चण्डेश्वर नायनार
गायें चराने वाला ब्राह्मण बालक, जो उनके दूध से रेत के शिवलिंग का अभिषेक करता था, और जिसे शिव ने अपना पुत्र कहा
संक्षेप में
चोल देश के सेय्ञलूर गाँव का एक ब्राह्मण बालक, विचारशर्मा, गायें चराते हुए उनके अपने-आप बहते दूध से नदी किनारे रेत के शिवलिंग का अभिषेक करता था। पिता ने ग़ुस्से में दूध का घड़ा ठोकर से गिरा दिया, तो बालक ने छड़ी उठाई, जो कुल्हाड़ी बन गई। शिव प्रकट हुए और बोले: अब हम तुम्हारे पिता हैं।
भगवान शिव के भक्तभक्त-चरित ग्रंथों के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | भक्त-चरित ग्रंथों के भक्त | पेरिय पुराणम्, मूल तमिल (Project Madurai), सर्ग 4.6, पद 1211–1270; पेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), Divisions of the Book, p. 5 |
| कथा किस ग्रंथ में | पेरिय पुराणम् | पेरिय पुराणम्, मूल तमिल (Project Madurai), सर्ग 4.6, पद 1211–1270 |
कथा किन ग्रंथों में है
पेरिय पुराणम् और मंदिरों की मूर्तियाँ
चण्डेश्वर की कथा सेक्किऴार के पेरिय पुराणम् में 60 पदों में है, जहाँ वे 63 नायनारों में गिने जाते हैं। यही कथा दक्षिण के शिव-मंदिरों की मूर्तियों में भी है: Krishna Sastri लिखते हैं कि राजा राजराज प्रथम ने तंजावुर के मंदिर में इस कथा का पूरा मूर्ति-समूह स्थापित कराया था, जिसमें पिता ज़मीन पर गिरे दिखाए गए हैं, और उसका वर्णन पेरिय पुराणम् की कथा से मेल खाता है।
पृष्ठभूमि
सेय्ञलूर का बालक
कावेरी के देश में मण्णि नदी के दक्षिणी किनारे पर वेद-पाठी ब्राह्मणों का पुराना गाँव सेय्ञलूर था। वहाँ कश्यप गोत्र के ब्राह्मण एच्चदत्तन (यज्ञदत्त) रहते थे, और उनके घर विचारशर्मा जन्मे। पाँच वर्ष की आयु में ही उन्हें वेद और आगम ऐसे खिलने लगे, जैसे कली में छिपी सुगंध; सात वर्ष पर यज्ञोपवीत हुआ, और गुरु उनकी समझ देखकर चकित रह गए।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
बालक के मन में यह बात बैठ गई थी कि सारी विद्याओं का अंतिम अर्थ नटराज के नाचते चरण हैं। उसकी पूजा एक बच्चे का खेल लगती थी: रेत का मंदिर, गोपुर, आसपास के जंगली फूलों की मालाएँ; पर पेरिय पुराणम् कहता है कि भगवान उस रेत के लिंग में भरकर वह पूजा स्वीकार करते थे।
प्रमुख कथाएँ
गायों का रखवाला
मूल ग्रंथ मेंएक दिन पाठशाला के साथियों के साथ जाते हुए विचारशर्मा ने देखा कि एक ग्वाला, जिसे एक गाय सींग मारने आई थी, उसे बेझिझक डंडे से पीट रहा है। उन्हें गायों की महिमा याद आई: सब पवित्र तीर्थ उनमें बसते हैं, और वही शिव के अभिषेक के पाँच पदार्थ देती हैं। उन्होंने ग्वाले से कहा: अब तुम मत चराओ, मैं चराऊँगा; और ब्राह्मणों की सहमति से गाँव की गायों के रखवाले बन गए।
वे गायों को हरी घास चराते, ठंडा पानी पिलाते, छाँव में बिठाते, और समय पर हर घर दूध पहुँचाते। गायें इतनी प्रसन्न रहतीं कि उनके पास आते ही, मानो वह उनका अपना बछड़ा हो, बिना दुहे दूध बहाने लगतीं।
रेत का शिवलिंग
मूल ग्रंथ मेंअपने-आप बहते इस दूध में उन्हें शिव के अभिषेक का संकेत दिखा। मण्णि नदी के रेतीले किनारे पर, एक आत्ती पेड़ के नीचे, उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाया, और उसके चारों ओर मंदिर, ऊँचा गोपुर और परिक्रमा भी। फूल चुनकर मालाएँ बनाईं, नए घड़ों में गायों का दूध भरा, और विधि से अर्चना करके दूध से अभिषेक करने लगे।
इससे गाँव का कोई नुकसान नहीं था: गायें घरों में भी पहले से ज़्यादा दूध देती थीं। पर किसी बाहर वाले ने, जो यह नहीं समझता था, गाँव के ब्राह्मणों से कह दिया कि यह लड़का गायें दुहकर दूध रेत पर गिरा देता है। सभा ने पिता एच्चदत्तन को बुलाया; पिता ने डरकर क्षमा माँगी और कहा कि आगे ऐसा हुआ तो दोष मेरा।
छड़ी जो कुल्हाड़ी बनी
मूल ग्रंथ मेंअगले दिन पिता चुपके से पीछे गए, और नदी किनारे एक कुरवम् पेड़ पर चढ़कर छिप गए। बालक ने रोज़ की तरह स्नान करके रेत का मंदिर बनाया, फूल चढ़ाए, और दूध के घड़े उठाकर अभिषेक करने लगा। यह देखकर पिता का क्रोध भड़क उठा; वे उतरे, और हाथ के डंडे से बेटे की पीठ पर मारने लगे, कड़वे शब्द कहे। पर बालक पूजा में इतना डूबा था कि उसे कुछ पता न चला।
तब पिता ने अभिषेक के दूध का घड़ा पैर से ठोकर मारकर गिरा दिया। बालक ने देखा कि कोई पूजा बिगाड़ रहा है, जान लिया कि पिता है, फिर भी पास पड़ी छड़ी उठाकर फेंकी; वह छड़ी कुल्हाड़ी (मऴु) बन गई, और उसने पिता के दोनों पैर काट दिए। पिता धरती पर गिर पड़े, और बालक पूजा में आई बाधा हटाकर फिर पहले की तरह अर्चना करने लगा।
ग्रंथों में अंतर
Gopinatha Rao (1916) का अंग्रेज़ी सार कुछ अलग है: वहाँ शिकायत वही ग्वाला करता है जिसका काम छिना था; पिता रेत के ढेर (लिंग) को ठोकर मारते हैं; बालक अपनी कुल्हाड़ी से एक पैर काटता है; और पिता के बारे में केवल इतना कि वे गिर पड़े। ऊपर की कथा पेरिय पुराणम् के मूल पदों के अनुसार है।
"अब हम तुम्हारे पिता हैं"
मूल ग्रंथ मेंतभी शिव पार्वती के साथ बैल पर सवार होकर, गणों और मुनियों से घिरे, प्रकट हुए। बालक उनके चरणों में गिर पड़ा। शिव ने उसे उठाया और कहा: हमारे लिए तुमने अपने जन्म देने वाले पिता को गिरा दिया; अब से हम तुम्हारे पिता हैं। उन्होंने उसे गले लगाया, सिर सहलाया और माथा सूँघा।
शिव ने उसे अपने सब सेवकों का प्रधान बनाया, और कहा: हम जो पात्र भोग के लिए लें, जो वस्त्र पहनें, जो माला धारण करें, सब तुम्हारा; तुम्हें चण्डेश का पद देते हैं। और अपनी जटा से कोन्रै फूलों की माला उतारकर उसके सिर पर पहना दी। पेरिय पुराणम् कहता है कि बालक उसी देह से हर का पुत्र बन गया।
और पिता के बारे में मूल पाठ कहता है: संसार के सामने अपराध करने वाले उस बूढ़े ब्राह्मण पर बालक के हाथ की कुल्हाड़ी चली, उसका दोष मिट गया, और भगवान की कृपा से वह अपने परिवार सहित शिव-लोक पहुँचा।
भक्ति और शरणागति की सीख
भगवान, जो पिता बने
कथा का केंद्र बालक की तल्लीनता है: पीठ पर डंडे पड़े, तब भी उसे पूजा के सिवा कुछ पता न चला। शिव ने इस प्रेम का उत्तर स्वयं उसका पिता बनकर दिया। पेरिय पुराणम् अंत में कहता है: इस रहस्य को कौन जानता है? अनंत भगवान के प्रति प्रेम से भरे भक्त जो करें, वही तप है।
परंपरा में स्थान
Krishna Sastri बताते हैं कि तमिल शिलालेखों और पेरिय पुराणम् में उन्हें "आदिदास-चण्डेश" (शिव के सबसे पहले सेवक) कहा गया, मंदिर के लेन-देन उन्हीं के नाम से लिखे जाते थे, और आज भी दर्शनार्थी मंदिर छोड़ने से पहले उनके सामने ताली बजाते हैं, मानो दिखा रहे हों कि मंदिर की कोई चीज़ साथ नहीं ले जा रहे।
मूर्ति-कला में यह दृश्य "चण्डेशानुग्रह-मूर्ति" कहलाता है: शिव पार्वती के साथ बैठे, अपने सामने हाथ जोड़े बैठे चण्डेश के बालों में फूलों की माला बाँधते हुए। Krishna Sastri गंगैकोंडचोलपुरम् की ऐसी एक सुंदर मूर्ति देते हैं, और कश्यप-शिल्प का कथन उद्धृत करते हैं कि दक्षिणामूर्ति के बाद यही रूप सबसे प्रसिद्ध है।
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देवता
- श्री शिव — भगवान शिव के पाठ और आरती
स्रोत
- Periya Puranam (Tiruttondar Puranam) of Sekkizhar, Kandam 1, Sarukkam 4–5 — Tamil text — सेक्किऴार; e-text: Project Madurai · सर्ग 4.6, पद 1211–1270
- Elements of Hindu Iconography, Vol. II, Part I — T. A. Gopinatha Rao, Law Printing House, Madras (1916) · "Anugrahamurtis", pp. 205–207
- South-Indian Images of Gods and Goddesses — H. Krishna Sastri, Government Press, Madras (1916) · pp. 146–147, 161
- Periyapuranam (The Lives of Saiva Saints) of St. Sekkilar, Part I — J. M. Nallaswami Pillai (अनु.), Tamil University Publishing House, Madras (1924) · Divisions of the Book, p. 5
