कारैक्काल अम्मैयार

जिन्होंने भगवान से अपनी सुंदरता लौटाकर हड्डियों वाला रूप माँगा, और जिन्हें शिव ने "माँ" कहा

संक्षेप में

एक शिव-भक्त भूखा आया, तो पुनीतवती ने पति के लिए रखा आम उसे खिला दिया। पति ने दूसरा माँगा, और शिव की कृपा से हाथ में आम आ गया। यह देखकर पति डरकर चला गया। तब उन्होंने भगवान से अपनी देह की सुंदरता लौटाकर केवल हड्डियों वाला रूप माँगा। यही कारैक्काल अम्मैयार थीं, जिन्हें शिव ने "माँ" कहा।

नायनारमहिला संत / संत-कवयित्रीनायनार (तमिल शैव)

एक नज़र में

कारैक्काल अम्मैयार — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीनायनार, महिला संत / संत-कवयित्रीपेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), "The Mother of Karaikkal", p. 73; पेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), Divisions of the Book, p. 5; पेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), "The Mother of Karaikkal", pp. 73, 77
परंपरानायनार (तमिल शैव)पेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), "The Mother of Karaikkal", p. 73

जीवन

कारैक्काल की पुनीतवती

परंपरागत कथा

समुद्र-तट के व्यापारी नगर कारैक्काल में धनदत्त नाम के व्यापारी की बेटी हुईं, जिनका नाम पुनीतवती (निर्मल) रखा गया। बचपन से ही उनका मन भगवान में, धर्म-ग्रंथों में और शिव-भक्तों की सेवा में रमता था।

उनका विवाह नागपट्टिनम् के परमदत्त से हुआ। माता-पिता इकलौती बेटी को दूर नहीं भेजना चाहते थे, इसलिए उन्होंने दामाद को कारैक्काल में ही अलग घर और बड़ी संपत्ति दी, और वह वहीं रहने लगा।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

दो आम

परंपरागत कथा

एक दिन परमदत्त ने दोस्तों से मिले दो आम घर भेजे। तभी एक शिव-भक्त भूखा आया। भात बना था, सब्ज़ी नहीं; पुनीतवती ने सोचा कि भगवान के भक्त से बढ़कर कुछ नहीं, और एक आम उसे खिला दिया। दोपहर को पति ने भोजन में दूसरा आम खाया, मीठा लगा, तो पहला भी माँगा।

पुनीतवती भीतर गईं, घबराकर भगवान से प्रार्थना की, और उनके हाथ में एक आम आ गया। उसका स्वाद तीनों लोकों से अलग था। पति ने पूछा कहाँ से आया? वे भगवान की कृपा का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहती थीं, पर पति से झूठ भी नहीं बोल सकती थीं, इसलिए सच बता दिया। पति ने कहा: अगर यह भगवान की कृपा है, तो एक और लाओ। उन्होंने फिर प्रार्थना की, आम हाथ में आया, और पति के हाथ में जाते ही ग़ायब हो गया।

सुंदरता का त्याग

परंपरागत कथा

परमदत्त काँप उठा: यह साधारण स्त्री नहीं। वह चुपके से जहाज़ लेकर व्यापार को निकला, पांड्य देश के एक बंदरगाह में बस गया, दूसरा विवाह किया, और बेटी का नाम पुनीतवती रखा। बरसों बाद पुनीतवती के परिवार वाले उन्हें पालकी में लेकर वहाँ पहुँचे, तो परमदत्त पत्नी और बेटी के साथ आया और उनके चरणों में गिर पड़ा। अचरज में पड़े लोगों को उसने सारी बात बताई, और कहा कि आप सब भी इन्हें पूजें।

तब उन्होंने भगवान से कहा: जब पति का यही भाव है, तो यह मांस और सुंदरता, जो केवल उन्हीं के लिए थी, मुझे अब नहीं चाहिए; मुझे वह रूप दो जिसमें मैं सदा तुम्हारी प्रार्थना में खड़ी रह सकूँ। उसी क्षण उनकी देह का मांस झड़ गया, केवल हड्डियाँ रहीं, और वे पेय् (प्रेत) के रूप में आ गईं; आकाश से फूल बरसे, और वहाँ खड़े सबने उनके चरण छुए।

कैलास पर: "माँ"

परंपरागत कथा

वे कैलास के दर्शन को चलीं, और पर्वत के पास पहुँचकर पैरों से चलने से डरीं, इसलिए सिर के बल चलीं। पार्वती ने आश्चर्य से पूछा कि हड्डियों की देह लिए सिर के बल आने वाली इस स्त्री में कितना प्रेम होगा। शिव ने कहा: यह मेरी भक्त है, और यह रूप इसने जान-बूझकर माँगा है। पास आने पर शिव ने उन्हें "माँ" कहकर पुकारा, और वे "पिता" कहकर चरणों में गिर पड़ीं।

शिव ने पूछा कि क्या चाहिए। उन्होंने माँगा: न मरने वाला आनंद भरा प्रेम; फिर जन्म ही न हो; और अगर हो, तो तुम्हें कभी न भूलूँ, और सदा तुम्हारे नाचते चरणों के नीचे तुम्हारी स्तुति गाती रहूँ। शिव ने वर दिया, और कहा कि तिरुवालंगाडु में वे उनका आनंद-तांडव देखेंगी। वहीं रहकर उन्होंने पद गाए, और अपने अंतिम पद के साथ शिव के नृत्य को देखते हुए उनके चरणों में समा गईं।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

जैसा रूप, वैसी कृपा

नल्लस्वामी पिल्लै के अनुवाद में उनके पदों का भाव: बोलना सीखा, तभी से तुम्हारे प्रति प्रेम बढ़ता गया; तुम दुख न भी छुड़ाओ, रास्ता न भी दिखाओ, मेरा मन तुमसे प्रेम करना नहीं छोड़ेगा। और: पोथी-पंडित तुम्हारे स्वरूप के बारे में जो कहें, कहने दो; जो जिस रूप में तुम्हें पूजता है, उसी रूप में तुम कृपा करते हो।

एक पद में वे मानती हैं कि जिस दिन वे उनकी हुईं, तब भी उनका रूप नहीं जानती थीं, आज भी नहीं जानतीं; लोग पूछते हैं तुम्हारे स्वामी का रूप कैसा है, तो क्या उत्तर दूँ? नल्लस्वामी के अनुसार कथा की सीख यह है कि देह की सुंदरता की पूजा व्यर्थ है, और दुनिया भगवान की श्रद्धा के कारण ठुकरा भी दे, तो यही श्रद्धा अंत में आनंद तक पहुँचाती है।

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परअर्पुदत् तिरुवंदादि और अन्य पद — नल्लस्वामी के अनुसार प्रेत-रूप पाने के बाद उन्होंने पहला काव्य अर्पुदत् तिरुवंदादि (अद्भुत अंदादि) रचा, सौ पदों का; पेरिय पुराणम् उसके बाद इरट्टै मणिमालै का भी नाम लेता है, और तिरुवालंगाडु में गाए उनके पदिगमों का भी। उनके पद ग्यारहवीं तिरुमुरै में हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

परंपरागत कथासुंदरर की कथा में भी तिरुवालंगाडु "कारैक्काल की देवी" के मंदिर के रूप में आता है, जिसके दर्शन सुंदरर ने किए थे।

स्रोत

कारैक्काल अम्मैयार — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न