महान भक्त ज्ञानकोश

रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत के भक्तों का ज्ञानकोश: नवधा भक्ति, नाम की महिमा, और कौन-सी प्रसिद्ध कथा मूल ग्रंथ में है, कौन-सी बाद की परंपरा में।

संक्षेप में

जिन भक्तों की कथाएँ पीढ़ियों से घर-घर सुनाई जाती हैं, जैसे प्रह्लाद, ध्रुव, गजेन्द्र, हनुमान, शबरी, विदुर और वृंदावन की गोपियाँ, उनका परिचय यहाँ मूल ग्रंथों से है: रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत और भक्त-चरित। हर कथा पर लिखा है कि वह मूल ग्रंथ में है, बाद के ग्रंथ में, या केवल लोक-परंपरा में।

भक्तों के पृष्ठ

प्रसिद्ध कथाएँ

आराध्य के अनुसार भक्त

श्रीराम के भक्त

जाम्बवान, विभीषण, हनुमान जी, माता शबरी, केवट, निषादराज गुह, जटायु, लक्ष्मण, भरत, अंगद, सुग्रीव, काकभुशुण्डि, अहल्या, सुतीक्ष्ण

श्रीकृष्ण के भक्त

उद्धव, अक्रूर, विदुर, सुदामा, राजा परीक्षित, शुकदेव, अर्जुन, कुंती, द्रौपदी, यशोदा, नंद बाबा, वृंदावन की गोपियाँ, जाम्बवान, मीराबाई, मुचुकुन्द, भीष्म पितामह, रुक्मिणी, कुब्जा

भगवान विष्णु के भक्त

भक्त प्रह्लाद, ध्रुव, राजा अंबरीष, गजेन्द्र, राजा बलि, गरुड़, अंडाल, जनाबाई, रन्तिदेव, चित्रकेतु, अजामिल, वृत्रासुर, जड़ भरत, देवर्षि नारद

भगवान शिव के भक्त

कन्नप्प नायनार, कारैक्काल अम्मैयार, अप्पर (तिरुनावुक्करसर), संबंदर, सुंदरर, माणिक्कवाचकर, नंदनार, चण्डेश्वर नायनार, मार्कण्डेय, उपमन्यु

देवी के भक्त

राजा सुदर्शन, राजा सुरथ और समाधि वैश्य, रामप्रसाद सेन

सभी भक्त (58)

58 नाम

हर भक्त का पृष्ठ मूल ग्रंथ पढ़ने के बाद जुड़ता है। जिनका पृष्ठ संत या ऋषि-खंड में है, उनका link वहीं जाता है।

महिला भक्त

भक्ति के ग्रंथों में स्त्रियों की भक्ति उतनी ही ऊँची है। इस कोश की सूची में 12 महिला भक्त हैं: कुंती, द्रौपदी, यशोदा, वृंदावन की गोपियाँ, माता शबरी, कारैक्काल अम्मैयार, मीराबाई, अंडाल, जनाबाई, रुक्मिणी, कुब्जा, अहल्या।

नाम की महिमा: अजामिल की कथा

श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध में कान्यकुब्ज के एक ब्राह्मण अजामिल की कथा है। वह सदाचार छोड़कर बुरे रास्ते पर चल पड़ा था, और जीवन के अठासी वर्ष ऐसे ही बीत गए। उसके दस पुत्र थे; सबसे छोटे का नाम नारायण था, और बूढ़े पिता का मन उसी बालक में बँधा रहता था।

मृत्यु के समय अजामिल ने तीन भयानक यमदूतों को अपनी ओर आते देखा। घबराकर उसने दूर खेलते बेटे को ऊँचे स्वर में "नारायण" कहकर पुकारा। अपने स्वामी का नाम सुनते ही भगवान विष्णु के पार्षद वहाँ दौड़े आए।

विष्णुदूतों ने यमदूतों से कहा कि जिस क्षण इसने चार अक्षरों वाला "नारायण" नाम लिया, उसी क्षण इसके पापों का प्रायश्चित हो गया। सब पापियों के लिए भगवान विष्णु का नाम लेना ही सबसे अच्छा प्रायश्चित है।

उन्होंने यह भी कहा कि भगवान का नाम किसी और को पुकारने के लिए लिया जाए, हँसी में, गीत की टेक में या अनादर से भी, तब भी वह सारे पाप हर लेता है।

कथा का अंत भी देखने लायक़ है। भगवान के पार्षदों के क्षण भर के संग से अजामिल के मन में वैराग्य जागा। वह सब बंधन छोड़कर गंगाद्वार गया, वहीं गंगा के तट पर देह छोड़ी, और भगवान के पार्षद का रूप पाकर सोने के विमान में लक्ष्मीपति के धाम गया।

रामचरितमानस की नवधा भक्ति में भी पाँचवीं भक्ति "मन्त्र-जाप मम दृढ़ बिस्वासा" है, यानी दृढ़ विश्वास के साथ भगवान के मंत्र का जाप।

विष्णुदूतों का वचन

साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा। वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥

किसी और के संकेत में, हँसी में, गीत की टेक में या अनादर से भी भगवान वैकुण्ठनाथ का नाम लिया जाए, तो ज्ञानी उसे सारे पाप हरने वाला मानते हैं।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 6, अध्याय 2, श्लोक 14

मूल ग्रंथ क्या कहता है: आठ प्रसिद्ध प्रसंग

भक्तों की कई कथाएँ हम बचपन से सुनते आए हैं। उनमें से कुछ मूल ग्रंथ में वैसी ही हैं, कुछ बाद के ग्रंथों में आईं, और कुछ मूल ग्रंथ में किसी और रूप में हैं। नीचे आठ प्रसिद्ध प्रसंग हैं, और साथ में यह कि वाल्मीकि रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत और रामचरितमानस के पाठ में क्या लिखा है।

वाल्मीकि रामायण और महाभारत के लिए समीक्षित संस्करण का पाठ देखा गया है। महाभारत के इस संस्करण में कुछ श्लोक मुख्य पाठ में नहीं, उससे अलग तारांकित अंश के रूप में दिए गए हैं, यानी संपादकों ने उन्हें मुख्य पाठ में नहीं रखा।

प्रसिद्ध प्रसंग और मूल पाठ
प्रचलित कथाग्रंथ के पाठ में क्या हैस्रोत
शबरी ने बेर चख-चखकर श्रीराम को खिलाएवाल्मीकि रामायण में शबरी कहती हैं कि उन्होंने पम्पा के किनारे के तरह-तरह के वन-फल राम के लिए इकट्ठे किए हैं। मानस में वे रसीले कंद-मूल-फल लाकर देती हैं और प्रभु प्रेम से खाते हैं। चखने की बात दोनों में नहीं है।वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.70.13; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अरण्यकाण्ड, दोहा 34 (scan leaf n290)
हनुमान ने सीना चीरकर हृदय में राम-सीता दिखाएवाल्मीकि रामायण के अंत में, राज्याभिषेक के समय सीता अपने गले का हार उतारती हैं। राम कहते हैं कि यह उसे दो, जिससे तुम प्रसन्न हो और जिसमें पौरुष, पराक्रम और बुद्धि हो। सीता हार हनुमान को देती हैं, और वे उससे शोभित होते हैं। सीना चीरने का प्रसंग यहाँ नहीं है।वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 6.116.69–73
केवट ने चरण धोए बिना नाव पर चढ़ाने से मना कियायह प्रसंग रामचरितमानस का है: केवट कहता है कि आपके चरण छूकर शिला नारी बन गई, कहीं मेरी नाव भी मुनि-पत्नी न बन जाए; फिर कठौते में जल लाकर चरण पखारता है। वाल्मीकि रामायण में राम किनारे की नाव पर सीता और लक्ष्मण के साथ चढ़ते हैं, और निषादराज गुह अपने लोगों को नाव खेने को कहते हैं।रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 99–100, पृ. 177 (scan leaf n189); वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.46.61–65
अहल्या शाप से पत्थर बन गई थींवाल्मीकि रामायण में गौतम का शाप है कि अहल्या आश्रम में सब प्राणियों से अदृश्य रहकर, हवा पीकर और भस्म पर सोकर तप करेंगी। रामचरितमानस में वे शाप से "उपल देह", यानी पत्थर की देह धारण किए हैं।वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.47.29; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), बालकाण्ड, दोहा 210, पृ. 83 (scan leaf n93)
द्रौपदी की पुकार पर श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ायामहाभारत के समीक्षित पाठ में लिखा है कि दुःशासन वस्त्र खींचता रहा और उसी जैसा दूसरा वस्त्र बार-बार प्रकट होता रहा; देने वाले का नाम नहीं है। द्रौपदी के कृष्ण को पुकारने वाले श्लोक वहाँ मुख्य पाठ में नहीं, तारांकित अंश में हैं। प्रचलित पाठ (Ganguli का अनुवाद) में द्रौपदी कृष्ण को पुकारती हैं, पर उन्हें वस्त्रों से अदृश्य रहकर धर्म ढकते हैं।महाभारत (समीक्षित पाठ), 2.61.40–41; तारांकित अंश *0542–*0550; महाभारत (Ganguli अनु.), सभा पर्व, Section LXVI के बाद का अनुभाग (इस e-text में अगला शीर्षक नहीं छपा)
विदुर के घर श्रीकृष्ण ने साग खायामहाभारत के उद्योग पर्व में कृष्ण दुर्योधन का भोज यह कहकर ठुकराते हैं कि बुरे इरादे से दिया अन्न खाने योग्य नहीं। फिर वे विदुर के घर जाकर उनका "शुद्ध और गुणकारी" अन्न खाते हैं। साग का नाम नहीं है।महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.89.11, 32, 34, 39–41
श्रीकृष्ण के गरीब ब्राह्मण मित्र का नाम सुदामा थाभागवत इस मित्र का नाम नहीं देता: "कृष्ण का एक ब्राह्मण सखा", और उसके लिए "कुचैल" (फटे-पुराने कपड़ों वाला) शब्द आता है। भागवत में "सुदामा" नाम मथुरा के एक माली का है, जिसके घर कृष्ण और बलराम गए थे।श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.80.6–7; 10.41.43
सेतु के पत्थरों पर "राम" लिखा गया, इसलिए वे तैरेवाल्मीकि रामायण में वानर पेड़ और चट्टानें समुद्र में डालते हैं, और नल दस योजन चौड़ा, सौ योजन लंबा सेतु बनाते हैं। पत्थरों पर नाम लिखने की बात नहीं है।वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 6.15.18–26

इस कोश को कैसे पढ़ें

हर कथा के साथ एक छोटा label लगा होता है, जो बताता है कि बात कहाँ से आई है:

  • मूल ग्रंथ मेंबात उस ग्रंथ के मूल पाठ में है, जिसमें भक्त की कथा आती है।
  • बाद के ग्रंथ मेंबात मूल ग्रंथ में नहीं, बाद के किसी ग्रंथ में है, जैसे रामचरितमानस या भक्तमाल।
  • लोक-परंपराकथा लोक-परंपरा में प्रचलित है, पर पढ़े गए ग्रंथों में नहीं मिली। यह भी श्रद्धा की धरोहर है, इसलिए हटाई नहीं जाती।
  • क्षेत्रीय परंपराकिसी एक क्षेत्र या संप्रदाय की मान्यता है।
  • आधुनिक विद्वानों का मतआधुनिक विद्वानों का विश्लेषण है।
  • ग्रंथों में अंतरअलग-अलग ग्रंथ अलग बात कहते हैं; सब रूप दिए गए हैं।

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देवता

भक्ति-पाठ

संत

ऋषि

सनातन धर्म के और खंड

  • संत — भारत के संत, भक्त-कवि और आचार्य
  • ऋषि — वैदिक और पौराणिक ऋषि, उनकी गाथाएँ और योगदान
  • गोत्र — गोत्र, प्रवर और ऋषि-कुल

स्रोत

भक्तों के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न