जटायु

बूढ़ा गृध्रराज, जिसने सीता को बचाने के लिए रावण से लड़कर प्राण दिए

संक्षेप में

जटायु गृध्रों के राजा और राम के पिता दशरथ के मित्र थे। रावण जब सीता को ले जा रहा था, तो बूढ़े जटायु ने उसे ललकारा, उसका रथ तोड़ दिया, और लड़ते हुए उसकी तलवार से घायल होकर गिरे। राम को सीता का समाचार देकर उन्होंने प्राण त्यागे, और राम ने उनका अंतिम संस्कार अपने पिता की तरह किया।

श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त

एक नज़र में

जटायु — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण-महाभारत के भक्तवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.13.33; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 1 (कृष्णाचार्य सं.), आरण्यकाण्ड, सर्ग 68, पृ. 312 (scan leaf n325)
कथा किस ग्रंथ मेंवाल्मीकि रामायण, रामचरितमानसवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.13; 3.48–3.49; 3.63–3.64; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अरण्यकाण्ड, दोहा 29–32, पृ. 276–277 (scan leaf n288–n289)

कथा किन ग्रंथों में है

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस

जटायु वाल्मीकि रामायण के आरण्यकाण्ड में तीन जगह आते हैं: पंचवटी जाते हुए राम से पहली भेंट में, सीता-हरण के समय रावण से युद्ध में, और घायल अवस्था में राम से अंतिम मिलन में। रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में तुलसीदास इसी अंतिम मिलन को विस्तार देते हैं।

पृष्ठभूमि

कौन थे

पंचवटी जाते हुए राम-लक्ष्मण को एक विशाल गृध्र मिला; उन्होंने उसे राक्षस समझकर पूछा कि तुम कौन हो। उसने मीठी वाणी में कहा: वत्स, मुझे अपने पिता का मित्र जानो। फिर अपना वंश बताया: विनता के पुत्र अरुण से मैं जन्मा, संपाति मेरे बड़े भाई हैं, मेरा नाम जटायु है। और कहा: यदि चाहो तो मैं तुम्हारे वनवास में साथ रहूँगा, और तुम दोनों बाहर जाओ तो सीता की रक्षा करूँगा।

राम ने पिता के मित्र को पहचानकर उनका सत्कार किया, प्रसन्न होकर गले लगाया, और जटायु से पिता के साथ उनकी मित्रता की बातें बार-बार सुनीं।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

जटायु ने रावण से कहा था कि राम सारे लोक के राजा और धर्मात्मा हैं; उनकी पत्नी को छूना पाप है। उनकी निष्ठा राम के कर्तव्य से जुड़ी थी: बूढ़े और थके होने पर भी, बाणों से घायल होकर भी, वे रथ में आँसू बहाती सीता को देखकर बार-बार रावण पर टूटते रहे।

रामचरितमानस में मरते जटायु के सामने राम ने कहा कि शरीर रख लो, तो जटायु ने उत्तर दिया: जिनका नाम मरते समय मुँह में आ जाए तो अधम भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं, वही आप मेरी आँखों के सामने हैं; अब किस कमी के लिए देह रखूँ? और अंत में उन्होंने राम से अविरल भक्ति का वर माँगा।

प्रमुख कथाएँ

रावण से युद्ध

मूल ग्रंथ में

सीता की पुकार सुनकर पेड़ पर सोए जटायु जागे, और रावण से बोले: दशग्रीव, मैं धर्म में स्थित गृध्रराज जटायु हूँ। ये सीता लोकनाथ राम की धर्मपत्नी हैं। धर्म में स्थित राजा पराई स्त्री को कैसे छू सकता है? जैसे अपनी पत्नी की, वैसे ही दूसरों की पत्नी की भी रक्षा करनी चाहिए; यह नीच विचार छोड़ दो।

रावण उन पर टूट पड़ा, और दोनों का भयानक युद्ध हुआ, जैसे पंखों वाले दो पर्वत लड़ रहे हों। रावण के बाणों से घायल होकर भी जटायु ने अपने पंजों से उसका धनुष तोड़ दिया, उसके गधे, सारथी और रथ नष्ट कर दिए; रावण सीता को गोद में लिए धरती पर गिर पड़ा, और सब प्राणी "साधु, साधु" कहकर जटायु की प्रशंसा करने लगे।

पर जटायु बूढ़े थे और थक गए थे; रावण सीता को लेकर फिर आकाश में उड़ा। जटायु ने उसे ललकारा: तुम विष को पानी की तरह पी रहे हो; यह चोरों का रास्ता है, वीरों का नहीं; वीर हो तो रुककर लड़ो! और वे उसकी पीठ पर झपटकर नखों और चोंच से उसे घायल करने लगे। अंत में रावण ने तलवार से उनके पंख, पैर और बगलें काट दीं, और राम के लिए लड़ते जटायु धरती पर गिर पड़े। सीता उनकी ओर अपने बंधु की तरह दुखी होकर दौड़ीं।

राम से अंतिम मिलन

मूल ग्रंथ में

सीता को खोजते हुए राम ने पर्वत की चोटी जैसे विशाल, खून से भीगे जटायु को गिरा देखा, और क्रोध में सोचा कि यही राक्षस सीता को खा गया है। तब जटायु ने खून की उलटी करते हुए दीन वाणी में कहा: जिन्हें तुम वन में जड़ी-बूटी की तरह खोज रहे हो, उन देवी को और मेरे प्राण, दोनों को रावण ने हर लिया। मैंने उसका रथ और धनुष तोड़ा, पर थके हुए मेरे पंख उसने काट दिए; राक्षस का मारा हूँ, मुझे मत मारो।

राम ने उन्हें गले लगाया और लक्ष्मण के साथ रो पड़े। जटायु ने टूटती आवाज़ में बताया कि रावण सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है, कि वह विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है, और राम को ढाढ़स दिया कि शत्रु को मारकर तुम जल्दी सीता को पाओगे। फिर "बोलो, बोलो" कहते, हाथ जोड़े राम के सामने उनके प्राण निकल गए।

राम ने लक्ष्मण से कहा: यह पक्षी अपने पुरखों का राज्य छोड़कर मेरे लिए मरा है; मुझे सीता-हरण का दुख उतना नहीं, जितना मेरे कारण इसकी मृत्यु का। जैसे राजा दशरथ मेरे लिए पूज्य थे, वैसे ही यह भी। फिर उन्होंने चिता बनाकर जटायु का दाह-संस्कार अपने बंधु की तरह किया, कहा कि जाओ, यज्ञ करने वालों और भूमि-दान करने वालों को जो उत्तम लोक मिलते हैं, वे तुम्हें मिलें, और गोदावरी जाकर उनके लिए जल-दान किया।

रामचरितमानस में जटायु

बाद के ग्रंथ में

मानस में राम ने गिरे हुए गृध्रराज के सिर पर अपना कर-कमल रखा, और उनकी सारी पीड़ा मिट गई। जटायु ने बताया कि रावण सीता को दक्षिण की ओर ले गया है, और कि वे केवल प्रभु के दर्शन के लिए प्राण रोके हुए थे। राम ने आँसू भरी आँखों से कहा: तुमने अपने कर्मों से उत्तम गति पाई; जिनके मन में दूसरों का हित बसता है, उनके लिए जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं। शरीर छोड़कर मेरे धाम जाओ।

राम ने यह भी कहा: पिताजी से सीता-हरण की बात मत कहना; मैं राम हूँ, तो रावण ख़ुद कुल सहित वहाँ जाकर कहेगा। जटायु ने गृध्र-देह छोड़कर हरि का चतुर्भुज, पीताम्बर वाला रूप पाया, आँसू भरी आँखों से स्तुति की, अविरल भक्ति का वर माँगा और हरि-धाम गए; और राम ने अपने हाथों उनकी क्रिया की। तुलसीदास कहते हैं: मांस खाने वाले अधम पक्षी को भी प्रभु ने वह गति दी, जो योगी माँगते हैं।

भक्ति और शरणागति की सीख

धर्म के लिए अंतिम साँस तक

राम ख़ुद जटायु के बारे में कहते हैं: धर्म पर चलने वाले, शूरवीर और शरण देने वाले साधु हर जगह मिलते हैं, पशु-पक्षियों की योनि में भी। जटायु ने जीत की उम्मीद के बिना, केवल धर्म और राम के लिए लड़ाई लड़ी; इसीलिए राम ने उन्हें पिता जैसा सम्मान दिया।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

राम: यह पिता दशरथ जैसे पूज्य हैं

राजा दशरथः श्रीमान्यथा मम महायशाः। पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः॥

जैसे यशस्वी राजा दशरथ मेरे लिए पूज्य और माननीय थे, वैसे ही ये पक्षियों के राजा भी हैं।

वाल्मीकि रामायण, आरण्यकाण्ड, समीक्षित पाठ 3.64.26 (दाक्षिणात्य पाठ: सर्ग 68, श्लोक 26)

मानस: परहित वाले के लिए कुछ दुर्लभ नहीं

जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात करम निज तें गति पाई॥ परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

आँखों में आँसू भरकर राम ने कहा: हे तात, तुमने अपने ही कर्मों से उत्तम गति पाई है। जिनके मन में दूसरों का हित बसता है, उनके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं।

रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 30 के बाद की चौपाई

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देवता

स्रोत

जटायु — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न