वृंदावन की गोपियाँ

व्रज की ग्वालिनें, जिनके प्रेम के आगे भगवान ने ख़ुद को ऋणी कहा

संक्षेप में

वृंदावन की गोपियाँ व्रज की ग्वालिनें थीं, जिनका मन श्रीकृष्ण में ऐसा लगा कि उनके लिए घर और लोक-मर्यादा भी छूट गई। भागवत उनके प्रेम को भक्ति का सबसे ऊँचा रूप मानता है: कृष्ण ख़ुद कहते हैं कि वे देवताओं की आयु पाकर भी गोपियों का ऋण नहीं चुका सकते, और ज्ञानी उद्धव उनकी चरण-धूल माँगते हैं।

श्रीकृष्ण के भक्तभक्तों का समूह

एक नज़र में

वृंदावन की गोपियाँ — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीभक्तों का समूहश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.29.4; 10.47.63; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 64 (scan leaf n161)
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.21–10.33; 10.46–10.47; 10.82

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कंध

गोपियों का सबसे बड़ा वर्णन श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध, अध्याय 29 से 33 में है, जिन्हें रास-पंचाध्यायी कहा जाता है। इसके अलावा उद्धव के व्रज आने (अध्याय 46–47) और बरसों बाद कुरुक्षेत्र में मिलन (अध्याय 82) में भी वे हैं। भागवत किसी गोपी का नाम नहीं देता; रास में एक विशेष गोपी का उल्लेख है, जिसके बारे में बाकी गोपियाँ कहती हैं कि "इसने अवश्य भगवान की आराधना की होगी", पर नाम वहाँ भी नहीं है।

पृष्ठभूमि

परीक्षित का प्रश्न

भागवत ख़ुद यह प्रश्न उठाता है। परीक्षित पूछते हैं: गोपियाँ कृष्ण को प्रियतम मानती थीं, ब्रह्म नहीं; फिर उनका संसार-बंधन कैसे छूटा? शुकदेव उत्तर देते हैं: जब भगवान से द्वेष करने वाला शिशुपाल भी मुक्त हो गया, तो उनकी प्रिय गोपियों का क्या कहना! भगवान का प्रकट होना मनुष्यों के कल्याण के लिए है; काम, क्रोध, भय, स्नेह, एकता या मित्रता, किसी भी भाव से जो मन सदा हरि में लगाता है, वह उन्हीं जैसा हो जाता है।

रास-पंचाध्यायी के अंत में परीक्षित फिर पूछते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए आए भगवान ने यह मर्यादा के विरुद्ध आचरण क्यों किया। शुकदेव कहते हैं: समर्थ ईश्वरों का आचरण दोष नहीं बनता, जैसे सब कुछ जलाने वाली अग्नि को दोष नहीं लगता; पर साधारण मनुष्य को ऐसा मन से भी नहीं करना चाहिए, जैसे शिव के सिवा कोई समुद्र का विष पीए तो नष्ट हो जाए। ईश्वरों के वचन मानने चाहिए, उनके हर आचरण की नकल नहीं। और जो गोपियों, उनके पतियों और सब प्राणियों के भीतर बसा है, वही भक्तों पर कृपा करने को ऐसी लीला करता है, जिसे सुनकर मनुष्य भगवान-परायण हो।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

कृष्ण ने मथुरा से उद्धव को भेजते हुए गोपियों के बारे में कहा: उनका मन मुझमें है, प्राण मुझमें हैं, मेरे लिए उन्होंने देह के सुख भी छोड़ दिए; वे मुझे ही अपना प्रियतम और आत्मा मानती हैं, और जिन्होंने मेरे लिए लोक-धर्म छोड़ा, उनका भार मैं उठाता हूँ।

उद्धव ने भी व्रज में उन्हें देखकर कहा कि दान, व्रत, तप से लोग जो भक्ति पाना चाहते हैं, जो मुनियों को भी दुर्लभ है, वह गोपियों को मिली है; और अंत में वे उनकी चरण-धूल को बार-बार प्रणाम करते हुए लौटे।

प्रमुख कथाएँ

शरद की रात और बाँसुरी

मूल ग्रंथ में

शरद की खिली चाँदनी रात में कृष्ण ने बाँसुरी बजाई। उसे सुनकर व्रज की गोपियाँ एक-दूसरे को बताए बिना, जो जिस काम में थी उसे वहीं छोड़कर चल पड़ीं: कोई गाय दुहते हुए, कोई चूल्हे पर दूध छोड़कर, कोई बच्चों को दूध पिलाते या खाना परोसते हुए। पति, पिता और भाइयों के रोकने पर भी वे नहीं रुकीं। जो घर से निकल न सकीं, उन्होंने आँखें बंद करके कृष्ण का ध्यान किया।

गोपी गीत

मूल ग्रंथ में

रास के बीच कृष्ण अंतर्धान हो गए, तो गोपियाँ उन्हें वन-वन खोजती रहीं, और यमुना के किनारे बैठकर विरह में गाने लगीं। यह गीत, भागवत के 31वें अध्याय के उन्नीस श्लोक, "गोपी गीत" कहलाता है। वे गाती हैं: तुम्हारे जन्म से व्रज की महिमा बढ़ गई; हे प्रिय, हम तुम्हें दिशा-दिशा में खोज रही हैं, हमारे प्राण तुम्हीं में अटके हैं।

उसी गीत में वे कहती हैं कि तुम्हारी कथा का अमृत दुख से तपते लोगों को जीवन देता है, कवि उसकी स्तुति करते हैं, वह पाप मिटाता है और सुनने में ही मंगल है; जो उसे संसार में फैलाते हैं, वे सबसे बड़े दाता हैं।

कृष्ण का ऋण

मूल ग्रंथ में

तब कृष्ण मुस्कुराते हुए उनके बीच फिर प्रकट हुए। गोपियों ने पूछा: कुछ लोग प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं, कुछ न करने वालों से भी, और कुछ किसी से नहीं; ऐसा क्यों? कृष्ण बोले: जो बदले में प्रेम करते हैं, वह स्वार्थ है; जो बिना बदले के प्रेम करते हैं, जैसे माता-पिता, वह सच्चा धर्म और सौहार्द है। और मैं प्रेम करने वालों से भी तुरंत प्रेम नहीं जताता, ताकि उनका मन मुझमें और लगे, जैसे धन पाकर खो देने वाला निर्धन उसी की चिंता में डूबा रहता है।

फिर उन्होंने कहा: तुमने मेरे लिए लोक और वेद की मर्यादा भी छोड़ दी; तुम्हारा यह निर्दोष प्रेम ऐसा है कि देवताओं की आयु पाकर भी मैं उसका बदला नहीं चुका सकता। घर की जिन बेड़ियों को तोड़ना कठिन है, उन्हें तोड़कर तुमने मुझे भजा; तुम्हारी अपनी भलाई ही उसका बदला हो।

कुरुक्षेत्र में मिलन

मूल ग्रंथ में

बरसों बाद सूर्य-ग्रहण पर कुरुक्षेत्र में गोपियों ने कृष्ण को फिर देखा; वे उन्हें आँखों से हृदय में भरती रहीं, और पलकें बनाने वाले विधाता को कोसती रहीं कि ये देखने में बाधा डालती हैं। कृष्ण ने उन्हें एकांत में मिलकर पूछा: क्या तुम हमें याद करती हो? भगवान ही प्राणियों को मिलाते और बिछड़ाते हैं, जैसे हवा बादलों, तिनकों और रुई को। मुझमें भक्ति ही अमृतत्व देती है; सौभाग्य है कि तुम्हारा प्रेम मुझमें है, जो मुझे ही पाने का साधन है।

कृष्ण के इस आत्म-ज्ञान के उपदेश के बाद गोपियों ने कहा: हे कमलनाभ, योगेश्वर जिन चरण-कमलों का हृदय में ध्यान करते हैं, जो संसार के कुएँ में गिरे लोगों का सहारा हैं, वे चरण घर-गृहस्थी में रहते हुए भी सदा हमारे मन में बसे रहें।

भक्ति और शरणागति की सीख

प्रेम, जिसका बदला भगवान भी न चुका सकें

भागवत गोपियों को मुक्ति की नहीं, प्रेम की ऊँचाई के उदाहरण के रूप में रखता है। उनका ज्ञान शास्त्र का नहीं था, पर उद्धव जैसे ज्ञानी उनके आगे झुके, और भगवान ने ख़ुद को उनका ऋणी कहा। साथ ही भागवत यह चेतावनी भी देता है कि रास की कथा सुनकर भगवान से प्रेम सीखना है, उसकी नकल नहीं करनी; जो श्रद्धा से इसे सुनता है, उसके हृदय का काम-रोग जल्दी मिट जाता है।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

न पारयेऽहं: कृष्ण का ऋण

न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माभजन्दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥

तुम्हारा मुझसे मिलन निर्दोष है। देवताओं जितनी लंबी आयु पाकर भी मैं तुम्हारी इस भलाई का बदला नहीं चुका सकता, क्योंकि घर की जिन बेड़ियों को तोड़ना कठिन है, उन्हें तोड़कर तुमने मुझे भजा। तुम्हारी अपनी भलाई ही उसका बदला हो।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 32, श्लोक 22

गोपी गीत: कथा का अमृत

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥

तुम्हारी कथा का अमृत दुख से तपते लोगों को जीवन देता है; कवि उसकी स्तुति करते हैं, वह पापों को मिटाता है, सुनने में ही मंगल है और शोभा से भरा है। जो लोग संसार में उसे फैलाते हैं, वे सबसे बड़े दाता हैं।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 31, श्लोक 9 (गोपी गीत)

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देवता

स्रोत

वृंदावन की गोपियाँ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न