चित्रकेतु
पुत्र-शोक से ज्ञान तक पहुँचे राजा, जिन्होंने माता पार्वती का शाप भी हाथ जोड़कर स्वीकारा
संक्षेप में
चित्रकेतु शूरसेन देश के सम्राट थे, जिन्हें अंगिरा ऋषि की कृपा से पुत्र मिला, पर सौतेली रानियों ने उसे विष दे दिया। नारद और अंगिरा के उपदेश से वे शोक से उबरे, भगवान संकर्षण के दर्शन पाए, और बाद में पार्वती का शाप भी बिना शिकायत स्वीकार किया; वही अगले जन्म में वृत्रासुर बने।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.14.10 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.14–6.17 |
| अगला जन्म | वृत्रासुर | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.17.38 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, छठा स्कंध
चित्रकेतु की कथा श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध, अध्याय 14 से 17 में है। राजा परीक्षित पूछते हैं कि पापी माने जाने वाले असुर वृत्र की भगवान नारायण में ऐसी दृढ़ भक्ति कैसे थी; उत्तर में शुकदेव वृत्र के पिछले जन्म की, चित्रकेतु की कथा सुनाते हैं।
पृष्ठभूमि
कौन थे
चित्रकेतु शूरसेन देश के सार्वभौम राजा थे; रूप, उदारता, विद्या, ऐश्वर्य, सब कुछ था, अनगिनत रानियाँ थीं, पर कोई संतान नहीं थी। इसलिए राज्य और वैभव में भी उन्हें सुख नहीं मिलता था।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
भगवान संकर्षण के दर्शन होते ही चित्रकेतु के आँसू बहने लगे, रोम खड़े हो गए; प्रेम से गला ऐसा रुँधा कि बहुत देर तक स्तुति के शब्द ही नहीं निकले। फिर उन्होंने कहा: हे अजित, आप तो उन संतों से जीत लिए जाते हैं, जो समदर्शी हैं और बिना कामना के आपको भजते हैं।
उनकी भक्ति की परीक्षा शाप में हुई। पार्वती के शाप पर वे विमान से उतरे, सिर झुकाकर बोले कि मैं आपका शाप हाथ जोड़कर स्वीकार करता हूँ; और इसलिए क्षमा माँगी कि उनकी बात माता को बुरी लगी, शाप से छूटने के लिए नहीं। भागवत कहता है कि वे बदले में शाप देने में समर्थ थे, फिर भी शाप सिर पर लिया; यही साधु का लक्षण है।
प्रमुख कथाएँ
पुत्र का जन्म और मृत्यु
मूल ग्रंथ मेंएक दिन अंगिरा ऋषि उनके महल आए और उनके उदास मुख का कारण पूछा। चित्रकेतु ने कहा: संतान के बिना यह साम्राज्य मुझे वैसे ही सुख नहीं देता, जैसे भूखे-प्यासे को दूसरे सुख। अंगिरा ने त्वष्टा देवता के लिए यज्ञ करके उसका बचा प्रसाद बड़ी रानी कृतद्युति को दिया, और कहा: तुम्हें एक पुत्र होगा, जो तुम्हें हर्ष भी देगा और शोक भी।
पुत्र जन्मा, राजा ने खुले हाथों दान किया, और दिन-ब-दिन उसका मोह बढ़ता गया। रानी कृतद्युति पर राजा का प्रेम देखकर बाकी रानियाँ ईर्ष्या से जलने लगीं, और एक दिन उन्होंने बालक को विष दे दिया। माँ ने उसे सोया समझा; दाई जगाने गई तो बालक के प्राण जा चुके थे। रानी और राजा शोक में बेसुध होकर गिर पड़े, और सारा महल रोने लगा।
नारद और अंगिरा का उपदेश
मूल ग्रंथ मेंतब अंगिरा नारद को साथ लेकर आए। उन्होंने समझाया: जैसे नदी के वेग से रेत के कण मिलते और बिछड़ते हैं, वैसे ही काल से प्राणी मिलते-बिछड़ते हैं; यह बालक पिछले जन्म में तुम्हारा कौन था, और आगे कौन होगा? अंगिरा बोले: मैं तुम्हें पहले ही परम ज्ञान देने आया था, पर तुम्हारा मन पुत्र में देखकर पुत्र दिया; अब तुम पुत्र वालों का दुख भी जान गए। पत्नी, घर, धन, राज्य, यह सब शोक, मोह और भय देने वाला, सपने जैसा है।
नारद ने अपनी शक्ति से मृत बालक के जीव को सबके सामने बुलाकर कहा: देखो, तुम्हारे माता-पिता शोक में हैं; शरीर में लौटकर राज्य भोगो। जीव बोला: किस जन्म में ये मेरे माता-पिता थे? कर्मों से भटकते हुए देवता, पशु और मनुष्य की योनियों में सब कभी न कभी सबके बंधु, शत्रु और मित्र हो चुके हैं। यह कहकर वह चला गया, और सबका शोक मिट गया। विष देने वाली रानियों ने लज्जित होकर ब्राह्मणों के बताए अनुसार प्रायश्चित किया।
संकर्षण का दर्शन
मूल ग्रंथ मेंघर के अंधे कुएँ से चित्रकेतु वैसे निकले, जैसे हाथी कीचड़ भरे तालाब से। यमुना में स्नान करके उन्होंने नारद को प्रणाम किया, और नारद ने उन्हें एक मंत्र-विद्या दी, जो "ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च" से शुरू होती है, और कहा कि सात रात इसे धारण करने पर तुम भगवान संकर्षण का दर्शन करोगे।
केवल जल पीकर सात दिन एकाग्र मन से उस विद्या को धारण करने पर चित्रकेतु विद्याधरों के राजा बने, और कुछ दिन बाद भगवान शेष (संकर्षण) के पास पहुँचे: कमलनाल जैसे गोरे, नीले वस्त्र पहने, सिद्धों से घिरे। दर्शन से ही उनके सारे पाप धुल गए। स्तुति सुनकर भगवान ने कहा: नारद और अंगिरा के उपदेश, उस विद्या और मेरे दर्शन से तुम सिद्ध हो गए हो।
पार्वती का शाप
मूल ग्रंथ मेंलंबे समय तक विद्याधर-लोक में हरि का गुणगान करते हुए घूमते चित्रकेतु ने एक दिन विमान से देखा कि मुनियों और सिद्धों की सभा में भगवान शिव देवी पार्वती को गोद में लिए बैठे हैं। चित्रकेतु ज़ोर से हँसे और बोले: ये संसार के गुरु, धर्म के वक्ता, महान तपस्वी, सभा में पत्नी को गोद में लेकर बैठे हैं, जैसे कोई साधारण आदमी!
शिव केवल मुस्कुराकर चुप रहे, पर पार्वती क्रोध से बोलीं: क्या यह अब सबको दंड देने वाला शासक बन गया? ब्रह्मा, भृगु, नारद, सनत्कुमार, कपिल, मनु, कोई शिव को नहीं टोकता, और यह उन्हें सिखाने चला है! यह अहंकारी भगवान के चरणों के योग्य नहीं; जा, पापी असुर योनि में जन्म ले, ताकि फिर महापुरुषों का अपराध न करे।
तब भगवान शिव ने पार्वती से कहा: तुमने हरि के दासों के दासों की महिमा देखी। नारायण के भक्त किसी से नहीं डरते; स्वर्ग, मोक्ष और नरक, तीनों में उन्हें एक जैसा दिखता है। यह चित्रकेतु भगवान का प्रिय भक्त है, और मैं भी अच्युत का प्रिय हूँ; ऐसे शांत, समदर्शी महात्माओं पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यह सुनकर पार्वती शांत हो गईं।
वही चित्रकेतु त्वष्टा के यज्ञ की दक्षिणाग्नि से दानव योनि में वृत्र के नाम से जन्मे, पर ज्ञान और विज्ञान उनके साथ रहे।
भक्ति और शरणागति की सीख
शाप और वर, एक जैसे
शाप स्वीकारते हुए चित्रकेतु ने कहा: इस संसार-चक्र में अज्ञान से मोहित जीव हर जगह सुख-दुख भोगता है; गुणों के इस प्रवाह में क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक? भगवान शिव ने भी यही कहा कि नारायण के भक्त स्वर्ग, मोक्ष और नरक को एक जैसा देखते हैं।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
शाप को हाथ जोड़कर स्वीकारना
प्रतिगृह्णामि ते शापमात्मनोऽञ्जलिनाम्बिके।
देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत्॥हे माता, मैं आपका शाप हाथ जोड़कर स्वीकार करता हूँ। देवता मनुष्य के लिए जो कहते हैं, वह उसके पहले के कर्मों का ही फल होता है।
भगवान शिव: नारायण के भक्त किसी से नहीं डरते
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति।
स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः॥नारायण की शरण में रहने वाले सब भक्त किसी से नहीं डरते; स्वर्ग, मोक्ष और नरक में भी वे एक जैसा ही देखते हैं।
परंपरा में स्थान
शुकदेव कहते हैं कि महात्मा चित्रकेतु का यह पवित्र इतिहास, जो विष्णु-भक्तों की महिमा है, सुनने से बंधन छूटता है; और जो सुबह उठकर श्रद्धा से हरि का स्मरण करते हुए इसे पढ़ता है, वह परम गति पाता है।
संबंधित भक्त
- वृत्रासुर — अगला जन्म
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देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
ऋषि
- देवर्षि नारद — जिन्होंने चित्रकेतु के पुत्र का जीव बुलाया और मंत्र-विद्या दी (भागवत 6.16)
- महर्षि अंगिरा — जिनकी कृपा से चित्रकेतु को पुत्र मिला (भागवत 6.14)
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 6.14–6.17
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 6, पृ. 35 (scan leaf n324)
