सुदामा

मुट्ठी भर चिवड़ा लेकर द्वारका गया ग़रीब ब्राह्मण सखा, जिसने कृष्ण से कुछ नहीं माँगा

संक्षेप में

जिन्हें आज सुदामा कहा जाता है, वे श्रीकृष्ण के गुरुकुल के साथी एक ग़रीब, संतोषी ब्राह्मण थे। पत्नी के कहने पर वे मुट्ठी भर चिवड़ा लेकर द्वारका गए। कृष्ण ने उन्हें गले लगाया, पैर धोए और चिवड़ा प्रेम से खाया। उन्होंने कुछ माँगा नहीं, फिर भी लौटे तो उनकी झोंपड़ी महल बन चुकी थी।

श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

सुदामा — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.80.6–7; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 87 (scan leaf n284)
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.80–10.81

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कंध

यह कथा श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध के अस्सीवें और इक्यासीवें अध्याय में है, जिसे शुकदेव राजा परीक्षित को सुनाते हैं। भागवत कथा इस मित्र को कोई नाम नहीं देता: वह बस "कृष्ण का एक ब्राह्मण सखा" है, और उसके लिए "कुचैल", यानी फटे-पुराने कपड़ों वाला, विशेषण आता है।

भागवत में "सुदामा" नाम एक दूसरे व्यक्ति का है: मथुरा का एक माली, जिसके घर कृष्ण और बलराम गए थे। 1916 के कृष्णाचार्य संस्करण का अध्याय-सार इस ब्राह्मण सखा को "कुचेल" कहता है। आज यह कथा "सुदामा" के नाम से प्रसिद्ध है; यह नाम भागवत के इस प्रसंग का नहीं, बाद की परंपरा का है।

पृष्ठभूमि

कौन थे

भागवत के अनुसार वे ब्रह्म को जानने वाले, इंद्रियों के विषयों से विरक्त, शांत और जितेंद्रिय ब्राह्मण थे, जो जो कुछ अपने-आप मिल जाता, उसी पर गृहस्थी चलाते थे। उनकी पत्नी भी उन्हीं जैसी, भूख से दुबली थीं।

कृष्ण और वे बचपन में सांदीपनि मुनि के गुरुकुल में साथ पढ़े थे। द्वारका में कृष्ण उन्हें याद दिलाते हैं कि एक बार गुरु-पत्नी के कहने पर दोनों लकड़ियाँ लाने घने जंगल गए थे; बेमौसम आँधी-बारिश आ गई, सूरज डूब गया, और दोनों रात भर हाथ पकड़े भटकते रहे। सुबह गुरु उन्हें खोजते हुए आए, और उनकी सेवा से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

वे धन माँगने नहीं गए थे। पत्नी के बार-बार कहने पर उन्होंने सोचा: उत्तमश्लोक भगवान के दर्शन, यही सबसे बड़ा लाभ है। और भगवान के सामने भी उन्होंने कुछ नहीं माँगा; लज्जा से अपनी छोटी-सी भेंट तक नहीं निकाली।

लौटकर उन्होंने भगवान से एक ही चीज़ चाही: जन्म-जन्म उन्हीं की मित्रता, सौहार्द और सेवा, और उनके भक्तों का संग।

प्रमुख कथाएँ

पत्नी का आग्रह और मुट्ठी भर चिवड़ा

मूल ग्रंथ में

भूख से मुरझाए मुँह, काँपती हुई पत्नी ने पति से कहा: लक्ष्मीपति भगवान स्वयं आपके सखा हैं, ब्राह्मणों के हितैषी और शरणागतों के रक्षक; वे अभी द्वारका में हैं। जो उनके चरण याद करता है, उसे वे अपने-आप को भी दे देते हैं; दुखी गृहस्थ को धन तो देंगे ही।

ब्राह्मण ने सोचा कि दर्शन ही सबसे बड़ा लाभ है, और जाने को तैयार हुए। पूछा: घर में भेंट के लिए कुछ है? पत्नी ने पड़ोस के ब्राह्मणों से चार मुट्ठी चिवड़ा माँगा, और एक फटे कपड़े में बाँधकर पति को दे दिया।

ग्रंथों में अंतर

भागवत में भेंट "पृथुक-तण्डुल" है, यानी कूटकर चपटे किए हुए चावल, चिवड़ा। लोक में इसे अक्सर "चावल" या "तंदुल" कहा जाता है।

द्वारका में स्वागत

मूल ग्रंथ में

तीन चौकियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार करके ब्राह्मण कृष्ण की सोलह हज़ार रानियों के महलों में से एक में पहुँचे। कृष्ण उस समय अपनी प्रिया के पलंग पर बैठे थे; उन्हें दूर से देखते ही उठकर दौड़े, और बाँहों में भर लिया। प्रिय सखा के स्पर्श से उनकी कमल जैसी आँखों से आँसू बह निकले।

कृष्ण ने उन्हें अपने पलंग पर बिठाया, ख़ुद उनके पैर धोए और वह जल अपने सिर पर लगाया; चंदन, अगरु और कुमकुम लगाया, धूप-दीप से पूजा की, पान और गाय भेंट की। फटे कपड़ों वाले, मैले, दुबले उस ब्राह्मण को रानी स्वयं चँवर से हवा करती रहीं।

अंतःपुर के लोग चकित रह गए: इस भिखारी अवधूत ने कौन-सा पुण्य किया था कि तीनों लोकों के गुरु, लक्ष्मीपति, पलंग पर बैठी लक्ष्मी को छोड़कर इसे बड़े भाई की तरह गले लगा रहे हैं?

ग्रंथों में अंतर

भागवत के मूल पाठ में चँवर डुलाने वाली को केवल "देवी" और "रानी" कहा गया है, नाम नहीं। 1916 संस्करण की पाद-टिप्पणी बताती है कि वीरराघव की टीका वाले पाठ में यहाँ "रुक्मी" पढ़ा गया है, यानी रुक्मिणी।

चिवड़े की मुट्ठी

मूल ग्रंथ में

बातें करते-करते कृष्ण ने हँसकर पूछा: ब्राह्मण, घर से मेरे लिए क्या भेंट लाए हो? भक्त प्रेम से अणु भर भी दे, तो मुझे बहुत है; और अभक्त बहुत भी दे, तो मुझे प्रसन्न नहीं करता। जो भक्ति से पत्ता, फूल, फल या जल भी देता है, उसकी वह भेंट मैं प्रेम से ग्रहण करता हूँ।

लक्ष्मीपति के सामने अपनी मुट्ठी भर भेंट निकालने में ब्राह्मण लजा गए, और सिर झुकाए बैठे रहे। सबके मन की जानने वाले भगवान समझ गए: यह धन के लिए नहीं आया, पति-व्रता पत्नी की इच्छा पूरी करने आया है; इसे मैं देवताओं को भी दुर्लभ संपत्ति दूँगा।

कृष्ण ने उनके कपड़े से बँधी पोटली ख़ुद खींच ली: यह क्या है? सखा, यही तो मुझे सबसे प्रिय भेंट है; ये चिवड़े मुझे ही नहीं, सारे संसार को तृप्त कर देंगे। उन्होंने एक मुट्ठी खाई, और दूसरी उठाई ही थी कि लक्ष्मी जी ने हाथ पकड़ लिया: बस, विश्वात्मन्, इस लोक और परलोक की सारी संपदा के लिए इतना ही बहुत है।

बिन माँगा

मूल ग्रंथ में

रात कृष्ण के महल में सुख से बिताकर ब्राह्मण सुबह विदा हुए, और कृष्ण दूर तक उन्हें छोड़ने आए। उन्हें कृष्ण से धन नहीं मिला था, और उन्होंने ख़ुद माँगा भी नहीं था; फिर भी वे दर्शन के आनंद में डूबे लौटे।

रास्ते भर वे सोचते रहे: कहाँ मैं ग़रीब, पापी, और कहाँ लक्ष्मी के घर कृष्ण! फिर भी उन्होंने मुझे गले लगाया, भाई की तरह अपने पलंग पर बिठाया, रानी ने हवा की, और स्वयं पैर दबाए। दयालु प्रभु ने मुझे धन इसलिए नहीं दिया होगा कि धन पाकर मैं मद में डूब जाऊँ और उन्हें भूल जाऊँ।

घर पहुँचे तो वहाँ सूरज, आग और चाँद जैसे चमकते महल, उपवन, कमलों वाले सरोवर और सजे हुए स्त्री-पुरुष थे। उनकी पत्नी देवी जैसी सजी, आँसू भरी आँखों से उनकी ओर दौड़ी आईं। ब्राह्मण समझ गए: यह सब यदुश्रेष्ठ की कृपा-दृष्टि का फल है; जैसे बादल चुपचाप बरसता है, वैसे ही मेरे सखा माँगने वाले के सामने बिना कुछ कहे भरपूर दे देते हैं।

भक्ति और शरणागति की सीख

भेंट का मोल प्रेम से

इस कथा में भगवान ख़ुद कहते हैं कि भेंट का मोल उसके आकार से नहीं, उसके पीछे के प्रेम से है: भक्त का अणु भी उन्हें बहुत लगता है, और अभक्त का ढेर भी प्रसन्न नहीं करता। मुट्ठी भर चिवड़े ने तीनों लोकों के स्वामी को तृप्त कर दिया।

धन क्यों नहीं, या कब

ब्राह्मण ख़ुद सोचते हैं कि भगवान कच्ची समझ वाले भक्त को अनोखी संपदा, राज और ऐश्वर्य नहीं देते, क्योंकि वे देखते हैं कि धन के मद से धनवान गिरते हैं। और जब उन्हें ऐश्वर्य मिला भी, तो वे पत्नी के साथ उसे भोगते रहे, पर लालच के बिना, मन भगवान में लगाए हुए।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

भगवान का वचन

अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत्। भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

भक्त प्रेम से अणु भर भी दे, तो मुझे बहुत हो जाता है; अभक्त का दिया ढेर भी मुझे संतुष्ट नहीं करता। जो शुद्ध मन से भक्ति के साथ मुझे पत्ता, फूल, फल या जल देता है, भक्ति से दी गई उस भेंट को मैं ग्रहण करता हूँ।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 81, श्लोक 3–4

परंपरा में स्थान

भागवत कहता है कि भगवान के उस मित्र ने देखा कि अजेय भगवान भी अपने सेवकों से हार जाते हैं, और उनके ध्यान से संसार के बंधन ढीले होकर वह जल्दी ही संतों की परम गति, भगवान के धाम को पहुँचा। जो इस कथा को सुनता है, उसमें भगवान के प्रति भाव जागता है।

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देवता

स्रोत

सुदामा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न