंने हज़ार फणों वाले शेषनाग को देखा, और उनकी गोद में चार भुजाओं वाले, पीताम्बरधारी, शंख-चक्र-गदा-पद्म लिए भगवान को, जिनकी स्तुति सनकादि, ब्रह्मा, रुद्र, प्रह्लाद, नारद जैसे भक्त कर रहे थे। अक्रूर रोमांचित होकर, हाथ जोड़कर, गद्गद वाणी में स्तुति करने लगे।

स्यमंतक मणि

मूल ग्रंथ में

बाद में द्वारका में एक प्रसंग आता है, जिसमें अक्रूर की कमज़ोरी दिखती है। जब कृष्ण हस्तिनापुर गए थे, अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को उकसाया: सत्राजित ने हमें अपनी बेटी देने का वचन देकर, हमारा अपमान करके उसे कृष्ण को ब्याह दिया; तुम उससे मणि क्यों नहीं छीन लेते? शतधन्वा ने सोते हुए सत्राजित को मार डाला और मणि ले गया।

जब कृष्ण शतधन्वा के पीछे पड़े, तो उसने अक्रूर से मदद माँगी। अक्रूर ने मना कर दिया: भगवान से कौन समझदार लड़ेगा, जिसने सात बरस की उम्र में खेल-खेल में पर्वत उठा लिया था? पर शतधन्वा मणि उन्हीं के पास छोड़ गया, और उसके मारे जाने की ख़बर सुनकर अक्रूर डर के मारे द्वारका छोड़ गए।

कृष्ण ने उन्हें बुलवाया, सम्मान से बिठाया, प्रिय बातें कीं, और मुस्कराते हुए कहा: दानपति, मुझे पता है मणि तुम्हारे पास है; उसे रखो, पर एक बार सबको दिखा दो ताकि मेरे भाई का संदेह मिटे। अक्रूर ने कपड़े में छिपी मणि निकालकर दे दी; कृष्ण ने उसे सबको दिखाया, और फिर अक्रूर को ही लौटा दी।

भक्ति और शरणागति की सीख

भगवान से जुड़ी हर चीज़ पवित्र

अक्रूर को कृष्ण से पहले उनके पदचिह्न मिले, और वे उसी धूल में लोट गए। भागवत इसे जीवन का फल कहता है: भगवान का संदेश, उनके चिह्न, उनकी कथा, जहाँ भी मिले, वहाँ बिना दंभ, डर और शोक के ऐसा ही प्रेम जागे।

कमज़ोरी के साथ भी अपनापन

स्यमंतक के प्रसंग में अक्रूर ग़लती करते हैं और डरकर भाग भी जाते हैं, पर कृष्ण उन्हें सज़ा नहीं देते: बुलाकर सम्मान देते हैं, सच निकलवाते हैं, और मणि उन्हीं को लौटा देते हैं। भक्त भी चूकता है, और भगवान उसे फिर भी अपना मानते हैं।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

रास्ते में अक्रूर

किं मया चरितं भद्रं किं तप्तं परमं तपः। किं वाथाप्यर्हते दत्तं यद्द्रक्ष्याम्यद्य केशवम्॥

मैंने कौन-सा पुण्य किया है, कौन-सा बड़ा तप किया है, या किस योग्य व्यक्ति को दान दिया है, कि आज मैं केशव को देखूँगा?

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 38, श्लोक 3

कंस की "कृपा"

कंसो बताद्याकृत मेऽत्यनुग्रहं द्रक्ष्येऽङ्घ्रिपद्मं प्रहितोऽमुना हरेः। कृतावतारस्य दुरत्ययं तमः पूर्वेऽतरन्यन्नखमण्डलत्विषा॥

आह, आज कंस ने मुझ पर बड़ी कृपा की है; उसी के भेजने से मैं हरि के चरण-कमल देखूँगा, जिनके नखों की चमक से पहले के लोग अज्ञान के दुस्तर अंधकार को पार कर गए।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 38, श्लोक 7

परंपरा में स्थान

स्यमंतक की कथा के अंत में भागवत कहता है कि भगवान विष्णु की यह पाप हरने वाली, मंगलमय कथा जो पढ़ता, सुनता या याद करता है, उसकी बदनामी और पाप मिट जाते हैं।

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देवता

स्रोत

अक्रूर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न