विदुर
धृतराष्ट्र के धर्मात्मा भाई, जिनके घर का सादा अन्न कृष्ण ने राजमहल के भोजन से बढ़कर माना
संक्षेप में
विदुर धृतराष्ट्र और पांडु के छोटे भाई, हस्तिनापुर के धर्मात्मा मंत्री थे। शांति-दूत बनकर आए कृष्ण ने दुर्योधन का राजसी भोजन ठुकरा दिया और कहा कि मेरे खाने योग्य केवल विदुर का अन्न है। श्रीमद्भागवत में वही विदुर अपमानित होकर घर छोड़ते हैं, तीर्थों में भगवान को खोजते हैं, और अंत में धृतराष्ट्र को भी वैराग्य की राह दिखाते हैं।
श्रीकृष्ण के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.89.32–34; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 3.1.10 |
| कथा किस ग्रंथ में | महाभारत, श्रीमद्भागवत | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.89.10–41; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 1.13; 3.1 |
कथा किन ग्रंथों में है
महाभारत और श्रीमद्भागवत
विदुर महाभारत में पूरी कथा में धृतराष्ट्र के सलाहकार हैं; कृष्ण के उनके घर ठहरने की कथा उद्योगपर्व में है। श्रीमद्भागवत में विदुर दो जगह आते हैं: तीसरे स्कंध में, जहाँ वे घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकलते हैं और उद्धव और मैत्रेय से मिलते हैं, और पहले स्कंध में, जहाँ वे लौटकर धृतराष्ट्र को वन जाने का उपदेश देते हैं।
पृष्ठभूमि
सच कहने वाला मंत्री
भागवत बताता है कि जब धृतराष्ट्र ने पांडवों को लाक्षागृह में जलाने दिया, सभा में द्रौपदी का अपमान नहीं रोका, और वनवास के बाद भी उनका भाग नहीं लौटाया, तब विदुर ने साफ़ कहा: युधिष्ठिर को उनका भाग लौटा दो; पांडवों को भगवान मुकुंद ने अपना लिया है; और जिस दुर्योधन को तुम बेटा मानकर पाल रहे हो, वह कृष्ण का विरोधी, कुल का दोष है, उसे छोड़ दो।
यह सुनकर दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन और शकुनि ने विदुर का अपमान किया: इस दासी-पुत्र को किसने बुलाया? इसे तुरंत नगर से निकालो। विदुर ने कोई दुख नहीं माना; अपना धनुष दरवाज़े पर रखा और हस्तिनापुर छोड़कर तीर्थों की यात्रा पर निकल पड़े।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
घर छोड़कर विदुर ने धरती के तीर्थों में घूमते हुए, अवधूत के वेश में, अकेले रहकर, ज़मीन पर सोकर, केवल हरि को प्रसन्न करने वाले व्रत किए। लौटने पर युधिष्ठिर ने उनसे कहा: आप जैसे भागवत स्वयं तीर्थ हैं; अपने हृदय में बसे गदाधर के कारण आप तीर्थों को भी पवित्र कर देते हैं।
भागवत यह भी बताता है कि मैत्रेय से प्रश्न पूछकर विदुर के मन में गोविंद के प्रति एकनिष्ठ भक्ति जागी।
प्रमुख कथाएँ
विदुर का अन्न
मूल ग्रंथ मेंयुद्ध से पहले कृष्ण पांडवों के दूत बनकर हस्तिनापुर आए। दुर्योधन ने उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया, पर कृष्ण ने स्वीकार नहीं किया। दुर्योधन ने पूछा: आपके लिए लाया अन्न, पेय, वस्त्र और शय्या आपने क्यों नहीं लिए? हमारा तो आपसे कोई बैर नहीं।
कृष्ण बोले: अन्न या तो प्रेम से खाया जाता है, या संकट में; न तुम मुझसे प्रेम करते हो, न मैं संकट में हूँ। तुम बिना कारण जन्म से पांडवों से द्वेष करते हो; जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझसे करता है, जो उनके साथ है, वह मेरे साथ। यह सारा अन्न दुष्ट भाव से भरा है, खाने योग्य नहीं; मेरी समझ में केवल विदुर का अन्न खाने योग्य है। और वे दुर्योधन के महल से निकलकर महात्मा विदुर के घर गए।
भीष्म, द्रोण, कृप और दूसरे कौरव भी वहाँ आकर अपने रत्न भरे घर देने लगे, पर कृष्ण ने उन्हें आदर सहित लौटा दिया। तब विदुर ने पूरे यत्न से कृष्ण का सत्कार किया और शुद्ध, गुणकारी अन्न-पान परोसा; कृष्ण ने पहले वेद जानने वाले ब्राह्मणों को तृप्त किया, फिर अपने साथियों सहित विदुर का अन्न खाया।
ग्रंथों में अंतर
विदुर का साग: लोक में प्रसिद्ध है कि कृष्ण ने विदुर के घर साग खाया। महाभारत के समीक्षित पाठ में "विदुर के शुद्ध और गुणकारी अन्न" का उल्लेख है, साग का नाम नहीं। साग वाली बात बाद की भजन-परंपरा की लगती है।
धृतराष्ट्र को अंतिम उपदेश
मूल ग्रंथ मेंतीर्थयात्रा से लौटकर विदुर कुछ समय हस्तिनापुर में रहे। उन्होंने युधिष्ठिर को यदुकुल के नाश का दुखद समाचार नहीं सुनाया, क्योंकि करुणा के कारण वे उन्हें दुखी नहीं देख सकते थे।
फिर उन्होंने बड़े भाई धृतराष्ट्र से कहा: राजन, जल्दी निकलो, काल आ गया है। पिता, भाई, मित्र, पुत्र सब मारे गए, तुम बूढ़े हो गए, और उन्हीं पांडवों के घर में, जिन्हें तुमने आग और विष दिया, भीम का दिया अन्न खाकर जी रहे हो। धीर वही है, जो यह देह, जिसका अब कोई प्रयोजन नहीं, वैराग्य से त्याग दे; और श्रेष्ठ वह, जो हरि को हृदय में रखकर घर छोड़ दे। विदुर की बात से धृतराष्ट्र ने मोह के बंधन काटे और गांधारी के साथ हिमालय की ओर चल पड़े।
भक्ति और शरणागति की सीख
भगवान भाव के भूखे
कृष्ण ख़ुद अन्न का नियम बताते हैं: अन्न प्रेम से खाया जाता है या संकट में। इसलिए राजमहल का भोजन उन्होंने ठुकराया और विदुर का सादा अन्न खाया। और विदुर ने भी अपना उपदेश यही दिया: सब छूटने से पहले हरि को हृदय में रखकर घर छोड़ देना।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
कृष्ण: केवल विदुर का अन्न
सर्वमेतदभोक्तव्यमन्नं दुष्टाभिसंहितम्।
क्षत्तुरेकस्य भोक्तव्यमिति मे धीयते मतिः॥यह सारा अन्न दुष्ट भाव से भरा है, खाने योग्य नहीं; मेरी बुद्धि कहती है कि केवल विदुर का अन्न खाने योग्य है।
भागवत: हरि को हृदय में रखकर
यः स्वकात्परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्।
हृदि कृत्वा हरिं गेहात्प्रव्रजेत्स नरोत्तमः॥जो अपने अनुभव से या दूसरों से सीखकर वैराग्य पाता है, और हरि को हृदय में रखकर घर छोड़ देता है, वह मनुष्यों में श्रेष्ठ है।
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देवता
- श्री कृष्ण — श्रीकृष्ण के पाठ और तीर्थ
स्रोत
- महाभारत — समीक्षित पाठ (Critical Edition, BORI, Poona, 1933–66), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), BORI (सं.) (1999) · 5.89.10–41
- Sriman Mahabharatam, mainly based on the South Indian texts — Udyogaparva (5) — T. R. Krishnacharya, T. R. Vyasacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1907) · उद्योगपर्व, अध्याय 91, पृ. 152–153 (scan leaf n160–n161)
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 1.13; 3.1
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 1, पृ. 25 (scan leaf n56)
