सुतीक्ष्ण
वह मुनि, जो राम के दर्शन के लिए स्वर्ग जाना टालते रहे, और दर्शन की ख़बर पर राह भूल गए
संक्षेप में
सुतीक्ष्ण दंडकारण्य के एक तपस्वी मुनि थे। वाल्मीकि बताते हैं कि अपने तप से स्वर्ग पाकर भी वे केवल राम के दर्शन की प्रतीक्षा में धरती पर रुके रहे। रामचरितमानस में, जो उन्हें अगस्त्य का शिष्य बताता है, राम के आने की ख़बर सुनकर वे प्रेम में ऐसे डूबे कि दिशा और राह तक भूल गए।
श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.6.5; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 1 (कृष्णाचार्य सं.), आरण्यकाण्ड, पृ. 241 (scan leaf n254); सर्ग 7.5 |
| कथा किस ग्रंथ में | वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.6–3.7; 3.10.26–40; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अरण्यकाण्ड, दोहा 9–12, पृ. 263–265 (scan leaf n275–n277) |
कथा किन ग्रंथों में है
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस
सुतीक्ष्ण वाल्मीकि रामायण के आरण्यकाण्ड में दो बार आते हैं: वन में राम के पहुँचने पर, और दस बरस आश्रमों में रहने के बाद राम के लौटने पर, जब वे राम को अगस्त्य के आश्रम का रास्ता बताते हैं। रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में तुलसीदास उनके प्रेम का विस्तार से वर्णन करते हैं।
पृष्ठभूमि
कौन थे
वाल्मीकि में सुतीक्ष्ण एकांत आश्रम में रहने वाले, मैल और जटाओं वाले वृद्ध तपस्वी हैं। राम कहते हैं कि शरभंग और गौतम ने उन्हें बताया था कि आप सब जगह कुशल और सब प्राणियों के हित में लगे हैं।
रामचरितमानस उन्हें अगस्त्य मुनि का चतुर शिष्य बताता है, जो मन, कर्म और वचन से राम के चरणों के सेवक थे, और सपने में भी किसी और देवता का भरोसा नहीं रखते थे।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
वाल्मीकि में सुतीक्ष्ण ने राम को गले लगाकर कहा: आपके आने से यह आश्रम सनाथ हो गया। मैं आपकी ही प्रतीक्षा में यह देह छोड़कर देवलोक नहीं गया। मैंने अपने पुण्य से जो लोक जीते हैं, उनमें आप सीता और लक्ष्मण के साथ विहार करें। राम ने कहा: वे लोक मैं ख़ुद जीतूँगा; मुझे तो इस वन में बस रहने की जगह बताइए।
प्रमुख कथाएँ
प्रेम में राह भूलना
बाद के ग्रंथ मेंरामचरितमानस में प्रभु के आने की ख़बर सुनकर सुतीक्ष्ण मन में तरह-तरह के मनोरथ करते हुए आतुर होकर दौड़ पड़े: हे विधाता, क्या दीनबंधु रघुनाथ मुझ जैसे मूर्ख पर भी दया करेंगे? मेरे मन में न दृढ़ भरोसा है, न भक्ति, वैराग्य या ज्ञान; न सत्संग, न योग, न जप। पर करुणानिधान का एक स्वभाव है: जिसकी कोई और गति नहीं, वह उन्हें प्रिय है।
तुलसीदास कहते हैं कि उस ज्ञानी मुनि की प्रेम में डूबी दशा कहते नहीं बनती: दिशाएँ और राह सूझना बंद हो गया, "मैं कौन हूँ, कहाँ जा रहा हूँ" यह भी पता न रहा; कभी लौटकर पीछे जाते, कभी गुण गाते हुए नाचने लगते। प्रभु पेड़ की ओट में छिपकर यह देखते रहे। फिर मुनि रास्ते के बीच ध्यान में ऐसे अचल बैठ गए, जैसे कटहल का फल, रोम-रोम पुलकित।
राम ने पास आकर बहुत तरह से जगाया, पर ध्यान के सुख में डूबे मुनि नहीं जागे। तब राम ने अपना राजा वाला रूप छिपाकर उनके हृदय में चतुर्भुज रूप दिखाया; वह रूप हटते ही मुनि ऐसे व्याकुल होकर उठे, जैसे मणि खो देने पर साँप। सामने सीता और लक्ष्मण के साथ श्याम-शरीर राम को देखा, तो लाठी की तरह उनके चरणों पर गिर पड़े, और राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया।
वर न माँगना
बाद के ग्रंथ मेंमुनि ने राम की स्तुति की और कहा: यह अभिमान भूलकर भी न जाए कि मैं सेवक हूँ और रघुपति मेरे स्वामी हैं। प्रसन्न होकर राम ने कहा: जो वर माँगो, दूँगा। मुनि बोले: मैंने कभी वर नहीं माँगा, मुझे समझ नहीं आता कि क्या झूठा है, क्या सच्चा; हे रघुनाथ, जो आपको अच्छा लगे, वही इस दास को दीजिए।
राम ने उन्हें अविरल भक्ति, वैराग्य और ज्ञान का वर दिया। तब मुनि ने कहा: प्रभु ने जो दिया, वह मैंने पाया; अब वह दीजिए, जो मुझे भाता है: सीता और लक्ष्मण के साथ धनुष-बाण धारण किए आप मेरे हृदय-आकाश में चंद्रमा की तरह सदा बसे रहें।
फिर वे यह कहकर राम के साथ हो लिए कि बहुत दिन से गुरु के दर्शन नहीं किए; और राम, उनकी चतुराई समझकर, दोनों भाई उन्हें साथ ले गए। अगस्त्य के आश्रम पहुँचकर सुतीक्ष्ण ने ही दंडवत करके गुरु को बताया कि कोसलाधीश के कुमार, जिन्हें आप दिन-रात जपते हैं, मिलने आए हैं।
अगस्त्य का मार्ग
मूल ग्रंथ मेंवाल्मीकि में राम दस बरस तक दंडकारण्य के मुनियों के आश्रमों में कहीं महीनों, कहीं साल भर रहे, और फिर सुतीक्ष्ण के आश्रम लौटे। राम ने पूछा कि महर्षि अगस्त्य का आश्रम कहाँ है, उनकी सेवा करने की बड़ी इच्छा है। सुतीक्ष्ण बोले: मैं भी यही कहना चाहता था; और उन्होंने रास्ता बताया: यहाँ से चार योजन दक्षिण में अगस्त्य के भाई का आश्रम है, और वहाँ से एक योजन आगे अगस्त्य का।
भक्ति और शरणागति की सीख
प्रतीक्षा और प्रेम
वाल्मीकि के सुतीक्ष्ण के लिए राम का दर्शन स्वर्ग से बड़ा था; उसके लिए उन्होंने अपने पुण्य से जीते लोक भी प्रतीक्षा में छोड़ रखे थे। तुलसीदास इसी भक्ति को आगे ले जाते हैं: भक्त वर नहीं माँगता, भगवान को ही हृदय में बसाना माँगता है।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
आपकी ही प्रतीक्षा में
प्रतीक्षमाणस्त्वामेव नारोहेऽहं महायशः।
देवलोकमितो वीर देहं त्यक्त्वा महीतले॥हे महायशस्वी वीर, मैं आपकी ही प्रतीक्षा करता रहा, इसलिए यह देह धरती पर छोड़कर यहाँ से देवलोक नहीं गया।
मानस: प्रेम में डूबे मुनि
निर्भर प्रेम मगन मुनि ज्ञानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥शिव पार्वती से कहते हैं: हे भवानी, वह ज्ञानी मुनि प्रेम में पूरी तरह डूब गए; उनकी उस दशा का वर्णन नहीं हो सकता। दिशाएँ और राह सूझना बंद हो गया; मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ, यह भी समझ न रहा।
VedikMARG पर आगे पढ़ें
देवता
- श्री राम — भगवान राम के पाठ और आरती
संत
- गोस्वामी तुलसीदास — जिनके रामचरितमानस में सुतीक्ष्ण के प्रेम का वर्णन है
ऋषि
- महर्षि अगस्त्य — जिनके आश्रम का मार्ग सुतीक्ष्ण ने राम को बताया; मानस में सुतीक्ष्ण के गुरु
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · 3.6–3.7; 3.10.20–40
- Srimad Valmiki Ramayana, According to the Southern Readings, with footnotes, vol. I (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा काण्ड) — T. R. Krishnacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1905) · आरण्यकाण्ड, सर्ग 7–8, पृ. 241–242 (scan leaf n254–n255)
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · अरण्यकाण्ड, दोहा 9–12, पृ. 263–265 (scan leaf n275–n277)
