केवट
गंगा का मल्लाह, जिसने पैर धोए बिना राम को नाव पर चढ़ाने से मना कर दिया
संक्षेप में
केवट गंगा का वह मल्लाह है, जिसकी कथा तुलसीदास के रामचरितमानस में है। राम ने नाव माँगी, तो उसने कहा कि आपके चरणों की धूल से पत्थर स्त्री बन गया, मेरी नाव भी कहीं उड़ न जाए; पहले पैर धोने दीजिए। प्रेम से चरण धोकर उसने राम को पार उतारा, और उतराई में कुछ नहीं लिया।
श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 99–102, पृ. 177–178 (scan leaf n189–n190) |
| कथा किस ग्रंथ में | रामचरितमानस | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 99–102, पृ. 177–178 (scan leaf n189–n190) |
| कथा में साथ | निषादराज गुह | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 102–103, पृ. 178 (scan leaf n190) |
कथा किन ग्रंथों में है
रामचरितमानस
बाद के ग्रंथ मेंकेवट का प्रसंग तुलसीदास के रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में है, जब वनवास के लिए निकले राम शृंगवेरपुर में गंगा पार करते हैं। वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग नहीं है: वहाँ निषादराज गुह नाव मँगवाते हैं, उनके लोग नाव खेते हैं, और चरण धोने की बात नहीं आती।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
केवट की भक्ति भोलेपन की चतुराई में छिपी है। वह कहता है: मैं तुम्हारा मर्म जान गया; सब कहते हैं कि तुम्हारे चरणों की धूल कोई मनुष्य बनाने वाली जड़ी है, जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई; पत्थर से काठ कठोर नहीं, मेरी नाव भी मुनि की पत्नी बनकर उड़ गई तो मेरी रोज़ी ही चली जाएगी। तुलसीदास बताते हैं कि यह बात प्रेम में लिपटी, अटपटी थी, और करुणा के धाम राम उसे सुनकर हँस पड़े।
प्रमुख कथाएँ
चरण धोकर पार उतारना
बाद के ग्रंथ मेंराम ने नाव माँगी, पर केवट नाव नहीं लाया। उसने कहा: यदि प्रभु पार जाना ही चाहते हैं, तो मुझे चरण-कमल धोने दीजिए। चरण धोए बिना मैं नाव पर नहीं चढ़ाऊँगा, उतराई भी नहीं चाहिए; दशरथ की सौगंध, चाहे लक्ष्मण तीर मार दें, पर पैर धोए बिना पार नहीं उतारूँगा।
राम मुस्कुराकर बोले: वही करो, जिससे तुम्हारी नाव न जाए; जल्दी जल लाकर पैर धो लो, देर हो रही है। तुलसीदास कहते हैं: जिनका नाम एक बार स्मरण करने से मनुष्य अपार भवसागर पार कर जाते हैं, जिन्होंने तीन पग में सारा जगत नाप लिया, वही कृपालु आज केवट से निहोरा कर रहे हैं। केवट कठौते में पानी भर लाया, और बड़े आनंद और प्रेम से चरण-कमल धोने लगा।
देवता फूल बरसाकर सराहने लगे कि इसके समान पुण्यवान कोई नहीं। चरण धोकर केवट ने परिवार सहित वह जल पिया, अपने पितरों को पार किया, और फिर प्रसन्न होकर प्रभु को गंगा पार ले गया।
उतराई न लेना
बाद के ग्रंथ मेंपार उतरकर केवट ने दंडवत किया। प्रभु संकोच में थे कि उसे कुछ नहीं दिया; सीता उनके मन की बात समझ गईं और प्रसन्न होकर अपनी मणि की अँगूठी उतारी। राम ने कहा: उतराई ले लो। पर केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए: नाथ, आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुख और दरिद्रता की आग बुझ गई; बहुत समय मजूरी की, आज विधाता ने पूरी मजदूरी दे दी।
उसने कहा: अब मुझे कुछ नहीं चाहिए; लौटते समय जो देंगे, वह प्रसाद मैं सिर पर रखकर लूँगा। प्रभु, लक्ष्मण और सीता ने बहुत कहा, पर केवट ने कुछ नहीं लिया; तब करुणा के धाम राम ने उसे निर्मल भक्ति का वर देकर विदा किया।
भक्ति और शरणागति की सीख
सबसे बड़ी मजदूरी
बाद के ग्रंथ मेंकेवट की कथा में तुलसीदास दिखाते हैं कि भवसागर से पार कराने वाले भगवान ख़ुद एक मल्लाह से नदी पार कराने का निहोरा करते हैं। और केवट के लिए प्रभु के चरण धोना ही सबसे बड़ी कमाई है; इसके आगे सोने की अँगूठी भी छोटी है।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
मैं तुम्हारा मर्म जान गया
माँगी नाव न केवट आना। कहइ तुम्हार मरम मैं जाना॥
चरन कमल रज कहँ सब कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥राम ने नाव माँगी, पर केवट नाव नहीं लाया। वह बोला: मैं तुम्हारा भेद जान गया हूँ; तुम्हारे चरण-कमलों की धूल के बारे में सब कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है।
वही केवट से निहोरा करते हैं
जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भव सिंधु अपारा॥
सोइ कृपाल केवटहि निहोरा। जेहि जग किय तिहुँ पगहु ते थोरा॥जिनका नाम एक बार स्मरण करने से मनुष्य अपार भवसागर से पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने सारे जगत को तीन पग से भी छोटा कर दिया, वही कृपालु आज केवट से निहोरा कर रहे हैं।
संबंधित भक्त
- निषादराज गुह — कथा में साथ
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देवता
- श्री राम — भगवान राम के पाठ और आरती
संत
- गोस्वामी तुलसीदास — जिनके रामचरितमानस में केवट का प्रसंग है
स्रोत
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · अयोध्याकाण्ड, दोहा 99–103, पृ. 177–178 (scan leaf n189–n190)
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · 2.46.55–75
- Srimad Valmiki Ramayana, According to the Southern Readings, with footnotes, vol. I (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा काण्ड) — T. R. Krishnacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1905) · अयोध्याकाण्ड, सर्ग 52, पृ. 152 (scan leaf n165)
