सुंदरर (सुंदरमूर्ति)
विवाह-मंडप से शिव के "दास" बनाकर ले जाए गए कवि, जिन्होंने 63 नायनारों की सूची गाई
संक्षेप में
विवाह के दिन मंडप में भिखारी के वेश में एक ब्राह्मण आया और बोला: यह दूल्हा मेरा दास है, इसके दादा ने लिखकर दिया था। वह ब्राह्मण स्वयं शिव थे। यही सुंदरर थे, देवारम् के तीसरे कवि, जिन्होंने अपने पद तिरुत्तोंडत्तोगै में शिव के भक्तों के नाम गाए, जिनसे 63 नायनारों की परंपरा बनी।
नायनारनायनार (तमिल शैव)
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | नायनार | Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 70–71; पेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), भूमिका pp. xx–xxi, xxix |
| परंपरा | नायनार (तमिल शैव) | Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 70–71 |
| काल | नौवीं सदी ई. का पहला चौथाई, ऐसा आम तौर पर माना जाता है; संबंदर और अप्पर के बाद (आधुनिक विद्वानों का मत) | Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 70, 73 |
जीवन
जन्म और विवाह-मंडप
परंपरागत कथापेरिय पुराणम् के अनुसार सुंदरर तिरुमुनैप्पाडि क्षेत्र के तिरुनावलूर में शिव-भक्त सडैयनार और इसैज्ञानियार के पुत्र थे। बालक की सुंदरता देखकर उस क्षेत्र के राजा ने उन्हें माँगकर अपने बेटे की तरह पाला, और वे वेद भी पढ़ते रहे। Kingsbury लिखते हैं कि वे ब्राह्मण थे और दक्षिण अर्काट ज़िले में जन्मे।
विवाह के दिन, जब वे पूरे ठाठ से दुल्हन के घर पहुँचे, भिखारी के वेश में एक ब्राह्मण मंडप में आया और बोला: यह विवाह नहीं होगा, यह दूल्हा मेरा दास है, इसके दादा ने लिखकर दिया था। सुंदरर ने "पागल" कहकर पत्र फाड़ दिया। गाँव की सभा में मूल पत्र दिखाया गया, दादा के हस्ताक्षर मिल गए; और जब पूछा गया कि तुम्हारा घर कहाँ है, तो वह ब्राह्मण सबको वेण्णैनल्लूर के शिव-मंदिर में ले गया, और भीतर जाकर अदृश्य हो गया।
सुंदरर समझ गए, मंदिर में दौड़े और बोले: मैं पहचान गया, स्वामी, आपका दावा सच्चा है। शिव ने कहा: तुमने मुझे झगड़े में पागल और छली कहा; अब से तुम मेरे प्रबल भक्त कहलाओगे; जाओ, तमिल देश में प्रेम से मेरे गीत गाओ, गीत ही तुम्हारी पूजा होगी।
शिव, जो सखा भी थे
परंपरागत कथासुंदरर ने तिरुवारूर की परवैयार से विवाह किया, और बाद में तिरुवोट्टियूर की संगिलियार से। Kingsbury के अनुसार परवैयार तिरुवारूर मंदिर की नर्तकी थीं, और संगिलियार वेळ्ळाळ परिवार की। परंपरा कहती है कि दोनों विवाहों में शिव ने ही बीच में पड़कर बात बनाई।
संगिलियार को दिया वचन तोड़कर जब सुंदरर तिरुवोट्टियूर से आरूर चले, तो उनकी आँखों की ज्योति चली गई। अंधे सुंदरर गाते हुए मंदिर-मंदिर गए; कांची में बाईं आँख लौटी, फिर दाईं, और वे फिर आरूर पहुँचे।
अंत में तिरुवंजैक्कळम् के मंदिर में उन्होंने प्रार्थना की कि अब धरती के बंधन से छुड़ाकर फिर कैलास के चरणों में ले लो। शिव ने देवताओं को भेजा, और सुंदरर सफ़ेद हाथी पर बैठकर कैलास गए; उनके मित्र, कोडुंगोल के सरदार चेरमान पेरुमाल, अपने घोड़े पर उनके साथ हो लिए।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
कुंडैयूर का धान
परंपरागत कथाअकाल में कुंडैयूर के एक सरदार, जो सुंदरर के घर अनाज भेजा करते थे, शिव से रोए; सपने में वचन मिला, और सुबह गाँव में पहाड़ जैसे धान के ढेर लगे थे। उन्हें आरूर कौन पहुँचाए? सुंदरर ने मंदिर में पद गाया, और रात में शिव के गणों ने धान से न केवल उनके, पूरे आरूर के भंडार भर दिए।
Kingsbury इसी कथा के दो पद देते हैं, जिनका भाव है: मैं हर दिन तुम्हारी पूजा करता हूँ; तुमने आज कुंडैयूर में धान दिया, पर उसे लाने वाला कोई नहीं, उसे भिजवा दो। तुम स्वयं आधे नारी हो और गंगा तुम्हारी जटा में है; स्त्रियों का बोझ तुमसे बेहतर कौन समझेगा?
मगरमच्छ से लौटा बालक
परंपरागत कथाएक गाँव में आमने-सामने के दो घरों में एक में उत्सव था, दूसरे में मातम: दो पाँच-वर्ष के बालक तालाब में नहाने गए थे, एक को मगरमच्छ निगल गया, और जो बच गया, उसका जनेऊ हो रहा था। दुखी परिवार ने भी सुंदरर का सत्कार किया; करुणा से भरकर उन्होंने पद गाया, और कथा कहती है कि मगरमच्छ बालक को किनारे लौटा गया।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
भगवान से सखा का रिश्ता
सुंदरर शिव से दास की तरह भी बोलते हैं और मित्र की तरह भी: कभी "पागल" कहते हैं, कभी कुछ माँगते हैं, कभी रूठते हैं। उनके एक पद का भाव: मैं कुत्ते की तरह मनुष्यों के पीछे भटका, तुम्हें एक बार भी याद किए बिना; थककर लौटा, तो तुमने वह कृपा दी जो कोई नहीं कमा सकता; वेण्णैनल्लूर में मैं पूरा तुम्हारा हो गया, अब अपने आप को कैसे नकारूँ?
वे कवियों से कहते हैं कि झूठे धनवानों की स्तुति मत गाओ: कमज़ोर को भीम कहो, कंजूस को दानी पारि कहो, फिर भी वह कुछ नहीं देगा; शिव की स्तुति गाओ, जो यहाँ भी भरते हैं और वहाँ भी।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंदेवारम् के पद और तिरुत्तोंडत्तोगै — सुंदरर के पद देवारम् में हैं; वे इसके तीन कवियों में अंतिम हैं। नल्लस्वामी पिल्लै के अनुसार नायनारों की कथा कहने वाले तमिल ग्रंथों में सबसे पहला उनका तिरुत्तोंडत्तोगै ("भक्तों की सूची") है: चिदंबरम् में रचे दस पद, जो "मैं तिल्लै के ब्राह्मणों के दासों का दास हूँ" से शुरू होते हैं, और हर भक्त का नाम एक-दो शब्दों के परिचय के साथ देते हैं, उनके अपने माता-पिता का भी। बाद में नंबियांडार नंबि, उमापति शिवाचार्य और सेक्किऴार ने इन्हीं पर विस्तार किया। Kingsbury लिखते हैं कि 63 नायनारों में सुंदरर अंतिम हैं, क्योंकि उन्होंने बाकी 62 की स्तुति गाई।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
आधुनिक विद्वानों का मततिरुत्तोंडत्तोगै के कारण सुंदरर 63 नायनारों की परंपरा की नींव माने जाते हैं: कन्नप्प, नंदनार (नाळैप्पोवान्) और कोच्चेंगट चोल जैसे भक्तों के नाम उनकी वाणी में एक साथ आते हैं।
स्रोत
- Hymns of the Tamil Saivite Saints — F. Kingsbury, G. E. Phillips (अनु.) (1921) · pp. 2, 70–83
- The Light of Truth or Siddhanta Deepika, Vol. V (Aug. 1901): "The Life and Legends of Sundara-murtti" — G. U. Pope (लेख); J. M. Nallaswami Pillai (सं.), Madras (1901) · "The Life and Legends of Sundara-murtti", पृ. 41–48
- Periyapuranam (The Lives of Saiva Saints) of St. Sekkilar, Part I — J. M. Nallaswami Pillai (अनु.), Tamil University Publishing House, Madras (1924) · भूमिका pp. xx–xxi, xxix
