भरत

जिन्होंने मिला हुआ राज्य ठुकराया और चौदह बरस राम की पादुकाओं के नाम पर राज चलाया

संक्षेप में

भरत राजा दशरथ और कैकेयी के पुत्र, राम के छोटे भाई थे। माँ ने उनके लिए राज्य माँगा, पर भरत ने उसे ठुकरा दिया और राम को लौटाने चित्रकूट गए। राम नहीं लौटे, तो वे उनकी पादुकाएँ सिर पर रखकर लाए, और चौदह बरस नंदिग्राम में वल्कल पहनकर उन्हीं पादुकाओं के नाम पर राज्य चलाया।

श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त

एक नज़र में

भरत — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण-महाभारत के भक्तवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.66.1–4; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 1 (कृष्णाचार्य सं.), अयोध्याकाण्ड, सर्ग 115, पृ. 229 (scan leaf n242)
कथा किस ग्रंथ मेंवाल्मीकि रामायण, रामचरितमानसवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.66–2.67; 2.98; 2.105; 2.107; 6.115; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 218–220, पृ. 216 (scan leaf n233)
भाईलक्ष्मणवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.28.6

कथा किन ग्रंथों में है

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस

भरत की कथा वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के दूसरे आधे हिस्से में है: ननिहाल से लौटना, राज्य ठुकराना, चित्रकूट जाना और नंदिग्राम में रहना; और युद्धकाण्ड के अंत में राम का स्वागत। रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास भरत के प्रेम का विस्तार से वर्णन करते हैं।

पृष्ठभूमि

राज्य ठुकराना

भरत ननिहाल में थे, जब दशरथ ने कैकेयी के वर के कारण राम को वन भेजा और भरत के लिए राज्य दिया। लौटकर पिता की मृत्यु और भाइयों के वनवास की बात सुनकर भरत ने माँ से कहा: पिता और पिता जैसे भाई के बिना मुझे राज्य से क्या? तुमने मेरे घाव पर नमक छिड़का है। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं करूँगा; प्रियजनों के प्यारे भाई को वन से लौटा लाऊँगा।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

भरत की भक्ति भाई के प्रति ऐसा प्रेम है, जिसमें राज्य, सुख और मान, सब छोटे पड़ जाते हैं। चित्रकूट में उन्होंने राम से कहा: यह राज्य मुझे मिला है, इसे मैं आपको देता हूँ; जैसे गधा घोड़े की चाल नहीं चल सकता, वैसे मैं आपकी तरह राज्य नहीं सँभाल सकता।

रामचरितमानस में देवगुरु बृहस्पति इन्द्र से कहते हैं: भरत के समान राम का प्रेमी कौन है, जिनका नाम राम जपते हैं, और जो राम का नाम जपते हैं? राम के भक्त दूसरों के हित में लगे और दूसरों के दुख से दुखी होते हैं; भक्त-शिरोमणि भरत से मत डरो।

प्रमुख कथाएँ

राम की पादुकाएँ

मूल ग्रंथ में

रास्ते में निषादराज गुह ने भरत की बड़ी सेना देखकर शंका की, तो भरत ने कहा: राम मेरे बड़े भाई, पिता के समान हैं; मैं उन्हें लौटाने जा रहा हूँ। चित्रकूट में राम ने पिता का वचन तोड़ने से मना कर दिया, तो वसिष्ठ के कहने पर राम ने राज्य की रक्षा के लिए भरत को अपनी सोने से सजी पादुकाएँ दीं। भरत ने कहा: राम की आज्ञा से लौटता हूँ, और इन शुभ पादुकाओं को लेकर अयोध्या जाता हूँ।

मुनि भरद्वाज ने कहा: तुममें श्रेष्ठ आचरण ऐसे ठहरता है, जैसे नीची भूमि में वर्षा का जल; जिसका तुम्हारे जैसा धर्मात्मा पुत्र है, वह दशरथ अमर हैं।

नंदिग्राम का तप

मूल ग्रंथ में

अयोध्या लौटकर भरत ने कहा: पिता स्वर्ग गए, गुरु-समान भाई वन में हैं; राज्य के लिए मैं राम की प्रतीक्षा करूँगा, वही राजा हैं। राम के बिना यह दुख मैं नंदिग्राम में रहकर सहूँगा। फिर वे पादुकाएँ सिर पर रखकर रथ से नंदिग्राम गए।

वहाँ उन्होंने कहा: यह राज्य भाई ने मुझे धरोहर की तरह सौंपा है, और ये पादुकाएँ इसकी रक्षा करेंगी; राम के लौटने पर इन्हें फिर उनके चरणों में पहनाकर देखूँगा, और राज्य लौटाकर पाप से मुक्त हो जाऊँगा। वल्कल और जटा धारण कर, मुनि के वेश में, भरत ने पादुकाओं का अभिषेक किया, और राज्य का हर काम पहले उन्हें निवेदन करके करते रहे।

ग्रंथों में अंतर

दक्षिण भारत की प्रतियों (कृष्णाचार्य संस्करण, 1905) में यहाँ कुछ श्लोक अधिक हैं: भरत पादुकाओं पर छत्र धारण करने को कहते हैं, "ये आर्य के चरण माने गए हैं, इन्हीं पादुकाओं से राज्य में धर्म स्थित है"; ख़ुद उन पर छत्र और चँवर धारण करते हैं; और जो भी भेंट आती, पहले पादुकाओं को निवेदन करते।

राम का लौटना

मूल ग्रंथ में

चौदह बरस बाद राम पुष्पक विमान से लौटे, तो भरत ने हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया और विमान में जाकर फिर प्रणाम किया; राम ने बहुत दिन बाद देखे भाई को उठाकर गोद में बिठाया और गले लगा लिया।

फिर धर्म जानने वाले भरत ने राम की पादुकाएँ अपने हाथों उनके चरणों में पहनाईं और कहा: राजन, यह राज्य, जो आपने धरोहर रखा था, मैं आपको लौटाता हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ, जो आपको राजा के रूप में अयोध्या लौटा देख रहा हूँ; आपके तेज से कोष, अन्न-भंडार और सेना दस गुना हो गए हैं। भाई के प्रति भरत का यह प्रेम देखकर वानरों और विभीषण की आँखें भर आईं।

भक्ति और शरणागति की सीख

जो मिला, उसे भी ठुकराना

गुह ने भरत से कहा था: तुम धन्य हो, तुम्हारे जैसा मैं इस धरती पर किसी को नहीं देखता, जो बिना प्रयास मिले राज्य को छोड़ना चाहता है। भरत की भक्ति त्याग में है: राज्य उनके हाथ में था, फिर भी उन्होंने उसे भाई की धरोहर माना और चौदह बरस सेवक बनकर सँभाला।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

पादुकाएँ सिर पर

रथस्थः स तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः। नन्दिग्रामं ययौ तूर्णं शिरस्याधाय पादुके॥

भाई से प्रेम करने वाले धर्मात्मा भरत रथ पर बैठकर, राम की पादुकाएँ सिर पर रखे, तुरंत नंदिग्राम गए।

वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड, समीक्षित पाठ 2.107.12 (दाक्षिणात्य पाठ: सर्ग 115, श्लोक 12)

मानस: भरत के समान राम-स्नेही कौन

भरत सरिस को राम सनेही। जग जप राम राम जप जेही॥

भरत के समान राम से प्रेम करने वाला कौन है? सारा जगत राम का नाम जपता है, और राम जिनका नाम जपते हैं, वे भरत हैं।

रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 218 से पहले की चौपाई

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देवता

स्रोत

भरत — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न