FAQ
रामप्रसाद सेन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अठारहवीं सदी (1718–1775) के बंगाली कवि, जिनके काली के गीत D. C. Sen (1911) के समय भी बंगाल के गाँवों में सबसे लोकप्रिय थे; वे उन्हें धार्मिक गीतकारों में सबसे ऊँचा नाम कहते हैं।
नौकरी में वे बही के पन्नों पर गीत लिख देते थे, जैसे "मुझे यह मुंशीगिरी नहीं चाहिए, माँ, अपना खज़ाना सौंप दो"; मालिक ने पढ़कर तीस रुपये महीने की पेंशन बाँध दी (Thompson 1923, पृ. 17; D. C. Sen 1911, पृ. 713)।
उनमें भगवान माँ हैं, और भक्त बच्चा: वह रूठता है, शिकायत करता है, मार खाकर भी "माँ" पुकारता है। D. C. Sen के अनुसार मालश्री राग में रचे इन गीतों ने बंगाल में आध्यात्मिक क्रांति ला दी।
Thompson के अनुसार नदिया (कृष्णनगर) के राजा कृष्णचंद्र के दरबार में उन्हें यह उपाधि मिली; राजा ने उन्हें पेंशन और 1758 में सौ बीघा ज़मीन भी दी (D. C. Sen, पृ. 713)।
दो रूप मिलते हैं: पुरानी परंपरा कहती है कि वे काली का गीत गाते हुए गए; D. C. Sen के अनुसार वे काली-पूजा के दिन समाधि-भाव में प्रतिमा के पीछे गंगा में उतरे और डूब गए। वर्ष 1775 (Thompson, पृ. 17–18)।
