जाम्बवान
रीछों के बूढ़े राजा, जिन्होंने हनुमान को उनका बल याद दिलाया, और युगों बाद कृष्ण में अपने राम को पहचाना
संक्षेप में
जाम्बवान रीछों के राजा और राम की सेना के सबसे वृद्ध सलाहकार थे। समुद्र के किनारे जब सब वानर निराश थे, तो उन्होंने हनुमान को उनका जन्म और बल याद दिलाकर समुद्र लाँघने को प्रेरित किया। श्रीमद्भागवत में वही जाम्बवान स्यमंतक मणि के लिए कृष्ण से लड़कर अंत में उनमें अपने स्वामी राम को पहचानते हैं।
श्रीराम के भक्तश्रीकृष्ण के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 4.65.1; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.56.19, 21; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10 उत्तरार्ध, पृ. 27 (scan leaf n224) |
| कथा किस ग्रंथ में | वाल्मीकि रामायण, श्रीमद्भागवत | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 4.65–4.66; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.56.14–33 |
कथा किन ग्रंथों में है
वाल्मीकि रामायण और श्रीमद्भागवत
जाम्बवान वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड के अंत में हनुमान को प्रेरित करते हैं, और श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध (अध्याय 56) में स्यमंतक मणि की कथा में कृष्ण से मिलते हैं। भागवत में जाम्बवान ख़ुद राम के समय का सेतु और लंका का जलना याद करते हैं, यानी दोनों ग्रंथ उन्हें एक ही व्यक्ति मानते हैं।
पृष्ठभूमि
बूढ़ा सलाहकार
हनुमान को प्रेरित करते हुए जाम्बवान ने अपने बारे में कहा: जब भगवान ने त्रिविक्रम रूप में तीन पग भरे, तब मैंने पर्वतों और वनों सहित धरती की इक्कीस बार परिक्रमा की थी; देवताओं के कहने पर अमृत के लिए औषधियाँ भी जुटाई थीं। अब मैं बूढ़ा हूँ, मेरा पराक्रम घट गया है; अब सब गुणों से भरे तुम्हारा समय है।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
श्रीमद्भागवत में अट्ठाईस दिन कृष्ण से लड़ने के बाद, थके और पसीने से भीगे जाम्बवान ने चकित होकर कहा: अब मैं जान गया, आप सब प्राणियों के प्राण, बल और ओज, पुराण-पुरुष भगवान विष्णु हैं। आप वही हैं, जिनकी ज़रा-सी क्रोध भरी चितवन से समुद्र ने रास्ता दे दिया, जिन्होंने अपने यश का सेतु बनाया, लंका जलाई, और जिनके बाणों से राक्षसों के सिर धरती पर गिरे।
प्रमुख कथाएँ
हनुमान को बल याद दिलाना
मूल ग्रंथ मेंसीता की खोज में दक्षिणी समुद्र के तट पर पहुँचकर सारी वानर-सेना निराश बैठी थी। तब जाम्बवान ने चुपचाप एक ओर बैठे हनुमान से कहा: हे वीर, तुम सब शास्त्र जानने वालों में श्रेष्ठ हो, चुप क्यों हो? तुम्हारी भुजाओं में गरुड़ के पंखों जितना बल है; बल, बुद्धि, तेज और साहस में तुम सब प्राणियों से बढ़कर हो, फिर अपने आप को क्यों नहीं पहचानते?
फिर उन्होंने हनुमान को उनका जन्म याद दिलाया: अप्सरा पुंजिकस्थला, जो शाप से वानरी अंजना बनी, वायु देव की कृपा से उसके तुम पुत्र हुए; बचपन में सूरज को फल समझकर उसकी ओर उछले, इन्द्र के वज्र से तुम्हारी ठोड़ी (हनु) टूटी, इसलिए नाम हनुमान पड़ा; और ब्रह्मा और इन्द्र ने तुम्हें वर दिए। उठो, समुद्र लाँघो; सारी वानर-सेना तुम्हारा पराक्रम देखना चाहती है।
जाम्बवान के प्रोत्साहन से हनुमान का शरीर बढ़ने लगा, उनका रूप तेज से भर उठा, और उन्होंने बड़े वानरों को प्रणाम करके कहा: मैं वैदेही को देखूँगा, वानरो, आनंद मनाओ।
कृष्ण में राम को पहचानना
मूल ग्रंथ मेंद्वापर में प्रसेन से स्यमंतक मणि छीनकर भागे सिंह को रीछ-राज जाम्बवान ने मारा, और मणि अपनी गुफा में बच्चे के खिलौने की तरह रख दी। मणि चुराने के कलंक को धोने कृष्ण उस अँधेरी गुफा में अकेले गए। जाम्बवान ने उन्हें साधारण मनुष्य समझकर, अपने ही स्वामी से अनजाने में युद्ध किया; और वह युद्ध अट्ठाईस दिन, दिन-रात चलता रहा।
अंत में थककर जाम्बवान ने कृष्ण को पहचाना और उनकी स्तुति की। कृष्ण ने अपने कल्याणकारी हाथ से उस भक्त को छुआ और कहा: हे ऋक्षराज, मैं इस मणि के लिए आया हूँ, ताकि अपने ऊपर लगा झूठा कलंक मिटा सकूँ। जाम्बवान ने प्रसन्न होकर अपनी बेटी जाम्बवती और वह मणि भेंट में कृष्ण को दे दी।
ग्रंथों में अंतर
कृष्णाचार्य संस्करण (1916) में यहाँ कोष्ठक में एक अतिरिक्त श्लोक है, जिसके अनुसार जाम्बवान ने और श्रेष्ठ मणियों से भी भक्तवत्सल कृष्ण की पूजा की, और कृष्ण ने उन्हें फिर कभी न लौटने वाली परम मुक्ति दी। यह श्लोक GRETIL पाठ में नहीं है।
भक्ति और शरणागति की सीख
दूसरों का बल जगाना
जाम्बवान की भक्ति सेवा का एक अलग रूप दिखाती है: बुढ़ापे में ख़ुद समुद्र लाँघने का बल न होने पर उन्होंने हनुमान को उनका बल याद दिलाया, और राम का काम आगे बढ़ा। और युगों बाद भी उनकी पहचान वही रही: जिसके साथ लड़े, उसमें अपने स्वामी को देख लिया।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
अपने को क्यों नहीं पहचानते
बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं च हरिसत्तम।
विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं न बुध्यसे॥हे वानरश्रेष्ठ, बल, बुद्धि, तेज और साहस में तुम सब प्राणियों से बढ़कर हो; फिर अपने आप को क्यों नहीं पहचानते?
भागवत: अब मैं जान गया
जाने त्वां सर्वभूतानां प्राण ओजः सहो बलम्।
विष्णुं पुराणपुरुषं प्रभविष्णुमधीश्वरम्॥मैं जान गया, आप सब प्राणियों के प्राण, ओज, साहस और बल हैं; आप ही सर्वशक्तिमान स्वामी, पुराण-पुरुष भगवान विष्णु हैं।
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देवता
- श्री राम — भगवान राम के पाठ और आरती
- श्री कृष्ण — श्रीकृष्ण के पाठ और तीर्थ
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · 4.65–4.66
- Srimad Valmiki Ramayana, According to the Southern Readings, with footnotes, vol. I (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा काण्ड) — T. R. Krishnacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1905) · किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 66–67, पृ. 409 (scan leaf n422)
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 10.56.14–33
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 10 उत्तरार्ध, पृ. 27 (scan leaf n224)
