अजामिल
मरते समय बेटे को "नारायण" कहकर पुकारा, और वही नाम उसे यमदूतों से छुड़ा ले गया
संक्षेप में
अजामिल कान्यकुब्ज का एक ब्राह्मण था, जो एक दासी के मोह में पड़कर सदाचार छोड़ बैठा। मृत्यु के समय उसने अपने सबसे छोटे बेटे नारायण को पुकारा, और यही नाम सुनकर भगवान विष्णु के पार्षद उसे यमदूतों से छुड़ा ले गए। श्रीमद्भागवत में यह भगवान के नाम की महिमा की सबसे प्रसिद्ध कथा है।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.1.21 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.1.20–6.3.34 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, छठा स्कंध
अजामिल की कथा श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध के पहले तीन अध्यायों में है, जिसे शुकदेव राजा परीक्षित को सुनाते हैं। पहले अध्याय में अजामिल का जीवन और मृत्यु का क्षण है, दूसरे में विष्णुदूतों का उत्तर और अजामिल का पछतावा, और तीसरे में यमराज का अपने दूतों को उपदेश।
पृष्ठभूमि
पहले का अजामिल
अजामिल को ले जाने का कारण बताते हुए यमदूत ख़ुद कहते हैं कि यह ब्राह्मण कभी वेद पढ़ा हुआ, सदाचारी, सच बोलने वाला, संयमी और कोमल स्वभाव का था। गुरु, अग्नि, अतिथि और बड़ों की सेवा करता था, घमंड नहीं था, और सब प्राणियों का हितैषी था।
एक दिन पिता के कहने पर वह वन से फल, फूल, समिधा और कुशा लेकर लौट रहा था। रास्ते में उसने एक कामी पुरुष को शराब के नशे में एक दासी के साथ देखा। उसका मन डोल गया; उसने बहुत रोकना चाहा, पर रोक न सका, और अपना धर्म छोड़ बैठा।
पिता का धन उसने उसी दासी को प्रसन्न करने में लुटा दिया, और अपनी कम उम्र की, अच्छे कुल की पत्नी को छोड़ दिया। फिर जैसे-तैसे, सही-ग़लत तरीक़े से धन कमाकर वह उसी परिवार को पालने लगा, और बहुत समय तक इसी तरह जिया।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
अजामिल भक्त बनकर नहीं, एक पापी के रूप में कथा में आता है। उसने "नारायण" भगवान को नहीं, अपने बेटे को पुकारा था। विष्णुदूत यही कहते हैं कि नाम भगवान का था, और नाम लेने का भाव चाहे जो हो, उसने अपना काम कर दिया। उसकी असली भक्ति इसके बाद शुरू होती है, जब पछतावे में उसका जीवन बदल जाता है।
प्रमुख कथाएँ
मृत्यु का क्षण
मूल ग्रंथ मेंजीवन के अठासी बरस बीत गए। अजामिल के दस बेटे थे, और सबसे छोटे का नाम नारायण था। बूढ़ा पिता उसी बालक की तोतली बोली और खेल में मगन रहता, उसी को खिलाता-पिलाता, और उसे पता ही न चला कि मृत्यु पास आ गई है।
मृत्यु के समय उसने हाथों में पाश लिए, टेढ़े मुँह और खड़े रोम वाले तीन भयानक पुरुषों को अपनी ओर आते देखा। घबराकर उसने दूर खेल रहे बेटे को ऊँचे, काँपते स्वर में पुकारा: नारायण! अपने स्वामी का नाम सुनते ही भगवान विष्णु के पार्षद दौड़े आए, और यमदूतों को रोक दिया।
यमदूत और विष्णुदूत
मूल ग्रंथ मेंयमदूतों ने पूछा: तुम कौन हो जो धर्मराज की आज्ञा रोकते हो? यह पापी है; इसने शास्त्र तोड़ा, पत्नी छोड़ी, और अधर्म से जीवन बिताया। इसे दंड के लिए यमराज के पास ले जाना है।
विष्णुदूतों ने उत्तर दिया: जिस क्षण इसने चार अक्षरों वाला "नारायण" नाम लिया, उसी क्षण इसके करोड़ों जन्मों के पापों का प्रायश्चित हो गया। सब पापियों के लिए भगवान विष्णु का नाम लेना ही सबसे अच्छा प्रायश्चित है; व्रत और दूसरे प्रायश्चित से पापी उतना शुद्ध नहीं होता, जितना हरि के नाम से।
उन्होंने कहा कि भगवान का नाम किसी और को पुकारने के लिए लिया जाए, हँसी में, गीत की टेक में, या अनादर से भी, वह सारे पाप हर लेता है; जैसे अनजाने में ली गई अच्छी दवा भी असर करती है। यह कहकर उन्होंने अजामिल को यम के पाश से छुड़ा दिया।
पछतावा और नया जीवन
मूल ग्रंथ मेंहोश आने पर अजामिल ने दोनों पक्षों की बातें याद कीं, और उसके मन में भारी पछतावा उठा: धिक्कार है मुझे! मैंने अपनी सती, कम उम्र की पत्नी को छोड़ा, और अपने बूढ़े, असहाय माता-पिता को, जिनका कोई और सहारा नहीं था। यह सपना था या सच? वे चार सुंदर पुरुष कहाँ गए, जिन्होंने मुझे छुड़ाया?
फिर उसने सोचा: कहाँ मैं जुआरी, पापी, निर्लज्ज, और कहाँ यह मंगल नाम "नारायण"! ज़रूर मेरा कोई पुण्य रहा होगा, वरना मरते समय मेरी जीभ पर भगवान का नाम कैसे आता? अब मैं मन और इंद्रियों को साधूँगा, सबका मित्र, शांत और दयालु बनूँगा, और कीर्तन से मन भगवान में लगाऊँगा।
भगवान के पार्षदों के क्षण भर के संग से उसके मन में वैराग्य जागा। वह सब बंधन छोड़कर गंगाद्वार गया, वहाँ एक देव-मंदिर में बैठकर योग से मन को भगवान में लगाया। जब वही चार पार्षद फिर दिखे, तो उसने प्रणाम किया, गंगा के तट पर देह छोड़ी, पार्षद का रूप पाया, और उनके साथ सोने के विमान में लक्ष्मीपति के धाम गया।
यमराज का अपने दूतों को उपदेश
मूल ग्रंथ मेंहारकर यमदूत यमराज के पास पहुँचे: क्या संसार पर दंड देने वाले कई स्वामी हैं? आज तक आपका दंड कभी नहीं रुका था। यमराज ने उत्तर दिया कि मुझसे ऊपर भी एक स्वामी है, और उसके दूत अपने भक्तों की हर ओर से रक्षा करते हैं।
यमराज ने कहा: इस संसार में मनुष्य का परम धर्म इतना ही है, नाम लेने जैसे साधनों से भगवान की भक्ति। बेटो, हरि के नाम की महिमा देखो, जिससे अजामिल भी मृत्यु के पाश से छूट गया। जो साधु, समदर्शी और भगवान की शरण में हैं, उनके पास कभी मत जाना; हरि की गदा उनकी रक्षा करती है, और उन्हें दंड देने में न मैं समर्थ हूँ, न काल।
और किसे लाना है, यह भी बताया: जिनकी जीभ भगवान के गुण और नाम नहीं कहती, जिनका मन उनके चरणों को याद नहीं करता, और जिनका सिर एक बार भी कृष्ण के आगे नहीं झुकता। भागवत कहता है कि उस दिन से यमदूत भगवान के भक्त की ओर देखने से भी डरते हैं।
भक्ति और शरणागति की सीख
नाम का भाव नहीं, नाम ही
इस कथा की केंद्रीय बात विष्णुदूतों के मुँह से है: नाम चाहे किसी और को पुकारने के लिए लिया गया हो, हँसी में, गीत में या अनादर से, वह भगवान का नाम है, और अपना काम करता है। अजामिल ने बेटे को पुकारा था, फिर भी छूट गया।
नाम के बाद का जीवन
भागवत इस कथा का निचोड़ एक पंक्ति में देता है: मरते समय बेटे के बहाने हरि का नाम लेकर भी अजामिल भगवान के धाम पहुँचा, तो श्रद्धा से नाम लेने वाले का क्या कहना। पर कथा मृत्यु के क्षण पर ख़त्म नहीं होती। नाम ने अजामिल को छुड़ाया, पर उसका असली परिवर्तन बाद में हुआ: पछतावा, संयम, सबके प्रति मैत्री और करुणा, और कीर्तन से मन को भगवान में लगाना। इसके बाद ही वह भगवान के धाम गया।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
किसी भी भाव से लिया गया नाम
साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥किसी और के संकेत में, हँसी में, गीत की टेक में, या अनादर से भी भगवान वैकुण्ठनाथ का नाम लिया जाए, तो ज्ञानी उसे सारे पाप हरने वाला मानते हैं।
अजामिल का आश्चर्य
क्व चाहं कितवः पापो ब्रह्मघ्नो निरपत्रपः।
क्व च नारायणेत्येतद्भगवन्नाम मङ्गलम्॥कहाँ मैं, जुआरी, पापी, अपने ब्राह्मणत्व को नष्ट करने वाला, निर्लज्ज; और कहाँ यह भगवान का मंगल नाम, "नारायण"!
यमराज का निष्कर्ष
एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंसां धर्मः परः स्मृतः।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥इस संसार में मनुष्य का परम धर्म इतना ही माना गया है: भगवान के नाम लेने आदि साधनों से उनकी भक्ति।
परंपरा में स्थान
भागवत ख़ुद कथा के अंत में कहता है कि जो इस गोपनीय, पाप हरने वाले इतिहास को श्रद्धा से सुनेगा या भक्ति से सुनाएगा, वह नरक नहीं जाएगा। यमराज भी अपने दूतों को अजामिल का उदाहरण देकर ही नाम की महिमा समझाते हैं।
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देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
भक्ति-पाठ
- ॐ नमो नारायणाय — नारायण नाम का मंत्र
ऋषि
- महर्षि शुकदेव — जिन्होंने राजा परीक्षित को यह कथा सुनाई (भागवत 6.1–3)
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 6.1.20–6.3.34
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 6, पृ. 4, 5, 7 (scan leaf n293, n294, n296)
