माता शबरी

मतंग वन की तपस्विनी, जिसने गुरुओं की बात पर भरोसा रखकर राम की राह देखी

संक्षेप में

शबरी पम्पा सरोवर के पास मतंग ऋषि के आश्रम की तपस्विनी थीं। गुरुओं के स्वर्ग जाते समय उनसे कहा गया था कि राम इस आश्रम में आएँगे; जब राम आए, तो शबरी ने उनके चरण छुए और वन के फल अर्पित किए। रामचरितमानस में राम उन्हें यहीं नवधा भक्ति सुनाते हैं।

श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त

एक नज़र में

माता शबरी — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण-महाभारत के भक्तवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.70.4–9; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 1 (कृष्णाचार्य सं.), आरण्यकाण्ड, सर्ग 74, पृ. 320 (scan leaf n333)
कथा किस ग्रंथ मेंवाल्मीकि रामायण, रामचरितमानसवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.70.1–27; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अरण्यकाण्ड, दोहा 33–36, पृ. 278–279 (scan leaf n290–n291)

कथा किन ग्रंथों में है

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस

शबरी की कथा वाल्मीकि रामायण के आरण्यकाण्ड में है, जहाँ कबंध राम को पम्पा सरोवर का रास्ता और शबरी का पता बताता है। रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में तुलसीदास इसी प्रसंग को विस्तार देते हैं, और राम यहीं शबरी को नवधा भक्ति सुनाते हैं।

पृष्ठभूमि

कौन थीं

वाल्मीकि शबरी को "श्रमणी" और "सिद्धा" कहते हैं: पम्पा के पश्चिमी तट पर मतंग वन में रहने वाली एक वृद्ध तपस्विनी, जो वहाँ के ऋषियों की सेवा करती थीं। उनके गुरु वे महर्षि थे, जिन्होंने इसी वन में यज्ञ किए, और जिनके तप के प्रभाव से उनकी वेदियाँ अब भी चमकती थीं।

रामचरितमानस में शबरी ख़ुद को बहुत छोटा मानती हैं: मैं किस तरह आपकी स्तुति करूँ, मैं नीची जाति की और मंदबुद्धि हूँ, स्त्रियों में भी सबसे अधम।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

शबरी की भक्ति प्रतीक्षा की है। उनके गुरु, जिनकी वे सेवा करती थीं, जिस समय राम चित्रकूट पहुँचे, उसी समय दिव्य विमानों से स्वर्ग गए, और जाते हुए कह गए: राम तुम्हारे इस पवित्र आश्रम में आएँगे; लक्ष्मण के साथ उनका अतिथि-सत्कार करना, उनके दर्शन से तुम्हें अक्षय लोक मिलेंगे। उसी बात पर भरोसा रखकर शबरी तब से राम की राह देखती रहीं।

मानस में राम के आने पर शबरी को मुनि की बात याद आई, और वे प्रेम में ऐसी डूबीं कि मुँह से बोल न निकले; बार-बार चरणों में सिर नवाती रहीं, आदर से जल लेकर चरण धोए और सुंदर आसन पर बैठाया।

प्रमुख कथाएँ

राम का आगमन

मूल ग्रंथ में

कबंध के बताए रास्ते पर राम और लक्ष्मण पम्पा सरोवर के पश्चिमी तट पहुँचे, और पेड़ों से घिरा शबरी का सुंदर आश्रम देखा। उन्हें देखते ही सिद्धा शबरी उठ खड़ी हुईं, हाथ जोड़े, और राम और लक्ष्मण के चरण छुए। राम ने पूछा: तपोधने, क्या तुम्हारे विघ्न दूर हुए, तप बढ़ रहा है, गुरुओं की सेवा सफल हुई?

शबरी ने कहा: हे पुरुषश्रेष्ठ, आपके लिए मैंने पम्पा के तट पर उगने वाले तरह-तरह के वन के फल जमा करके रखे हैं। फिर राम के कहने पर उन्होंने मतंग वन दिखाया: यहाँ मेरे गुरुओं ने यज्ञ किए, यह वेदी है, जहाँ वे काँपते हाथों से फूल चढ़ाते थे; उपवास से थके गुरु चल न पाते थे, तो उनके सोचने भर से सातों समुद्र यहाँ आ गए; उनके स्नान के बाद पेड़ों पर टाँगे वल्कल आज तक नहीं सूखे।

मानस में यही भेंट इस तरह है: शबरी ने अत्यंत रसीले कंद, मूल और फल लाकर राम को दिए, और प्रभु ने प्रेम से उन्हें खाया, बार-बार उनकी प्रशंसा करते हुए।

ग्रंथों में अंतर

जूठे बेर: शबरी के चखकर दिए बेरों की कथा लोक में बहुत प्रसिद्ध है, पर न वाल्मीकि रामायण में है, न रामचरितमानस में। वाल्मीकि में "पम्पा के तट के वन के फल" हैं, मानस में "कंद, मूल, फल"; चखने या जूठे होने की बात दोनों में नहीं। यह कथा बाद की लोक-परंपरा की है।

नवधा भक्ति

बाद के ग्रंथ में

मानस में शबरी के अपने को नीचा कहने पर राम ने कहा: हे भामिनि, सुनो, मैं केवल एक भक्ति का नाता मानता हूँ। जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, परिवार, गुण और चतुराई, इन सबके होते हुए भी भक्ति से हीन मनुष्य वैसा ही लगता है, जैसा बिना जल का बादल।

फिर राम ने उन्हें नौ प्रकार की भक्ति सुनाई: संतों का संग, प्रभु की कथा में प्रेम, अभिमान छोड़कर गुरु-चरणों की सेवा, कपट छोड़कर प्रभु के गुण गाना, दृढ़ विश्वास से मंत्र-जाप, इंद्रिय-दमन और सज्जनों का धर्म, सारे जगत को प्रभुमय देखना और संतों को प्रभु से भी बढ़कर मानना, जो मिले उसमें संतोष और दूसरों के दोष न देखना, और सरल, छल-रहित व्यवहार के साथ प्रभु का भरोसा। और कहा: इन नौ में से एक भी जिसमें हो, वह मुझे बहुत प्रिय है; तुममें तो सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है।

अग्नि में देह-त्याग

मूल ग्रंथ में

वन दिखाकर शबरी ने कहा: आपने सारा वन देख लिया, जो सुनना था सुन लिया; अब आपकी आज्ञा हो तो यह शरीर छोड़कर उन्हीं मुनियों के पास जाना चाहती हूँ, जिनकी मैं सेवा करती थी। राम ने प्रसन्न मुख से कहा: जाओ। शबरी ने अग्नि में अपनी देह की आहुति दी, और जलती अग्नि जैसी तेजस्वी होकर स्वर्ग गईं, उस पवित्र लोक में, जहाँ वे पुण्यात्मा महर्षि विहार करते हैं।

मानस में शबरी पहले राम को पम्पा सरोवर जाने और सुग्रीव से मित्रता करने की राह बताती हैं; फिर प्रभु का मुख देखते हुए, उनके चरण-कमल हृदय में रखकर, योग की अग्नि में देह छोड़ती हैं और हरि के उस पद में लीन हो जाती हैं, जहाँ से लौटना नहीं होता।

ग्रंथों में अंतर

दक्षिण भारत की प्रतियों (कृष्णाचार्य संस्करण, 1905) में यहाँ कुछ श्लोक अधिक हैं, जो समीक्षित पाठ में नहीं: राम के आने पर शबरी कहती हैं "आज मेरा जन्म सफल हुआ… आपकी सौम्य दृष्टि से मैं पवित्र हो गई"; और विदा करते हुए राम कहते हैं "तुमने भक्ति से मेरी पूजा की, अब सुख से जाओ"।

भक्ति और शरणागति की सीख

भक्ति का ही नाता

शबरी की कथा दोनों ग्रंथों में एक ही बात कहती है: राम उस तपस्विनी के आश्रम ख़ुद गए, उसके चरण-स्पर्श और फल स्वीकार किए। तुलसीदास इसे शब्द देते हैं: राम केवल भक्ति का नाता मानते हैं, जाति, कुल, धन या चतुराई का नहीं।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

आपके लिए जमा किए फल

मया तु विविधं वन्यं संचितं पुरुषर्षभ। तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसंभवम्॥

हे पुरुषश्रेष्ठ, आपके लिए मैंने पम्पा के तट पर उगने वाले तरह-तरह के वन के फल जमा करके रखे हैं।

वाल्मीकि रामायण, आरण्यकाण्ड, समीक्षित पाठ 3.70.13 (दाक्षिणात्य पाठ: सर्ग 74, श्लोक 17)

राम: मैं केवल भक्ति का नाता मानता हूँ

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥ जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिय जैसा॥

राम ने कहा: हे भामिनि, मेरी बात सुनो, मैं केवल एक भक्ति का नाता मानता हूँ। जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, परिवार, गुण और चतुराई होते हुए भी भक्ति के बिना मनुष्य वैसा ही लगता है, जैसा बिना जल का बादल।

रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 34 के बाद की चौपाई

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देवता

संत

स्रोत

माता शबरी — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न