कन्नप्प नायनार

शिकारी सरदार, जिसने वेद-विधि जाने बिना शिव की पूजा की और भगवान की आँख के लिए अपनी आँख दे दी

संक्षेप में

कन्नप्प नायनार शिकारियों के सरदार थे, जिनका असली नाम तिण्णन था। कालहस्ती के पर्वत पर शिवलिंग देखते ही वे उसी के हो गए। मुँह में नदी का पानी, बालों के जंगली फूल और चखा हुआ मांस, यही उनकी पूजा थी। जब लिंग की आँख से खून बहा, तो उन्होंने बिना सोचे अपनी आँख निकालकर लगा दी।

भगवान शिव के भक्तभक्त-चरित ग्रंथों के भक्त

एक नज़र में

कन्नप्प नायनार — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीभक्त-चरित ग्रंथों के भक्तपेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), पृ. 5; Pope, The Tiruvacagam (1900), "The Legend of Kannappa Nayanar", पृ. 141
कथा किस ग्रंथ मेंपेरिय पुराणम्पेरिय पुराणम्, सर्ग 3, मूल तमिल (Project Madurai), सर्ग 3.3, पद 650–835; पेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), पृ. 5

कथा किन ग्रंथों में है

पेरिय पुराणम् और उससे पहले के संत

कन्नप्प की पूरी कथा संत सेक्किऴार के तमिल ग्रंथ पेरिय पुराणम् में है, जो 63 नायनारों (शिव-भक्त संतों) का चरित है। अनुवादक नल्लस्वामी पिल्लै लिखते हैं कि इस पूरे पुराण में नंदनार और कन्नप्प की कथाएँ सबसे लोकप्रिय कथाओं में हैं।

उनका नाम पेरिय पुराणम् से पहले के शैव संतों की वाणी में भी है। सुंदरर अपने एक पद में कहते हैं कि कण्णप्पन् जैसे भक्तों की भूल को भी शिव ठीक मान लेते हैं, और माणिक्कवाचकर तिरुवाचकम् में कहते हैं: मुझमें कन्नप्प जैसा प्रेम नहीं था, फिर भी उन्होंने मुझे अपना लिया।

पृष्ठभूमि

शिकारियों का राजकुमार

कालहस्ती के पास के पहाड़ी इलाके में उडुप्पूर नाम का गाँव था, जहाँ शिकारियों के सरदार नागन राज करते थे। संतान न होने पर उन्होंने और उनकी पत्नी तत्तै ने पहाड़ों के देवता मुरुगन (सुब्रह्मण्य) से प्रार्थना की, और उन्हें बेटा हुआ। पिता ने बालक को उठाने में भारी-भरकम पाया, और उसका नाम तिण्णन (मज़बूत) रखा।

तिण्णन को अक्षर-ज्ञान नहीं, धनुर्विद्या सिखाई गई, और वे जल्दी ही कुशल शिकारी बन गए। बूढ़े नागन ने शिकार का नेतृत्व बेटे को सौंप दिया।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

तिण्णन ने कोई मंत्र, विधि या शास्त्र नहीं सीखा था। उन्होंने भगवान को अपने जैसा समझा: जंगल में अकेले, जंगली जानवरों के बीच, जिन्हें खाना खिलाना और रात भर पहरा देना ज़रूरी है। उनकी पूजा उनके अपने जीवन की चीज़ों से थी, और भगवान ने इसी को स्वीकार किया: उसका सारा ज्ञान मुझे जानने में है, उसका हर काम मुझे प्रिय है।

प्रमुख कथाएँ

कालहस्ती का पर्वत

मूल ग्रंथ में

एक दिन जाल तोड़कर भागे एक बड़े जंगली सूअर का पीछा करते हुए तिण्णन अपने दो साथियों के साथ दूर निकल गए, और थककर गिरे सूअर को मार डाला। पेरिय पुराणम् में दोनों साथियों के नाम नाणन और काडन हैं। पानी की तलाश में आगे बढ़े, तो कालहस्ती का पर्वत दिखा, और नाणन ने बताया कि उसकी चोटी पर कुडुमित्-तेवर (शिव) हैं; पास ही पोन्-मुगलि नदी बहती थी।

तिण्णन बोले: जैसे-जैसे मैं पर्वत की ओर बढ़ रहा हूँ, मेरा बोझ हल्का होता जा रहा है; यहाँ कोई अद्भुत शक्ति है। नदी किनारे साथियों को आग जलाने को कहकर वे ऊपर दौड़े, और शिवलिंग देखते ही उनका पूरा स्वभाव बदल गया। जैसे बरसों बाद लौटे बेटे को माँ दौड़कर गले लगाती है, वैसे ही उन्होंने लिंग को गले लगाया, चूमा, और आँसुओं में बोले: अहा, यह देवता मुझ दास को मिल गए!

शिकारी की पूजा

मूल ग्रंथ में

लिंग पर ताज़ा पानी और पत्ते देखकर उन्होंने पूछा कि यह किसने किया। साथी ने बताया कि बरसों पहले उनके पिता के साथ आने पर उसने एक ब्राह्मण को यहाँ पानी चढ़ाते, पत्ते रखते और मंत्र बोलते देखा था। तिण्णन ने सोचा: यहाँ भगवान को खाना देने वाला कोई नहीं, और मैं इन्हें अकेला भी नहीं छोड़ सकता। बार-बार लौटकर देखते हुए, अंत में वे मांस लेने नीचे गए।

उन्होंने सूअर के सबसे कोमल टुकड़े तीर की नोक पर भूने, चखकर देखा कि स्वादिष्ट हैं, और सबसे अच्छे टुकड़े पत्तों के दोने में रखे। साथियों ने समझा कि सरदार पागल हो गया, और घर ख़बर देने चले गए। तिण्णन नदी पार करते हुए मुँह में पानी भर लाए, उसी से लिंग का अभिषेक किया, अपने बालों से जंगली फूल निकालकर चढ़ाए, और मांस रखकर बोले: स्वामी, आपके लिए सबसे अच्छे टुकड़े चुनकर, आग पर भूनकर और चखकर लाया हूँ; स्वीकार कीजिए। फिर रात भर धनुष पर तीर चढ़ाए पहरा देते रहे, और सुबह भगवान के भोजन के लिए शिकार पर निकल गए।

पुजारी की व्यथा, शिव का उत्तर

मूल ग्रंथ में

हर सुबह लिंग के पुजारी, विद्वान और तपस्वी ब्राह्मण शिवगोचरियार, स्नान करके पवित्र जल, फूल और पत्ते लेकर आते, और मांस, हड्डियाँ और जंगली फूल बिखरे देखकर काँप उठते। वे रोते, सफ़ाई करते, विधि से पूजा करके लौट जाते; और शाम को तिण्णन फिर अपनी पूजा करते। एक ही लिंग के दो इतने अलग सेवक, बारी-बारी से।

नाणन और काडन ने नागन को ख़बर दी; पिता कबीले की देवी-आविष्ट स्त्री को लेकर आए, सब उपाय किए, पर तिण्णन लौटे नहीं, और वे हारकर चले गए। उधर शिवगोचरियार ने शिव से विनती की, और उसी रात शिव ने उन्हें सपने में कहा: जिसकी तुम शिकायत करते हो, वही मुझे सबसे प्रिय है। वह वेद और विधि नहीं जानता, पर उसके काम के पीछे के भाव को देखो। उसके जूते का स्पर्श मुझे बालक (मुरुगन) के कोमल चरणों से भी बढ़कर है, उसके मुँह से गिरा पानी गंगा आदि तीर्थों के जल से पवित्र, और उसका चखकर लाया मांस मुझे वेद-यज्ञों की हवि से भी प्रिय। कल छिपकर देखना, मैं उसके प्रेम का प्रमाण दूँगा।

नेत्र-दान

मूल ग्रंथ में

अगली सुबह शिवगोचरियार लिंग के पीछे छिपे थे। पेरिय पुराणम् कहता है कि यह तिण्णन की पूजा का छठा दिन था। वे आए, तो लिंग की एक आँख से खून बह रहा था। उन्होंने चारों ओर दौड़कर हमला करने वाले को ढूँढा, जंगल की जड़ी-बूटियाँ लगाईं, पर खून और बहा। तब उन्हें सूझा कि आँख की दवा आँख है, और बिना एक पल रुके उन्होंने तीर से अपनी दाईं आँख निकालकर लिंग की आँख पर लगा दी। खून रुक गया, और वे ख़ुशी से नाचने-गाने लगे।

तभी दूसरी आँख से भी खून बहने लगा। तिण्णन का चेहरा फिर खिल उठा, क्योंकि दवा आज़माई हुई थी और एक आँख अभी बाकी थी। अंधे होने के बाद जगह न भूलें, इसलिए उन्होंने अपना बायाँ पैर भगवान की आँख पर टिकाया, और तीर से दूसरी आँख निकालने लगे। तब भगवान का हाथ उठा, उनका हाथ थाम लिया, और अमृत जैसी वाणी आई: कण्णप्प, रुको! फिर बोले: मेरे दाहिनी ओर सदा रहो, तुम्हारे जैसा कोई नहीं। ब्रह्मा आदि देवताओं ने फूल बरसाए।

ग्रंथों में अंतर

Pope के अंग्रेज़ी वर्णन में शिव कहते हैं: "रुको तिण्णन, रुको मेरे प्यारे बेटे"; पेरिय पुराणम् के मूल पद में वचन है "कण्णप्प, रुको" (कण्णप्प निर्क), और उसके बाद "मेरे दाहिनी ओर सदा रहो"। लोक में यह वचन तीन बार कहा बताया जाता है; मूल पद में वह एक बार है।

भक्ति और शरणागति की सीख

भाव विधि से बड़ा

कथा में दो सच्चे भक्त हैं: विधि जानने वाले पुजारी और विधि न जानने वाला शिकारी। भगवान दोनों को प्रेम करने वाला मानते हैं, पर पुजारी को दिखाते हैं कि पूजा का मोल बाहरी नियम से नहीं, भीतर के प्रेम से है। Pope कथा के अंत में यही लिखते हैं: शिवगोचरियार ने सीखा कि प्रेम और आत्म-समर्पण, कर्मकांड की शुद्धता से बड़े हैं।

परंपरा में स्थान

Pope (1900) के अनुसार कन्नप्प की मूर्ति कालहस्ती के मंदिर में स्थापित है, और माणिक्कवाचकर का तिरुवाचकम् भी, नाम लिए बिना, शिव के इसी वचन की ओर इशारा करता है।

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देवता

संत

स्रोत

कन्नप्प नायनार — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न