रन्तिदेव

अड़तालीस दिन भूखे-प्यासे राजा, जिन्होंने आख़िरी घूँट पानी भी प्यासे को दे दिया

संक्षेप में

रन्तिदेव भरत के वंश में संकृति के पुत्र, एक राजा थे, जो कुछ भी मिलता, बाँट देते थे। अड़तालीस दिन भूखे-प्यासे रहने के बाद जब भोजन और पानी मिला, तो उन्होंने वह भी एक-एक कर आए अतिथियों को दे दिया, और प्यास से मरते हुए भी आख़िरी पानी एक प्यासे को पिला दिया।

भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

रन्तिदेव — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 9.21.2; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 9, पृ. 36 (scan leaf n87)
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 9.21.1–18

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत, नौवाँ स्कंध

रन्तिदेव की कथा श्रीमद्भागवत के नौवें स्कंध के इक्कीसवें अध्याय में है, भरत के वंश के वर्णन के बीच। शुकदेव कहते हैं कि रन्तिदेव का यश इस लोक में भी गाया जाता है और परलोक में भी।

पृष्ठभूमि

कौन थे

रन्तिदेव राजा संकृति के पुत्र थे, भरत के वंश में। वे कुछ जोड़कर नहीं रखते थे; बिना माँगे जो मिल जाता, वह भी दे देते थे। इसलिए अपने परिवार सहित वे अकिंचन, यानी बिल्कुल ख़ाली हाथ थे, और कष्ट में भी धीर बने रहते थे।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

रन्तिदेव की भक्ति हर प्राणी में भगवान को देखने में थी। भागवत कहता है कि भोजन बाँटते हुए वे "सब जगह हरि को देख रहे थे", और हर अतिथि को हरि का स्मरण करते हुए देते थे।

जब तीनों लोकों के स्वामी उनके सामने प्रकट हुए, तब भी उन्होंने उनसे कुछ नहीं माँगा। उन्हें प्रणाम किया, और बिना किसी आसक्ति या इच्छा के अपना मन भक्ति से भगवान वासुदेव में लगा दिया।

प्रमुख कथाएँ

अड़तालीस दिन और आख़िरी घूँट

मूल ग्रंथ में

एक बार रन्तिदेव और उनके परिवार के अड़तालीस दिन बिना कुछ खाए-पिए बीत गए। उनचासवें दिन सुबह घी, खीर, संयाव (एक पकवान) और पानी मिला। परिवार भूख-प्यास से काँप रहा था, और वे खाने बैठे ही थे कि एक ब्राह्मण अतिथि आ गया।

रन्तिदेव ने आदर और श्रद्धा से अपने अन्न में से उसे भाग दिया; वह खाकर चला गया। फिर जो बचा, उसे बाँटकर खाने बैठे, तो एक शूद्र अतिथि आया; हरि का स्मरण करते हुए उसे भी भाग दिया। उसके जाने पर कुत्तों से घिरा एक और अतिथि आया: राजन, मुझे और मेरे साथियों को भूख लगी है, अन्न दीजिए। रन्तिदेव ने जो बचा था, वह सब आदर से उसे दे दिया, और कुत्तों और उनके स्वामी को प्रणाम किया।

अब केवल इतना पानी बचा था कि एक आदमी की प्यास बुझ सके। रन्तिदेव पीने ही वाले थे कि एक पुल्कस, जिसे समाज सबसे नीचा मानता था, आकर बोला: मैं अभागा हूँ, मुझे पानी दो। उसकी थकी, दुख भरी आवाज़ सुनकर रन्तिदेव करुणा से भर उठे।

उन्होंने कहा: मैं भगवान से न आठों सिद्धियों वाली ऊँची गति चाहता हूँ, न मोक्ष; मैं तो सब प्राणियों के भीतर बैठकर उनका दुख ख़ुद भोगना चाहता हूँ, ताकि वे दुखी न रहें। जीना चाहते इस दीन प्राणी को पानी देने से मेरी भूख, प्यास, थकान, बेचैनी, दीनता, शोक, विषाद और मोह, सब मिट गए। और प्यास से मरते हुए भी उन्होंने वह पानी उसे पिला दिया।

तब भागवत बताता है कि वे अतिथि भगवान विष्णु की रची माया थे; फल चाहने वालों को फल देने वाले तीनों लोकों के स्वामी उनके सामने अपने रूप में प्रकट हुए। रन्तिदेव ने उनसे कुछ नहीं माँगा, बस प्रणाम किया। भगवान पर ही टिके उनके मन के आगे गुणों वाली माया सपने की तरह मिट गई।

भक्ति और शरणागति की सीख

दूसरों का दुख अपना

रन्तिदेव की प्रार्थना भक्ति की एक अनोखी ऊँचाई दिखाती है: वे अपने लिए मोक्ष भी नहीं, दूसरों का दुख माँगते हैं। उनकी सेवा में ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं था; ब्राह्मण, शूद्र, कुत्तों वाला अतिथि और पुल्कस, सबको उन्होंने एक जैसे आदर से दिया, क्योंकि सबमें हरि को देखते थे।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

न कामयेऽहं: रन्तिदेव की प्रार्थना

न कामयेऽहं गतिमीश्वरात्परा- मष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा। आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजा- मन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः॥

मैं भगवान से आठों सिद्धियों वाली ऊँची गति नहीं चाहता, न जन्म-मरण से छुटकारा। मैं तो सब देहधारियों के भीतर रहकर उनका दुख अपने ऊपर ले लूँ, जिससे वे दुख से मुक्त हो जाएँ।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 9, अध्याय 21, श्लोक 12

पानी देने का सुख

क्षुत्तृट्श्रमो गात्रपरिभ्रमश्च दैन्यं क्लमः शोकविषादमोहाः। सर्वे निवृत्ताः कृपणस्य जन्तो- र्जिजीविषोर्जीवजलार्पणान्मे॥

जीना चाहते इस दीन प्राणी को जीवन देने वाला जल देकर मेरी भूख, प्यास, थकान, शरीर का चक्कर, दीनता, क्लान्ति, शोक, विषाद और मोह, सब मिट गए।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 9, अध्याय 21, श्लोक 13

परंपरा में स्थान

भागवत कहता है कि रन्तिदेव के संग के प्रभाव से उनके साथ रहने वाले सब लोग भी नारायण-परायण योगी बन गए।

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देवता

स्रोत

रन्तिदेव — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न