रामप्रसाद सेन

हिसाब की बही में काली के पद लिखने वाले बंगाल के कवि, जिन्होंने भगवान को माँ कहकर पुकारा

संक्षेप में

एक ज़मींदार के दफ़्तर में हिसाब लिखने वाला लड़का बही के पन्नों पर गीत लिख देता था: "मुझे यह मुंशीगिरी नहीं चाहिए, माँ, अपना खज़ाना सौंप दो।" मालिक ने पढ़ा, तो डाँटने की जगह पेंशन बाँध दी। यही रामप्रसाद सेन थे, बंगाल के कवि जिन्होंने काली को माँ कहकर बच्चे की तरह पुकारा।

संत-कवि

एक नज़र में

रामप्रसाद सेन — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कविD. C. Sen, History of Bengali Language and Literature (1911), ch. VI, "Rama Prasada Sen", pp. 712–713; Thompson & Spencer, Bengali Religious Lyrics, Śākta (1923), भूमिका pp. 16–17
काल1718–1775 ई. (ऐतिहासिक प्रमाण)D. C. Sen, History of Bengali Language and Literature (1911), ch. VI, "Rama Prasada Sen", pp. 712, 719; Thompson & Spencer, Bengali Religious Lyrics, Śākta (1923), भूमिका pp. 16–17

जीवन

कुमारहट्ट का लड़का

ऐतिहासिक प्रमाण

रामप्रसाद 1718 में हालीशहर के पास कुमारहट्ट गाँव में रामराम सेन के घर जन्मे। D. C. Sen के अनुसार वे वैद्य जाति के थे; Thompson लिखते हैं कि उनके वंशज वैद्य हैं और वे पदों में ख़ुद को वैद्य कहते हैं, हालाँकि कभी-कभी उन्हें ब्राह्मण भी कहा गया। रिश्तेदारों की चालों से पिता की विरासत छिन गई थी, इसलिए बचपन ग़रीबी में बीता।

किशोर उम्र में वे एक ज़मींदार के दफ़्तर में हिसाब लिखने लगे; Thompson के अनुसार कलकत्ता में दीवान बकुलचंद्र घोषाल के यहाँ नक़लनवीस थे। वे बही के पन्नों पर गीत लिख देते थे। मालिक ने देखा, तो पहले नाराज़ हुआ, पर पढ़कर इतना प्रसन्न हुआ कि तीस रुपये महीने की पेंशन बाँध दी और गाँव लौटकर गीत रचने की छूट दी।

कृष्णनगर का दरबार और गाँव का आसन

ऐतिहासिक प्रमाण

नदिया (नवद्वीप) के राजा कृष्णचंद्र ने भी उन्हें पेंशन दी, और 1758 में सौ बीघा लगान-मुक्त ज़मीन। Thompson के अनुसार दरबार में उन्हें "कविरंजन" की उपाधि मिली। वहाँ एक वैष्णव कवि आजु गोस्वामी उनके प्रतिद्वंद्वी थे, पर Thompson के अनुसार दोनों के संबंध स्नेह भरे लगते हैं: रामप्रसाद ने लिखा, "माँ, मुझे माया के जाल से छुड़ाओ", तो आजु ने उत्तर दिया, "मुझे उसकी चौड़ी ज़ंजीरों में बाँधो।"

फिर वे अपने गाँव लौट आए। D. C. Sen लिखते हैं कि वहाँ उनका पंचमुंडी आसन, जिस पर वे दिन-रात योग-साधना करते थे, आज भी दिखता है; और मालश्री राग में रचे उनके गीतों ने बंगाल के आध्यात्मिक जगत में क्रांति ला दी।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

"तुम्हारे चरण ही मेरी काशी"

परंपरागत कथा

Thompson एक कथा देते हैं, यह कहते हुए कि ऐसी कई कथाएँ बाद में किसी पद की व्याख्या के लिए बनीं: गंगा जाते रामप्रसाद से एक स्त्री ने गीत सुनाने को कहा। लौटे, तो वह जा चुकी थी, पर कुल-मंदिर में एक पर्ची छोड़ गई थी: काली काशी से तुम्हारा गीत सुनने आई थीं, अब तुम काशी आओ। रास्ते में वे बीमार पड़े और गाया, "मैं नहीं जा सकता, तुम्हारे चरण ही मेरी काशी होंगे"; फिर एक दर्शन में काली ने यात्रा छोड़ने को कहा।

स्रोतों में अंतर

मृत्यु, दो रूप: Thompson के अनुसार पुरानी परंपरा यह है कि मृत्यु की रात उन्होंने काली की पूजा की, "तारा, तुम्हें और कुछ याद है?" गीत रचा, और गाते हुए प्राण छोड़े। पर D. C. Sen ने Thompson को बताया कि उनकी जाँच के अनुसार काली-पूजा के दिन रामप्रसाद समाधि-भाव में काली की प्रतिमा के पीछे-पीछे गंगा में उतरे और डूब गए। दोनों 1775 का वर्ष देते हैं।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

मार खाकर भी "माँ"

D. C. Sen कहते हैं कि रामप्रसाद के गीतों में भगवान का मातृत्व एक जीता अनुभव है: वे बच्चे की तरह माँ काली से अपने दुख कहते हैं। उनके एक पद का भाव: माँ मारती भी है, तो बच्चा "माँ, माँ" पुकारकर उसके आँचल से और कसकर लिपटता है; मैं तुम्हें देख नहीं पाता, फिर भी खोया बच्चा नहीं, अब भी "माँ" ही पुकारता हूँ।

मूर्ति को वे कभी केवल प्रतीक भी कहते हैं। एक पद का भाव: मन, दिखावे की पूजा व्यर्थ है, यह केवल अहंकार बढ़ाती है; चुपचाप भीतर उसकी आराधना करो। सारा संसार ही माँ की मूर्ति है; जो सबको भोजन देती है, उसे मुट्ठी भर चने क्या चढ़ाना? बेचारे बकरे की बलि क्यों, "जय काली" कहकर अपने भीतर के शत्रुओं, अपनी वासनाओं की बलि दो। D. C. Sen जोड़ते हैं कि यह मूर्ति-पूजा का खंडन नहीं, उस क्षण की बात है जब साधन को ही साध्य मान लिया जाए।

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परश्यामा-संगीत (काली के पद), विद्यासुंदर, काली-कीर्तन, शिव-संकीर्तन, कृष्ण-कीर्तन — उनकी ख्याति उनके शाक्त गीतों से है, जो D. C. Sen के समय भी बंगाल के गाँव-खेतों में गाए जाते थे। Thompson के अनुसार इनके अलावा उन्होंने विद्यासुंदर काव्य और तीन छोटे कीर्तन लिखे; वे यह भी लिखते हैं कि रामप्रसाद के गीतों का कोई प्रामाणिक संस्करण अभी नहीं है, और कई गीत केवल उनके नाम पर चलते हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतD. C. Sen के अनुसार धार्मिक गीत लिखने वालों में रामप्रसाद से ऊँचा कोई नाम नहीं, और उनके बाद गीतकारों की एक पूरी धारा उन्हीं की ऊँची आध्यात्मिक लय में लिखती रही।

स्रोत

रामप्रसाद सेन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न