नंद बाबा
व्रज के राजा, जिनके आँगन में भगवान बेटा बनकर पले, और जिनका मन उम्र भर उन्हीं में रहा
संक्षेप में
नंद बाबा व्रज के गोपों के राजा और माता यशोदा के पति थे, जिनके घर श्रीकृष्ण पले। भागवत के अनुसार पिछले जन्म में वे वसु द्रोण थे, जिन्होंने भगवान में परम भक्ति माँगी थी। कृष्ण ने उन्हें वरुण-लोक से और एक अजगर से छुड़ाया, और मथुरा जाकर भी उन्हें "पिता" कहकर याद किया।
श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.5.1; 10.8.50; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 19 (scan leaf n116) |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.5; 10.28; 10.34; 10.45–10.47 |
| पत्नी | यशोदा | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.9.1; 10.8.50; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 19 (scan leaf n116) |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कंध
नंद का वर्णन श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में बार-बार है: कृष्ण के जन्मोत्सव (अध्याय 5), वरुण-लोक (अध्याय 28), अजगर से मुक्ति (अध्याय 34), मथुरा से विदाई (अध्याय 45) और उद्धव के व्रज आने (अध्याय 46–47) के प्रसंगों में।
पृष्ठभूमि
कौन थे
नंद व्रज के गोपों के राजा थे, और यशोदा उनकी पत्नी। भागवत वसुदेव को उनका "भाई" कहता है, और नंद वसुदेव को "हमारा सखा"। कृष्ण के जन्म के बाद नंद कंस को सालाना कर देने मथुरा गए, तो वसुदेव ख़ुद उनसे मिलने आए।
भागवत बताता है कि पिछले जन्म में नंद वसुओं में श्रेष्ठ द्रोण थे, और यशोदा उनकी पत्नी धरा। उन्होंने ब्रह्मा से माँगा था कि धरती पर जन्म लें तो भगवान हरि में परम भक्ति हो; ब्रह्मा ने "ऐसा ही हो" कहा, और वही द्रोण व्रज में नंद नाम से जन्मे।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
नंद की भक्ति पिता के प्रेम की थी। कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद उद्धव से उन्होंने पूछा: क्या कृष्ण कभी हमें, अपनी माँ को, सखाओं को, गायों को, वृंदावन और गोवर्धन को याद करता है? क्या वह एक बार भी हमें देखने आएगा? उसकी लीलाएँ, उसकी चितवन, हँसी और बातें याद आती हैं, तो हमारे सारे काम ढीले पड़ जाते हैं। यह कहते-कहते वे प्रेम में विह्वल होकर चुप हो गए।
उन्हें यह भी आभास था कि कृष्ण और बलराम कोई साधारण बालक नहीं; उन्होंने उद्धव से कहा कि गर्ग ऋषि के कहे अनुसार ये दोनों देवताओं के बड़े काम के लिए यहाँ आए श्रेष्ठ देव हैं। फिर भी उनका मन पुत्र-प्रेम में ही डूबा रहा।
प्रमुख कथाएँ
नंद का जन्मोत्सव
मूल ग्रंथ मेंपुत्र-जन्म की ख़बर पर उदार नंद ने स्नान करके वेद जानने वाले ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन और बालक का जातकर्म कराया, पितरों और देवताओं की पूजा की, और ब्राह्मणों को सजी हुई गायें और रत्न-वस्त्रों से ढके तिल के ढेर दान किए।
सारा व्रज सजा, गाय-बछड़ों को हल्दी-तेल से रँगा गया, गोप भेंटें लेकर आए, गोपियाँ बालक को "चिरंजीव हो" का आशीर्वाद देने दौड़ीं, और गोपों ने एक-दूसरे पर दही, दूध, घी और माखन उछाला। नंद ने सबको वस्त्र, गहने और गायें दीं; भागवत कहता है कि भगवान विष्णु की आराधना और अपने बेटे के कल्याण के लिए।
वरुण-लोक से वापसी
मूल ग्रंथ मेंएक बार नंद ने एकादशी का निराहार व्रत रखकर भगवान जनार्दन की पूजा की, और द्वादशी को स्नान के लिए यमुना में उतरे। रात का असुरों वाला समय था; वरुण का एक असुर सेवक उन्हें पकड़कर वरुण के पास ले गया।
गोप "कृष्ण, राम!" पुकारने लगे, और कृष्ण पिता को छुड़ाने वरुण-लोक पहुँचे। वरुण ने बड़े आदर से उनकी पूजा करके कहा: मेरे अनजान, मूर्ख सेवक ने आपके पिता को पकड़ लिया, क्षमा कीजिए; अपने पिता को ले जाइए। कृष्ण पिता को लेकर लौटे, और वरुण-लोक का वैभव और लोकपाल का कृष्ण के आगे झुकना देखकर चकित नंद ने यह सब अपने बंधुओं को बताया।
अजगर से मुक्ति
मूल ग्रंथ मेंएक बार गोप अंबिका-वन की यात्रा पर गए, सरस्वती नदी में स्नान करके भगवान पशुपति और देवी अंबिका की पूजा की, और व्रत रखकर वहीं नदी किनारे रात बिताई। रात में एक भूखे अजगर ने सोते नंद को निगलना शुरू किया। नंद पुकार उठे: कृष्ण, कृष्ण, बेटा, यह बड़ा साँप मुझे निगल रहा है, मैं तुम्हारी शरण हूँ, मुझे बचाओ!
गोपों ने जलती लकड़ियों से साँप को मारा, पर उसने नंद को नहीं छोड़ा। तब कृष्ण ने आकर उसे पैर से छुआ, और वह साँप की देह छोड़कर एक दिव्य पुरुष बन गया। उसने बताया कि वह सुदर्शन नाम का विद्याधर था, जिसे रूप के घमंड में अंगिरस ऋषियों का उपहास करने पर यह योनि मिली थी; और प्रभु के चरण छूने से वह शाप से छूटकर स्वर्ग चला गया।
मथुरा से विदाई
मूल ग्रंथ मेंकंस-वध के बाद कृष्ण और बलराम ने नंद को गले लगाकर कहा: पिताजी, आप दोनों ने हमें बड़े स्नेह से पाला-पोसा। सच्चे माता-पिता वही हैं, जो अपनों के छोड़े बच्चों को अपने बेटे जैसा पालें। अब आप व्रज जाइए; यहाँ अपनों को सुख देकर हम आप सबको देखने आएँगे। नंद ने दोनों को गले लगाया और आँसू भरी आँखों से गोपों के साथ व्रज लौट गए।
बाद में जब उद्धव व्रज से लौटने लगे, तो नंद और गोपों ने आँसू भरी आँखों से भेंटें देकर कहा: हमारे मन की वृत्तियाँ कृष्ण के चरणों में लगी रहें, वाणी उनके नाम लेती रहे, शरीर उन्हें प्रणाम करता रहे; और कर्मों से जहाँ भी जन्म लें, कृष्ण में प्रीति बनी रहे।
भक्ति और शरणागति की सीख
जो माँगा, वही मिला
पिछले जन्म में द्रोण के रूप में नंद ने भगवान में परम भक्ति माँगी थी; इस जन्म में भगवान उनके बेटे बनकर रहे। और बिछड़ने के बाद भी उन्होंने मुक्ति या वैभव नहीं, केवल यह माँगा कि जहाँ भी जन्म लें, कृष्ण में प्रीति बनी रहे।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
मन, वाणी और शरीर कृष्ण में
मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः।
वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु॥हमारे मन की सब वृत्तियाँ कृष्ण के चरण-कमलों में टिकी रहें, वाणी उनके नामों का उच्चारण करे, और शरीर उन्हें प्रणाम करने जैसे कामों में लगा रहे।
जहाँ भी जन्म लें
कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्वरेच्छया।
मङ्गलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्वरे॥अपने कर्मों से भटकते हुए, भगवान की इच्छा से हम जहाँ कहीं भी जन्म लें, हमारे शुभ कर्मों और दान का फल यही हो कि भगवान कृष्ण में हमारी प्रीति बनी रहे।
संबंधित भक्त
- यशोदा — पत्नी
VedikMARG पर आगे पढ़ें
देवता
- श्री कृष्ण — श्रीकृष्ण के पाठ और तीर्थ
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 10.5; 10.8.48–52; 10.28.1–11; 10.34.1–19; 10.45.20–25; 10.46.15–29; 10.47.64–67
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 10, पृ. 19, 95–96 (scan leaf n116, n192–n193)
